लोकसभा चुनाव 2019: कहां छूट गए आम जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दे
नई दिल्ली। जब बात राजनीति और चुनाव की आती है, तब हर पार्टी अपने मुद्दे सेट करने में लग जाती है। यह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए एक समान होता है क्योंकि दोनों की निगाह खुद को आम जनता में स्थापित करने और चुनाव जीतने पर टिकी होती है। वर्तमान समय ऐसा ही है क्योंकि आम चुनाव सिर पर हैं और इसमें कोई भी दल खुद को पीछे नहीं करना चाहता। यही कारण है कि हर नेता और पार्टी अपने मुद्दों को धार देने में लगे हुए हैं। इस दौड़ में कई बार ऐसा लगता है कि सत्ता पक्ष आगे निकलने लगा है जबकि जल्दी ही इस तरह की राय भी व्यक्त की जाने लगती है कि विपक्ष मजबूती के साथ अपने मुद्दों को आगे रख रहा है। इसमें सभी दलों की कोशिश उस मतदाता को लुभाने की होती जिसके वोट की बदौलत उन्हें जीत अथवा हार मिलनी होती है। यह अलग बात है कि हर चुनाव में मुद्दे बदल जाया करते हैं और चुनाव किसी ऐसे मुद्दे पर आकर केंद्रित हो जाता है जिसका जरूरी नहीं कि आम लोगों से कोई सीधा जुड़ाव हो। प्रकारांतर से यह हो सकता है अथवा लोगों के दिमाग में यह बिठा दिया जा सकता है कि यही सबसे बड़ा मुद्दा है। इसका परिणाम अक्सर यह होता है कि आम जनता के मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और फिर अगले पांच सालों तक उन पर बातें होती रहती हैं।

सबसे पहले यह देखने की जरूरत है कि आखिर आम जनता से जुड़े मुद्दे क्या होते हैं और कोई भी सरकार अथवा पार्टी उन पर क्या करती है। गरीबी, भुखमरी, महंगाई, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा, किसानों की दयनीय हालत व आत्महत्या, मानव अधिकार और पर्यावरण आदि ऐसे मुद्दे होते हैं जिन पर जमीनी स्तर पर काम किए जाने की जरूरत होती है। लेकिन देखने में यह आया है कि इन मुद्दों की हमेशा उपेक्षा की जाती है। यह अपने आप में कितनी विडंबनापूर्ण स्थिति है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में भयानक स्तर पर गरीबी है। कुछ गिनती के लोग लगातार अमीर से और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब ज्यादा से ज्यादा गरीब होते जा रहे हैं। गरीबों के आर्थिक उन्नयन के लिए किसी तरह के उपाय नहीं किए जा रहे हैं।
अभी करीब पांच-छह महीने पहले आई एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में पिछले दो वर्षों के दौरान उन लोगों की संख्या दोगुना से अधिक हो गई जिनकी संपत्ति एक हजार करोड़ रुपये या इससे अधिक है। यही रिपोर्ट कहती है कि 2016 में इनकी संख्या 3039 थी जो 2018 में 8031 हो गई। इनकी कुल संपत्ति 7029 अरब डॉलर है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि भारत में करोड़पतियों की संख्या 22.2 फीसदी बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसार देश में बीते करीब डेढ़ दशक में अरबपतियों की संपत्ति में तकरीबन 12 गुना वृद्धि हुई है। इसके साथ ही गरीबी को लेकर आंकड़े कम भयावह नहीं हैं। एक अनुमान के मुताबिक फिलहाल देश में करीब 30 करोड़ लोग बेहद गरीबी में जीवन यावन करने को मजबूर हैं। लोकसभा में सरकार की ओर से दी गई एक जानकारी के मुताबित करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिताते हैं। भारत के सात राज्यों छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में करीब 60 फीसदी गरीब आबादी है। हालांकि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि गरीबी की स्थिति में सुधार के लिए कुछ नहीं किया गया। अवश्य ही कुछ उपाय किए गए जिनके परिणाम भी आए, लेकिन वे पर्याप्त नहीं माने जा सकते। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2005-06 से 2015-16 के बीच भारत में 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गए। लेकिन इसे जरूरत के मुताबिक नहीं माना जा सकता। इसका मतलब साफ है कि अभी भी देश में गरीबी उन्मूलन की दिशा में बहुत काम किए जाने की जरूरत है।
इसी तरह बेरोजगारी के आंकड़े भी कम चिंताजनक नहीं कहे जा सकते। अभी हाल फिलहाल आई एक रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि रोजगार जैसे मुद्दे की कितनी उपेक्षा की जाती रही है। अभी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) की रिपोर्ट आई है। एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि बीते 45 वर्षों में साल 2017-18 में देश में बेरोजगारी दर बढ़कर 6.1 फीसदी हो गई। केंद्र सरकार के श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि देश में बेरोजगारी दर 2015-16 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई थी। पांचवे सालाना रोजगार-बेरोजगारी सर्वे के मुताबिक लगभग 77 फीसदी परिवारों के पास कोई नियमित आय या वेतनभोगी व्यक्ति नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दे भी अनदेखी के शिकार हैं। शिक्षा इतनी महंगी हो चुकी है कि आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि स्कूल नहीं हैं। स्कूल हैं और सरकार की ओर से आंगनबाड़ी जैसे कितने ही कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं। इसके बावजूद गरीबों के बच्चों के लिए स्तरीय शिक्षा का हाल कोई बहुत अच्छा नहीं है। एक अन्य बड़ा सवाल चिकित्सा का भी है जो इतना खर्चीला हो चुका है कि बेहतर इलाज करा पाना आम आदमी के वश का नहीं रहा। यह अलग बात है कि सरकार की ओर से मुफ्त चिकित्सा के लिए योजनाएं चलाई गई हैं लेकिन वह सब कुछ बीमा केंद्रित ज्यादा है। किसानों की आत्महत्या की खबरें लगातार आती रहती हैं जिनका कोई पुरसाहाल नहीं है।
लेकिन शायद ही इस तरह के सवालों को कभी चुनावी मुद्दा बनाया गया हो। जब कभी ये मुद्दे उछाले भी गए तो उनका उद्देश्य केवल वोट हासिल करना रहा समस्या का समाधान नहीं। जैसे कभी हरित क्रांति और गरीबी हटाओ की बात की गई। लेकिन न गरीबी हटी और न पूरे देश में हरित क्रांति आ सकी। पिछले चुनाव को ही देखें तो पता चलता है कि वह भ्रष्टाचार और विकास के मुद्दे पर लड़ा गया, लेकिन न भ्रष्टाचार खत्म हुआ और न विकास ही हुआ। अब सत्ता पक्ष राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाने में लगा है तो विपक्ष राफेल में भ्रष्टाचार को। यहां तक कि अब किसानों के मुद्दे को भी कोई मजबूती से नहीं उठा रहा है। विकास को लेकर भी कोई कुछ नहीं बोल रहा है। नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक और मॉब लिंचिंग से लेकर दलित उत्पीड़न और असहिष्णुता आदि पर कोई बात नहीं हो रही है। तो क्या मान लिया जाए कि शेष सारे मुद्दे पीछे छूट गए हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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