हाथ में संविधान, निशाने पर दलित और मुसलमान
Rahul Gandhi Prachar: राहुल गांधी ने इस बार चुनाव प्रचार में नया इतिहास रचा है। महाराष्ट्र और यूपी की जनसभाओं में वो जहां भी गये, उन्होंने अपने हाथ में लेकर भारतीय संविधान की एक कॉपी सबके सामने लहराई।
राहुल गांधी ने संविधान को किसी मजहबी किताब की तरह पेश करने की कोशिश की जिससे उस समुदाय या मजहब के लोग संचालित होते हैं। ऐसा करते हुए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हुई तो वह संविधान को बदल देगी। सवाल यह उठता है कि ऐसा करके वो देश के किस समुदाय को विशेष संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं?

यह बात सही है कि भारत के हर नागरिक पर भारत का संविधान समान रूप से लागू होता है लेकिन देश में एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि यह संविधान उनके मसीहा डॉ भीमराव अंबेडकर ने लिखा है। वोटबैंक की राजनीति के कारण लगातार यह झूठ प्रचारित किया गया है कि भारत के संविधान का निर्माण संविधान सभा ने नहीं बल्कि डॉ भीमराव अंबेडकर ने किया है। अब यह झूठ इतना गहरे उतर गया है कि राजनीतिक नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वो कभी सच बोल सकें।
इस चुनाव में राहुल गांधी इसी झूठ की खेती करने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही कांग्रेस के लंबे शासनकाल में डॉ. अंबेडकर हाशिये पर कर दिये गये थे, लेकिन पहले अंबेडकर सिर्फ दलित राजनीति करनेवालों के प्रिय थे, अब संघ समुदाय के भी प्रिय हो गये हैं। कम्युनिस्ट तो भारत में एक अलगाववादी सोच को बढावा देने के लिए अंबेडकर को दलितों का मसीहा बनाकर प्रचारित कर रहे थे ताकि यह वर्ग अपने आपको बाकी हिन्दू समाज से अलग कर ले लेकिन संघ ने इनको हिन्दू समाज से जोड़े रखने के लिए अंबेडकर को अपना लिया।
इसका परिणाम यह हुआ कि बीते दस सालों में अंबेडकर के नाम पर मोदी ने जितना काम किया उतना उसके पहले कभी नहीं हुआ। दलित वोटबैंक को साधने के लिए मोदी सरकार ने एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये निर्णय को संसद में विधेयक लाकर पलट दिया। बाबा साहेब अंबेडकर भाजपा के लिए नये राजनीतिक मार्गदर्शक बन गये हैं। यही बात कांग्रेस को चला रहे कम्युनिस्टों के लिए परेशान करनेवाली थी इसलिए इस बार चुनाव में उन्होंने दलित वर्ग को भाजपा से तोड़ने के लिए राहुल गांधी को संविधान की कॉपी पकड़ा दी।
अब राहुल गांधी संविधान की कॉपी दिखाकर यही संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो बाबा साहेब के संविधान को बदल देंगे। इसका असर दलित समुदाय पर कितना हुआ है यह तो चार जून का परिणाम बतायेगा लेकिन अपने जीर्णोद्वार के लिए तड़प रही कांग्रेस की कोशिश है कि वह एक बार फिर से दलित और मुस्लिम वोटबैंक को अपने साथ कर ले। अगर ऐसा होता है तो देशभर में उसके पास 30 प्रतिशत का मजबूत वोटबैंक हो जाएगा जिसके बाद उसकी सत्ता में वापसी कोई रोक नहीं पायेगा।
इसी रणनीति के तहत पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाया गया था। पंजाब में 32 प्रतिशत दलित समुदाय के हिन्दू/सिख हैं। कांग्रेस को अनुमान था कि दलित समुदाय से आनेवाले चन्नी को सीएम बनाने से उनकी दोबारा सत्ता में वापसी हो जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पंजाब में कांग्रेस बुरी तरह हार गयी। पंजाब के वोटबैंक को समझते हुए अरविन्द केजरीवाल ने भी महात्मा गांधी को भुला कर अपने पीछे अंबेडकर की फोटो लगा ली और उन्हें इसका जबर्दस्त फायदा भी मिला।
