लोकसभा चुनाव 2019: महाराष्ट्र में बीजेपी के लिए क्यों है ख़तरे की घंटी?
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र देश में सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाला प्रदेश है। क्षमा करें, 2019 आ चुका है। लिहाज़ा इसी हिसाब से किसी सूबे की पहचान का तरीका भी विकसित हो रहा है। महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं। इनमें 23 सीटें बीजेपी के पास हैं तो शिवसेना के पास 18, एनसीपी के पास 4 और कांग्रेस के पास 2 सीटें हैं। एक अन्य सीट भी एनडीए के पास है। मतलब ये कि एनडीए के पास महाराष्ट्र में 42 सीटें बचाने की चुनौती है और 2014 में 6 सीटें जीतने वाली यूपीए के पास अपनी सीटें बढ़ाने का मौका है।

बीजेपी-शिवसेना दूर, कांग्रेस-एनसीपी और करीब
अब तक सियासत ने जो दूरी 2019 आम चुनाव के लिए तय की है उसके मुताबिक कुछेक बातें तय हो चुकी हैं। जहां यूपीए खेमे से एकजुटता की ख़बर है, वहीं एनडीए खेमे बंटते नज़र आ रहे हैं। महाराष्ट्र में अगर त्रिकोणात्मक संघर्ष होता है, तो एनडीए का सफाया हो जाएगा- ये तय लगता है। मगर, सबसे ज्यादा नुकसान शिवसेना का होगा, यह भी तय है।
नुकसान तय, फिर भी अकेले चुनाव लड़ने को क्यों आमादा हैं बीजेपी-शिवसेना?
नुकसान तय होने पर भी गठबंधन तोड़ने का जोखिम लेने पर बीजेपी और शिवसेना क्यों आमादा हैं, यह बात राजनीति पंडितों को भी चौंका रही है। अब थोड़ा और सोचें, तो नुकसान किसे ज्यादा होने वाला है? मान लीजिए कि शिवसेना लोकसभा की सभी सीटें अकेले लड़ने की वजह से हार जाती है। तो, क्या यह अकेले शिवसेना का नुकसान है? वास्तव में यह बीजेपी का नुकसान अधिक है। मगर, इस बात को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह नहीं समझ पा रहे हैं। अगर समझ रहे होते, तो जनवरी के पहले हफ्ते में ही महाराष्ट्र के बीजेपी सांसदों को वे अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने को नहीं कहते।

नुकसान पर सम्मान को वरीयता क्यों दे रही है शिवसेना?
शिवसेना नुकसान पर सम्मान को अधिक वरीयता क्यों दे रही है? शिवसेना के सामने बिहार का उदाहरण है। बिहार में विगत लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें जीतने वाले जेडीयू को बीजेपी ने चुनावी तालमेल में अपने बराबर 17 सीटें दे दी है। महाराष्ट्र में यही सम्मान शिवसेना भी चाहती है। यहां बीजेपी-शिवसेना बराबर-बराबर यानी 24-24 सीटों पर चुनाव क्यों नहीं लड़ सकती? क्या 18 सांसदों वाली शिवसेना की आवाज़ 2 सांसदों वाले जेडीयू से कम है? क्या 22 सीटों वाली बीजेपी अगर बिहार में 17 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, तो महाराष्ट्र में 23 सीटों वाली बीजेपी 24 सीटों पर चुनाव क्यों नहीं लड़ सकती?

