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Kisan Andolan: क्या मोदी सरकार किसान विरोधी है?

Kisan Andolan: करीब दो वर्ष पहले किसानों ने जब दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाला था, तब कई महीने तक प्रदर्शन के बाद सरकार के साथ कुछ बिंदुओं पर सहमति बनी और किसान वापस लौट गए। मगर अब एक बार फिर कई मुद्दों के साथ किसानों ने 'दिल्ली चलो' के नारे के साथ आंदोलन शुरू कर दिया है।

आंदोलनकारी किसानों ने आज 15 फरवरी को रेल रोको तथा 16 फरवरी को भारत बंद का ऐलान किया है। सरकार और किसानों के बीच बातचीत अब तक बेनतीजा रही है। खबर यह भी निकल कर आ रही है कि सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए जिन ताकतों ने पूर्व में ऐसे हठधर्मी आंदोलन का समर्थन किया था, वही तत्व आसन्न लोकसभा चुनाव को देखते हुए एक बार फिर आंदोलन को हवा दे रहे हैं।

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गौरतलब है कि दो वर्ष पहले किसानों के आंदोलन के बाद केंद्र की मोदी सरकार को संसद से पारित तीन कृषि कानूनों को रद्द करना पड़ा था। तब सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी देने का वादा किया था। मगर बड़े किसानों की शिकायत है कि सरकार ने अपने वादे पूरे नहीं किए।

जब 2014 में नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आए थे तब किसानों को उनसे भारी उम्मीद थी। किसानों को लग रहा था कि उनकी शाश्वत समस्याओं का समाधान हो जाएगा। लेकिन दो-तीन साल बीतते ही किसानों के आंदोलन सड़क पर प्रकट होने लगे। आंदोलन स्वाभाविक थे या प्रायोजित यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इसके आधार पर मोदी सरकार के बारे में धारणा बनने लगी या बनाई जाने लगी कि वह किसान विरोधी हैं। क्या वास्तव में मोदी सरकार किसान विरोधी है?

मोटे तौर पर मोदी सरकार की कृषि नीति तात्कालिक और दीर्घकालिक रणनीति से प्रेरित है। इसके महत्वपूर्ण बिंदु हैं किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाना, पशुपालन जैसे कृषि संबंधित उद्योगों को प्रोत्साहित करना, कृषि आधारित प्रसंस्करण उद्योगों में निवेश बढ़ाना, कृषि को बाजार से जोड़ना, गांव में बुनियादी ढांचे की मजबूती प्रदान करना।

इसके लिए पहले आवश्यक कार्य था कृषि क्षेत्र के लिए बजटीय आवंटन को बढ़ाना। यहां मोदी सरकार के आलोचकों को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि मोदी राज में कुल बजट में कृषि क्षेत्र का हिस्सा पूर्व की सरकारों से अधिक है। हालांकि यह कृषि पर आधारित आबादी की तुलना में अभी भी बहुत कम है। कृषि क्षेत्र की ही तरह सरकार ने ग्रामीण ढांचे को मजबूती प्रदान करने पर भी जोर दिया ताकि आर्थिक मंदी से अर्थव्यवस्था को उबारा जा सके। सरकार की यह रणनीति कारगर होती दिख रही है। नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था में जो मंदी के लक्षण दिखने लगे थे, उसमें अब बहुत सुधार हुआ है।

आंदोलनकारी किसान एमएसपी के साथ ऋण माफी की भी मांग कर रहे हैं। कर्ज माफी किसानों की समस्या का समुचित समाधान नहीं है। अगर ऐसा होता जैसा कि मनमोहन सरकार के समय किया गया था, तो इसकी दोबारा मांग ही नहीं उठानी चाहिए थी। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना ही उनकी समस्या का वास्तविक समाधान है।

मोदी सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया और किसानों पर गठित स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार लागत से डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की पहल कर दी। हालांकि सरकार के फार्मूले को लेकर विपक्षी पार्टियां सरकार की आलोचना करती रहीं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस की मनमोहन सरकार इस आयोग की रिपोर्ट पर आठ साल चुप रही और एमएसपी देने की पहल ही नहीं की थी।

