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कवासी लखमा: भूपेश के शपथ ग्रहण में पहुंचने पर लगे थे लखमा दादी के नारे

नई दिल्ली। पंद्रह साल बाद छत्तीसगढ़ में सत्ता में लौटी कांग्रेस के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने मंत्रिमंडल का जो विस्तार किया है, उसमें शामिल किए गए कम से कम एक मंत्री कवासी लखमा का नाम देखकर अच्छा लगा। लखमा बस्तर संभाग की तेलंगाना से सटी कोंटा सीट से लगातार पांच बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। मंत्रिमंडल में उनका नाम देखकर 1998 के विधानसभा चुनाव की याद आ गई, जिसमें वह पहली बार विजयी हुए थे। राजनीति ने इस सवाल को बेमानी कर दिया है कि 32 फीसदी आदिवासी आबादी और 29 विधायकों के बावजूद छत्तीसगढ़ को कोई आदिवासी मुख्यमंत्री क्यों नहीं मिलता। इसके पक्ष/ विपक्ष में कई तर्क दिए जा सकते हैं और अक्सर झारखंड का उदाहरण रख दिया जाता है कि वहां तो आदिवासी मुख्यमंत्री भी भ्रष्टाचार का केंद्र बन गए! असल सवाल है कि क्या नई सरकार आदिवासियों के हक में फैसले लेगी? कवासी लखमा की मंत्रिमंडल में उपस्थिति आश्वस्त करती है कि आदिवासियों के साथ वह अन्याय नहीं होने देंगे।

चारों ओर लखमा दादी के नारे की गूंज

चारों ओर लखमा दादी के नारे की गूंज

लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीतने के बावजूद कवासी लखमा बहुत सहज हैं और उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 17 दिसंबर को जब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले थे, उस दिन सभागार में जब वह वहां पहुंचे तो वहां चारों ओर से लखमा दादी-लखमा दादी के स्वर सुनाई दे रहे थे। लोगों ने किसी भी अन्य विधायक या नेता की तुलना में उनका सबसे जोरदार स्वागत किया था। ऐसा नहीं है कि उनके रूप में बस्तर को कोई पहला मंत्री मिला है। पुराने मध्य प्रदेश से लेकर अजीत जोगी और रमन सिंह की सरकारों तक में बस्तर को समुचित प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। यही नहीं, केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी बस्तर संभाग से अरविंद नेताम ने प्रतिनिधित्व किया है।

क्या बदल जाएगा कवासी लखमा के मंत्री बनने से?

क्या बदल जाएगा कवासी लखमा के मंत्री बनने से?

तो फिर ऐसा क्या बदल जाएगा कवासी लखमा के मंत्री बनने से? इस सवाल की वस्तुनिष्ठता में मत जाएं। कवासी लखमा बस्तर के खांटी आदिवासियों का प्रतीक हैं, इसे समझने की जरूरत है। कांग्रेस ने जब उन्हें पहली बार 1998 के विधानसभा चुनाव में टिकट दिया था, तब अनेक लोगों को हैरत हुई थी, क्योंकि इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि वह लिखना पढ़ना नहीं जानते! उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद सामान्य थी। बिना पढ़े लिखे लोगों का विधायक, सांसद या मंत्री बनना कोई अजूबा नहीं है। उस चुनाव दौरान कोंटा के उनके कार्यालय में मेरी पहली बार उनसे मुलाकात हुई थी। शहरी पैमाने पर किसी को भी हैरत होती कि इन्हें कैसे टिकट दे दिया गया है। टूटी फूटी हिंदी में उन्होंने वादा किया था कि चुनाव जीतने के बाद तुम्हारा आफिस जगदलपुर आऊंगा ना दादी! वह हजार वोट से भी कम के अंतर से उस समय दो बार के सीपीआई के विधायक मनीष कुंजाम को पराजित कर विजयी हुए। बस्तर में 'दादी' आम बोलचाल का संबोधन है और कवासी के चाहने वाले उन्हें लखमा दादी कहते हैं।

'बस्तर के आदिवासियों की आवाज बनकर रायपुर में रहना होगा'

'बस्तर के आदिवासियों की आवाज बनकर रायपुर में रहना होगा'

मई, 2013 में जब कांग्रेस के नेताओं के काफिले पर नक्सलियों ने हमला किया था, जिसमें विद्याचरण शुक्ल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल सहित कांग्रेस के अनेक नेता मारे गए थे, तब कवासी लखमा और अजीत जोगी जैसे नेता बच गए थे। तब ऊंगली लखमा पर भी उठी थी। लखमा को जिन लोगों ने करीब से देखा है, वह शायद ही यकीन करें कि वह सत्ता की किसी दुरभिसंधि का हिस्सा हो सकते हैं। उनका सब कुछ सार्वजनिक है। मंत्री बनने के साथ लखमा दादी पर बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। याद नहीं पड़ता कि पिछली बार कोंटा विधानसभा सीट से जीता कोई विधायक मंत्री बना हो। ध्यान रहे, कोंटा नक्सली हिंसा के केंद्र सुकमा जिले में ही आता है। जाहिर है, उन्हें बस्तर के आदिवासियों की आवाज बनकर रायपुर में रहना होगा। उनके पास वाकई बड़ा मौका है कि वह हिंसा से ग्रस्त बस्तर की पहचान बदल दें।

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