जेडीयू के सामने मजबूर बीजेपी, शिवसेना क्यों न दिखाए गरूर?
शिवसेना के लिए चौंकाने वाली बात ये है कि महाराष्ट्र की सरकार शिवसेना के समर्थन से चल रही है फिर भी उसकी बात नहीं मानी जा रही है! जबकि, बिहार की सरकार बीजेपी के समर्थन से चल रही है, फिर भी बीजेपी जेडीयू के सामने मजबूर है! क्या शिवसेना मजबूर बीजेपी से भी मजबूर है? यही वो बात है जो शिवसेना को नुकसान से ज्यादा सम्मान की परवाह करने को मजबूर कर रही है। जिस तरीके से शिवसेना ने बीजेपी के साथ खुली रार छेड़ रखी है उसे देखते हुए अब इस बात की भी सम्भावना कम होती जा रही है कि अगर तालमेल हो भी जाता है तो क्या दोनों पार्टियां अपने-अपने वोटरों को एक-दूसरे को वोट देने के लिए समझा पाएंगी?शिवसेना को सम्मान चाहिए बीजेपी से। बीजेपी को क्या चाहिए शिवसेना से? क्या शिवसेना बीजेपी की खामोश साथी बनी रहे? जो बीजेपी थाली में परोस कर दे, उसे वह स्वीकार करती रहे और अस्वीकार करने की गुस्ताखी न दिखाए?

आत्मघाती है बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का एलान
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की ओर से महाराष्ट्र में अकेले चुनाव मैदान में जाने की बात स्थानीय सांसदों से कहना पार्टी शुभचिन्तकों को भी हजम नहीं हो सकता। इसकी वजह ये है कि लोकसभा सीटों की संख्या के लिहाज से सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी गठबंधन और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय संघर्ष में, जिसके आसार बन रहे हैं, बीजेपी की हालत पतली रहने वाली है। दूसरी सबसे ज्यादा सीटों वाले महाराष्ट्र में भी अकेले लड़ने की मजबूरी बने तो यह बीजेपी का दुर्भाग्य ही होगा।
बिना चुनाव लड़े बीजेपी ने खो दी 5 सीटें!
तीसरी सबसे ज्यादा सीटों वाला प्रदेश है पश्चिम बंगाल, जहां लोकसभा की 42 सीटें हैं। यहां बीजेपी को फायदा होने की सम्भावना है, मगर चमत्कारिक परिणाम हुए तब भी क्या 10 सीटें भी बंगाल में पा सकेगी बीजेपी? लोकसभा सीटों के ख्याल से चौथे नम्बर पर तमिलनाडु में इस बार एआईडीएमके-बीजेपी गठबंधन की हालत भी बेहतर नहीं है। देश में पहला राज्य है तमिलनाडु जहां एक सर्वेक्षण में नरेंद्र मोदी के बजाए लोगों ने राहुल गांधी को पसंद किया है। सीटों के ही नज़रिए से पांचवें नम्बर का सूबा है बिहार, जहां बीजेपी ने बिना चुनाव लड़े ही 5 लोकसभा की सीटें खो दी है।

टॉप 5 राज्यों में बीजेपी टॉप रह पाएगी बीजेपी की टैली?
कहने का मतलब ये है कि पांच सबसे ज्यादा सीटों वाले प्रदेश उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु में 249 सीटें हैं। मगर, इनमें से बंगाल को छोड़कर कहीं भी बीजेपी की सीटें बढ़ने के आसार नहीं दिख रहे हैं। ऐसी स्थिति में शिवसेना से अलग होकर चुनाव लड़ना क्या बीजेपी के लिए आत्मघाती कदम नहीं है?
कांग्रेस-एनसीपी में दिख रही है बेहतर समझ
बीजेपी से अलग अगर यूपीए में देखे तो कांग्रेस और एनसीपी में अच्छी समझ और तालमेल दिख रहा है। दोनों दलों ने 20-20 सीटों पर तालमेल पक्का कर लिया है। बाकी सीटों पर सहमति बनाने की कोशिशें जारी हैं। मतभेद हुए तब भी मिलकर लडेंगे, यह तय है। सहयोगी दलों के लिए भी वे सीट छोड़ने वाले हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जो खुद यूपीए के लिए चाहे जितना फायदेमंद हो, लेकिन बीजेपी के लिए ख़तरे की घंटी है।












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