मोदी ने छोड़ा सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास का नारा
Modi Chunav Prachar: अठारहवीं लोकसभा के चुनाव शुरू हो चुके हैं| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपनी पार्टी भाजपा के लिए धुंआधार रैलियाँ और रोड शो कर रहे हैं| इन दोनों नेताओं ने चुनावों की घोषणा से एक महीना पहले ही लगभग सारे देश का एक एक बार भ्रमण कर लिया था|
दोनों नेता भाजपा सरकार की उपलब्धियां और कार्यक्रम गिनाने के साथ साथ विपक्ष पर कड़े हमले भी कर रहे थे| इन दोनों के हमलों का मुख्य टारगेट राहुल गांधी थे| किसी अन्य नेता का नाम या जिक्र तो दोनों यदा कदा ही करते थे|

ईडी-सीबीआई ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में डाल दिया, तो दोनों की पत्नियां विपक्ष की नुमाईशी नेता बन गईं| कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र आने के बाद नरेंद्र मोदी ने लीक से हटकर कांग्रेस पर पहला हमला तब किया, जब उन्होंने कहा कि कांग्रेस का घोषणा पत्र मुस्लिम लीग का घोषणा पत्र लगता है| मोदी ने न कांग्रेस पर चोट की थी, न मुस्लिम लीग पर चोट की थी और न ही मुसलमानों पर चोट की थी| उन्होंने अपने कोर हिन्दू वोट बैंक को बताया था कि कांग्रेस सिर्फ मुसलमानों के बारे में ही सोचती है, इसलिए हिन्दुओं को उससे सावधान रहने की जरूरत है|
अपने चुनाव घोषणापत्र को कांग्रेस ने न्याय पत्र का नाम दिया है| जिसमें पांच न्याय और 25 गारंटियों का जिक्र है| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले बिहार के नवादा में, फिर उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में और राजस्थान की पुष्कर रैली में कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र को मुस्लिम लीग का घोषणा पत्र कहा| उन्होंने कहा कि घोषणा पत्र के आधे हिस्से में मुस्लिम लीग की छाप है, तो बाकी के आधे पर वामपंथियों का प्रभाव है|

कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणापत्र में तीन ऐसे वादे किए थे, जो आज़ादी से पहले 1936 के मुस्लिम लीग के घोषणा पत्र में भी थे, उन्हीं तीन मुद्दों के कारण भारत का विभाजन हुआ था| तब गांधी, नेहरू, पटेल की कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के वे तीनों मुद्दे ठुकरा दिए थे| पहला मुद्दा था- "मुस्लिम पर्सनल लॉ की गारंटी", जबकि भारतीय जनता पार्टी इसके विपरीत मुस्लिम पर्सनल लॉ को खत्म करके यूनिफॉर्म सिविल कोड का वादा करती है|
दूसरा, 1936 के मुस्लिम लीग के घोषणा पत्र में कहा गया था कि वह "बहुसंख्यकवाद" के खिलाफ लड़ेगी| इसका मतलब था कि मुस्लिम लीग हिंदुत्ववाद के खिलाफ लड़ेगी| कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र में कहा गया है कि भारत में "बहुसंख्यकवाद" के लिए कोई जगह नहीं| तीसरा, 1936 के मुस्लिम लीग के चुनाव घोषणा पत्र में कहा गया था कि मुसलमान छात्रों के लिए खास छात्रवृति और नौकरियों के लिए संघर्ष करेंगे| कांग्रेस के 2024 के चुनाव घोषणा पत्र में कहा गया है कि मुस्लिम छात्रों को विदेशों में पढ़ाई के लिए छात्रवृति की व्यवस्था की जाएगी और नौकरियों में आरक्षण दिया जाएगा|
हो सकता है कि यह एक संयोग हो, लेकिन इससे यह तो साबित हो गया कि कांग्रेस की रिसर्च टीम कितनी कमजोर है, और भाजपा की रिसर्च टीम कितनी तेजतर्रार है, जिसने कांग्रेस का घोषणापत्र आते ही मुस्लिम लीग का 88 साल पुराना चुनाव घोषणापत्र खोज निकाला|
अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा लेकर आगे बढ़ रहे थे, जिन्होंने कई बार दावा किया कि केंद्र सरकार की रसोई गैस उज्ज्वला योजना, हर घर शौचालय, और प्रधानमंत्री आवास योजनाओं का सबसे ज्यादा लाभ मुस्लिम महिलाओं को हुआ| इसके अलावा मुस्लिम महिलाओं का दिल जीतने के लिए उन्होंने तीन तलाक की प्रथा पर क़ानून बना कर रोक लगाई|