फिर भी कांग्रेस अपनी दलित मुस्लिम नीति पर कायम है। मोदी के उभार तथा दूसरे दलों द्वारा अंबेडकर पर दावे के बाद से दलित वोटर बंट रहे हैं और सिर्फ दलित वोटों की राजनीति करनेवाले कमजोर पड़ रहे हैं। यूपी से मायावती की पार्टी का लगभग सफाया हो चुका है। हालांकि पूर्वी यूपी में चमार जाति का वोट आज भी मायावती के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है लेकिन पश्चिमी यूपी में जाटव वोट मायावती से खिसक रहा है। इसके पीछे के कारणों में मुस्लिमों से टकराव के कारण मोदी से जुड़ाव और चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी भी जिम्मेवार है।
इस बिखरते दलित वोटबैंक ने ही कांग्रेस रणनीतिकारों को प्रेरित किया है कि देश में 16 प्रतिशत दलित वोटबैंक पर धावा बोला जाए। इसके लिए उन्होंने न केवल इसी समुदाय से आनेवाले मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया बल्कि उन अंबेडकर को भी अपना लिया जिनके विकल्प में कभी जगजीवन राम को आगे बढ़ाया गया था। अब कांग्रेस जगजीवन राम वाली समन्वयवादी दलित राजनीति के बजाय अंबेडकरवादी दलित राजनीति को बढावा दे रही है जिसके मूल में अन्य जातियों के साथ संघर्ष करके सत्ता प्राप्ति का सिद्धांत निहित है।
इसके साथ ही कांग्रेस मुस्लिम वोटबैंक को दोबारा अपने पाले में लाना चाहती है। समाजवादी दलों के उभार के साथ ही कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान हुआ वो वह मुस्लिम वोटबैंक का हुआ। अब यूपी बिहार की राजनीति में यादववाद की शक्ल ले चुका समाजवाद अपनी जड़ें जमा चुका है। उसके साथ एकमुश्त मुस्लिम वोटबैंक जुड़ा हुआ है। इसलिए एक रणनीति के तहत कांग्रेस ने जहां दक्षिण में मुस्लिम वोट को अकेले अपने पाले में लाने का प्रयास शुरु किया है वहीं उत्तर में यह काम वह यादव परिवार को साथ लाकर कर रही है।
कांग्रेस के बारे में कहा जाता है कि जब तक उसके पास दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण वोट बैंक रहा उसने साठ साल देश में शासन किया। भाजपा व अन्य छोटे दलों के उभार के साथ न केवल ब्राह्मण मतदाता उसके हाथ से निकल गया बल्कि दलित और मुस्लिम वोटबैंक भी खिसक गया। अब वह इसी में से दो वोटबैंक को दोबारा पाने की कोशिश कर रही है। जहां तक ब्राह्मण मतदाताओं की बात है तो अब दूसरी जातियों में आई राजनीतिक चेतना के बाद उनका वह प्रभाव नहीं रहा जो पहले हुआ करता था। फिर उत्तर भारत में ब्राह्मण भाजपा के साथ मजबूती से खड़े हुए हैं संभवत: इसीलिए कांग्रेस ने ब्राह्मणों पर जोर देने के बजाय दलित और मुस्लिम वोटबैंक पर ध्यान केन्द्रित किया है।
यही कारण है कि राहुल गांधी हाथ में संविधान लेकर चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं। इसका एक संदेश दलितों में जाएगा कि संविधान उनकी किताब है जिसमें भाजपा बदलाव करना चाहती है तो दूसरा संदेश मुसलमानों में जाएगा कि कांग्रेस किताब में लिखी बातों को बचाना चाहती है। अगर वो संविधान में लिखी बातों की रखवाली कर रहे हैं तो कुरान में लिखी बातों का सम्मान जरूर करेंगे।
लेकिन कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि अब भाजपा की दलित राजनीति में गहरी पैठ हो चुकी है। चमार/महार/ जाटव जाति के अलावा अन्य दलित जातियों में इस समय भाजपा लोकप्रिय है। पिछले लोकसभा चुनाव 2019 में देश की कुल 84 सुरक्षित सीटों में 46 अकेले भाजपा ने जीती थी। कांग्रेस के खाते में सिर्फ 5 सीटें आयी थीं। देखना यह होगा इस बार राहुल गांधी द्वारा खुद को संविधान रक्षक घोषित करने से दलित वोटर के मन पर क्या असर होता है।
अब दलित और मुस्लिम वोटबैंक को एक साथ साधने में एक समस्या अंबेडकर के मुसलमानों के बारे में दिये गये वक्तव्य भी हैं। ये विचार अब जनता के बीच पहुंच चुके हैं इसलिए दोनों को एक साथ साध लेना कांग्रेस के लिए इतना भी आसान नहीं रहने वाला है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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