यहां असली चुनौती एमएसपी की घोषणा नहीं बल्कि उसे व्यवहार में सुनिश्चित करने की है। शांता कुमार समिति की रिपोर्ट के मुताबिक देश में केवल 6% किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिल पाता है यानी बाकी किसान आज भी औने-पौने दाम पर अपना अनाज बिचौलियों को बेचने पर मजबूर रहते हैं।

एमएसपी को लेकर हर साल भले ही शोर मचता हो लेकिन हकीकत यही है कि एमएसपी का लाभ उठाने में हरियाणा और पंजाब के किसान ही सबसे आगे हैं। साल 2016 की नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि पंजाब का हर किसान एमएसपी पर ही फसल बेचता है, यानी छह प्रतिशत राष्ट्रीय औसत में पंजाब की हिस्सेदारी 100% है।

रबी सीजन में गेहूं पर एमएसपी का लाभ लेने वाले 42% से ज्यादा किसान केवल पंजाब और हरियाणा से थे। पंजाब में लगभग 2000 मंडियां हैं। ऐसी व्यवस्था देश में तो क्या दुनिया में भी शायद ही कहीं हो। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जब तीन नए कृषि कानून लेकर आई थी तब मंडी के कारोबारियों और आढ़तियों ने अपने अस्तित्व पर संकट देख किसान आंदोलन का तड़का लगाया था।

एमएसपी को लेकर सरकार के सामने बजट का एक व्यवहारिक संकट भी है क्योंकि एमएसपी लागू होते ही बजट का एक बड़ा हिस्सा आरक्षित करना होगा, जिसका बोझ सरकार पर ही पड़ेगा। अभी फिलहाल 23 फसलों पर एमएसपी दी जाती है। मौजूदा रेट के हिसाब से सरकार सभी फसलें खरीदती हैं तो विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसका खर्च 18 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। खाद और सब्सिडी के 2 लाख करोड़ रूपया अलग से यानी कुल मिलाकर लगभग 20 लाख करोड रुपए का अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा। इसकी भरपाई कहां से होगी?

जाहिर सी बात है टैक्स बढ़ाकर। लेकिन यह मामूली टैक्स बढ़ोतरी से पूरा होने वाला नहीं है, इसके लिए कई गुना टैक्स बढ़ाना पड़ेगा। अगर ऐसा हुआ तो निवेश से लेकर निर्यात तक पर नकारात्मक असर दिख सकता है। निजी कारोबारियों पर एमएसपी पर खरीद की शक्ति बढ़ेगी तो वह भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव गिरने पर आयात करना शुरू कर सकते हैं, जिससे घरेलू बाजार में उथल-पुथल मच सकती है। समस्या भंडारण की भी है। सरकार अगर सारी फसल खरीद लेगी तो रखेगी कहां?

वर्तमान सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट का नेटवर्क खड़ा करके ग्रामीण कृषि मंडियों को उनसे जोड़ने की कोशिश की। तीन नए कृषि कानून लाकर देश के सभी छोटे-बड़े किसानों को लाभ पहुंचाने का खाका तैयार किया जो किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता था, लेकिन पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े किसानों के भारी विरोध के कारण वापस लेना पड़ा था। अब किसानों के ताजा आंदोलन के बाद फिर जो हालात पैदा हो रहे हैं, अगर उसे लेकर सही नीति नहीं अपनाई गई तो अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि ताजा प्रदर्शन के जरिए वे सरकार को दो वर्ष पहले किए गए उन वादों को याद दिलाना चाहते हैं, जो आंदोलन को वापस लेने की अपील करते हुए सरकार ने किए थे। वे वादे अब तक पूरे नहीं हुए। वहीं सरकार की ओर से ऐसे संकेत दिए जा रहे हैं कि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी वाला कानून सभी हितधारकों से परामर्श किए बिना जल्दबाजी में नहीं लाया जा सकता है।

प्रश्न है कि वादा करने के बावजूद सरकार आखिर अब तक क्या कर रही थी कि इस मसले पर किसानों के बीच स्पष्टता नहीं बन सकी? हालांकि विरोध प्रदर्शन से उपजने वाली अव्यवस्था की आशंका के मद्देनजर सरकार किसानों को रोकने की कोशिश कर रही है, लेकिन अगर किसान संगठन अपनी बात शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से जनता और सरकार के सामने रखना चाहते हैं, तो उन्हें बाधित क्यों किया जाना चाहिए?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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