उन्होंने युवा मुस्लिमों का दिल जीतने के लिए कई योजनाएं भी शुरू कीं, जैसे मुस्लिम छात्र छात्राओं को फ्री कोचिंग के लिए उड़ान योजना, ग्रेजुएशन करने वाली मुस्लिम लड़कियों को शादी के मौके पर केंद्र सरकार की ओर से 51000 रूपए की शगुन योजना, मुस्लिम कारीगरों को परंपरागत कला और हस्तकला की ट्रेनिंग योजना, हुनर हाट, मुस्लिम युवाओं के लिए सीखो और कमाओ योजना, 5 करोड़ मुस्लिम छात्र छात्रों के लिए प्रधानमंत्री छात्रवृति योजना, हज पर जाने वाले मुसलमानों की संख्या बढ़ाना|
यानी मुसलमानों का दिल जीतने के लिए मोदी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन देश भर के दौरों में मिले फीडबैक से उन्हें विश्वास हो गया है कि मुस्लिम वोट एकतरफा कांग्रेस और इंडी एलायंस के घटक दलों के साथ जा रहा है, मुस्लिम वोट में सेंधमारी के उनके सारे प्रयास विफल हो गए हैं|
इसलिए कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र को आधार बनाकर उन्होंने अपने कोर हिन्दू वोट बैंक को सुरक्षित करने के लिए अपने तेवरों को बदलना शुरू किया| कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र के तीन मुद्दों "मुस्लिम पर्सनल लॉ की गारंटी", "बहुसंख्यकवाद का खात्मा" और "नौकरियों में मुसलमानों को आरक्षण" ने उन्हें अपने तेवर बदलने का मौक़ा दे दिया|
कांग्रेस के घोषणा पत्र में बहुसंख्यकवाद के खिलाफ जंग की घोषणा ने सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक की याद ताज़ा कर दी। यूपीए शासनकाल में सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहाकार परिषद ने इस विधेयक का प्रारूप तैयार किया था, जिसे मनमोहन सरकार संसद से पास करवा कर क़ानून बनाना चाहती थी| बिल का वह प्रारूप अल्पसंख्यकों को तो सुरक्षा प्रदान करता था, लेकिन अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिक हिंसा से पीड़ित बहुसंख्यकों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता था| बहुसंख्यकों को अपनी बेगुनाही का सबूत देना पड़ता|
यह बिल अगर क़ानून बन जाता तो मुसलमानों के हाथ में हिन्दुओं के खिलाफ बड़ा हथियार साबित होता| भाजपा, शिवसेना, अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस ने मिलकर बिल का विरोध किया, जिस कारण मनमोहन सरकार इसे पास नहीं करवा सकी| संभवत कांग्रेस घोषणापत्र में उसी बिल को पास करवाने का इशारा किया गया है| इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के घोषणापत्र को मुस्लिम लीग का चुनाव घोषणा पत्र कहा|
कांग्रेस का घोषणापत्र भले ही मुस्लिम लीग का 1936 का चुनाव घोषणा पत्र देख कर न बनाया गया हो, कुछ हिस्सा सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को देख कर जरुर बनाया गया है| 2005 में मनमोहन सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस राजिन्दर सच्चर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय कमेटी बनाई थी, जिसे मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति का अध्ययन करके उनकी हालत सुधारने के लिए सिफारिशें करने को कहा गया था|
सच्चर कमेटी ने अपनी सिफारिशों में मुसलमानों को नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी| मुसलमानों को आरक्षण कांग्रेस और कम्युनिस्टों के एजेंडे पर हमेशा से रहा है| सच्चर कमेटी और बाद में कांग्रेस के नेता रहे पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की दूसरी सिफारिश हिन्दू धर्म छोड़कर मुस्लिम या ईसाई बने दलितों या आदिवासियों को भी आरक्षण देने की थी, जबकि भाजपा धर्मांतरण करने वालों को आरक्षण के लाभ से वंचित करने की समर्थक है|
भाजपा का तर्क संविधान सभा में हुई बहस पर आधारित है, जहां संविधान सभा ने धर्म आधारित आरक्षण को ठुकरा दिया था| | सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है, और अल्पसंख्यकों में से भी मुसलमानों का| नरेंद्र मोदी ने 19 अप्रेल को पहले चरण की वोटिंग के बाद इस मुद्दे को भी जोरदार ढंग से उठाकर हिन्दू दलितों और आदिवासियों को सतर्क किया कि कांग्रेस उनका हक मार कर मुसलमानों को देना चाहती है| अपने बयान के साथ उन्होंने 2006 का मनमोहन सिंह का वह बयान भी याद दिलाया|
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीखे तेवरों का कारण सिर्फ यह नहीं है कि पहले चरण की वोटिंग कम हुई है, बल्कि उनका फीडबैक यह है कि मुसलमानों ने पहले की तरह ही एकतरफा भाजपा के खिलाफ वोटिंग की है, जबकि हिन्दू रामजन्मभूमि मन्दिर निर्माण और 370 हटाए जाने के बावजूद उनकी सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की नीति से खफा हैं|
इसलिए नरेंद्र मोदी ने पहले चरण के चुनाव के दो दिन बाद 21 अप्रेल को राजस्थान के बांसवाड़ा में अपने हिन्दू वोट बैंक को संभालने के लिए मुस्लिम राजनीति के खिलाफ दूसरे चरण का हमला किया, जब उन्होंने कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र से सम्पत्ति के पुनर्वितरण वाले अंश को उठाया| मोदी ने पहले ही कहा था कि कांग्रेस के आधे चुनाव घोषणापत्र पर मुस्लिम लीग की छाप है, तो बाकी के आधे घोषणा पत्र पर वामपंथियों की छाप है|
जिस मुद्दे को उन्होंने बांसवाड़ा और बाद में टोंक - सवाई माधोपुर और छतीसगढ़ के जांजगीर में उठाया| जाति आधारित जनगणना के बाद सम्पत्ति के सर्वेक्षण और उसके बंटवारे वाले कम्युनिस्ट सिद्धांत को नरेंद्र मोदी ने हिन्दू महिलाओं के मंगलसूत्र से जोड़ कर और हिन्दुओं की सम्पत्ति ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले मुसलमानों में बांट दिए जाने का डर दिखा कर उन्होंने चुनाव को पूरी तरह हिन्दू-मुस्लिम बना दिया है|
कांग्रेस भी पता नहीं किस दुनिया में है, किस क़ानून के तहत वह लोगों की अर्जित संपत्ति का पुनर्वितरण कर सकती है| कम्युनिस्ट विचारधारा की एक थ्योरी को कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में लिख दिया| नरेंद्र मोदी कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र के हवाले से हिन्दुओं को डरा रहे हैं कि द्रमुक और कम्युनिस्टों के समर्थन से कांग्रेस सरकार आ गई, तो न उनका सनातन धर्म सुरक्षित रहेगा, न उनकी जीवन भर की मेहनत से जोड़ी गई संपत्ति सुरक्षित रहेगी|
अब यह कांग्रेस को सोचना है कि उसके चुनाव घोषणा पत्र पर सोवियत संघ की पिट गई आर्थिक नीतियों का प्रभाव क्यों है, और उसके चुनाव घोषणा पत्र पर मुस्लिम लीग के विभाजनकारी एजेंडे की छाप क्यों है| लेकिन मोदी को विश्वास हो गया है कि वह विकास के एजेंडे पर नहीं जीत सकते, उन्हें अपने कोर हिन्दू वोट बैंक को ही बांधकर रखना होगा|
इसलिए बीच चुनाव में उन्होंने सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का चोला उतार फेंका, और 2014 वाले अपने मूल तेवरों में आ गए| 2014 में तो भीड़ से जयश्रीराम के नारे लगते थे, 21 अप्रेल के बाद अब भाजपा की हर रैली में जयश्री राम और जय हनुमान के नारे लग रहे हैं| कांग्रेस हैरान परेशान है कि यह क्या हो गया, वह चुनाव आयोग की दहलीज पर पहुंची है|
23 अप्रेल को हनुमान जयंती के मौके पर भी मोदी ने राजस्थान में रैली को संबोधित करते हुए कर्नाटक की वह घटना याद दिलाई जब एक दुकानदार अपनी दुकान में हनुमान चालीसा पढ़ रहा था तो उसे बुरी तरह पीटा गया था| मोदी ने कहा कि कांग्रेस का राज आया तो कोई हनुमान चालीसा भी नहीं पढ़ सकेगा| राजस्थान में यह सब क्यों, क्योंकि राजस्थान की बाकी बची 13 सीटें बहुत जरूरी हैं, और कर्नाटक में जिस दुकानदार को पीटा गया था वह राजस्थानी ही था|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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