NCP in Karnataka: पवार की नई गुगली से कांग्रेस के आगे कुआं, पीछे खाई

जैसे केजरीवाल ने पंजाब, गोवा और गुजरात में कांग्रेस को चूना लगा कर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल किया है, वैसे ही अब एनसीपी को भी कांग्रेस को चूना लगा कर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा वापस हासिल करना है।

karnataka election 2023 sharad pawar party ncp vs congress in Karnataka Contest

NCP in Karnataka: शरद पवार महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देश के सम्मानित नेता हैं| लेकिन उन्हें समझना आसान ही नहीं, नामुमकिन है| भले ही वह काफी बूढ़े हो चुके हैं, कैंसर ने उनकी आवाज को भी प्रभावित कर दिया है, लेकिन उनका राजनीतिक दिमाग जस का तस है| हर रोज उनकी नई राजनीतिक गुगली उन्हें सुर्ख़ियों में ले आती है| विपक्ष के साथ खड़े हो कर अडानी के बिजनेस की जेपीसी से मांग करने वाले शरद पवार ने संसद का सत्र खत्म होते ही जेपीसी की मांग के विरोध की गुगली मार दी| पवार की इस गुगली से कांग्रेस सकपका गई थी| कांग्रेस की प्रवक्ता अलका लांबा ने उन्हें स्वार्थी, लालची, मोदी और अडानी का एजेंट, क्या क्या नहीं लिखा|

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ऐसा लगा कि कांग्रेस एनसीपी का गठबंधन अब टूट जाएगा| लेकिन पांच दिन बाद फिर गुगली मारते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से मिलने दिल्ली आ गए| इस बैठक में हालांकि उन्होंने राहुल गांधी से कोई बात नहीं की, लेकिन राहुल गांधी के लिए एक बार फिर विपक्षी एकता की सुपारी ले ली| उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि भाजपा के मुकाबले एक उम्मीदवार खड़ा करने के लिए वह सभी विपक्षी दलों के नेताओं से बात करेंगे। लेकिन अगले ही दिन पवार ने फिर एक गुगली मारी, और कर्नाटक में कम से कम 40 सीटों पर एनसीपी के उम्मीदवार खड़े करने का एलान कर दिया|

कांग्रेस की यही दिक्कत है, उसका घर फूंक चुका है, उसके पल्ले कुछ नहीं बचा, लेकिन खुद को पुनर्जीवित करने के लिए वह त्याग करने को तैयार नहीं| शरद पवार ने कांग्रेस से कर्नाटक में 40 सीटें मांगी थी| असल में महाराष्ट्र के बॉर्डर पर लगते कर्नाटक के इलाकों में मराठी भाषियों का अच्छा खासा प्रभाव है|

1956 में बाम्बे प्रेजिडेंसी के मराठी भाषी बेलगाम जिले को प्रशासनिक दृष्टि से मैसूर में शामिल कर दिया गया था| तब भाषाई आधार पर राज्यों का बंटवारा नहीं हुआ था| लेकिन 1973 में जब मैसूर प्रांत का नाम बदल कर कर्नाटक रखा गया, तब प्रशासनिक दृष्टि से मैसूर में शामिल किए गए बेलगाम के 814 मराठी भाषी गांव भी कर्नाटक का हिस्सा बन गए| तब से महाराष्ट्र एकीकरण समिति नाम का एक संगठन इन इलाकों को महाराष्ट्र में शामिल करने का आन्दोलन चला रहा है| शरद पवार महाराष्ट्र एकीकरण समिति का समर्थन करते रहे हैं| एनसीपी इसी महाराष्ट्र एकीकरण समिति के साथ मिल कर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है|

कर्नाटक के इसी इलाके में शरद पवार ने कांग्रेस से सीटें मांगी थी, लेकिन कांग्रेस शरद पवार के पांव फैलते देखना नहीं चाहती| जबकि एनसीपी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा वापस दिलाने के लिए शरद पवार को जो भी करना पड़ा, वह करेंगे| इस इलाके में जिन कांग्रेसियों और भाजपाईयों को टिकट नहीं मिलेगा, उनके लिए शरद पवार ने अपनी पार्टी के दरवाजे खोल दिए हैं| जैसे केजरीवाल ने पंजाब, गोवा और गुजरात में कांग्रेस को चूना लगा कर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल किया है, वैसे ही अब एनसीपी को भी कांग्रेस को चूना लगा कर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा वापस हासिल करना है| एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने यही दलील दी है| उन्होंने एलान किया है कि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा फिर से हासिल करने के लिए एनसीपी को दूसरे राज्यों में पैर फैलाने होंगे|

अब कांग्रेस के सामने समस्या यह है कि अगर वह एनसीपी के साथ गठबंधन करके उन्हें कुछ सीटें दे देती है तो इस पूरे इलाके में भाजपा को फायदा होगा| कांग्रेस के लिए इधर कुआं उधर खाई वाली स्थिति है, लेकिन एनसीपी ने पूरी तैयारी कर ली है| क्योंकि अब क्षेत्रीय पार्टी बन चुकी है, इसलिए उसे चुनाव आयोग से गुहार लगानी पड़ी कि कर्नाटक में चुनाव लड़ने के लिए उसे अपना चुनाव निशान इस्तेमाल करने दिया जाए| चुनाव आयोग ने एनसीपी को इजाजत दे भी दी है|

जेडीएस ने भी इसीलिए हैदराबाद से लगते तेलुगू भाषी कर्नाटक में भारत राष्ट्र समिति को गठबंधन में सीटें देने से इनकार कर दिया, क्योंकि ऐसा होने से उस इलाके में भाजपा को फायदा होता| भारत राष्ट्र समिति के अध्यक्ष चन्द्रशेखर राव ने तो जेडीएस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने का बाकायदा एलान भी कर दिया था, लेकिन कुमार स्वामी ने अब उन्हें चुनाव नहीं लड़ने के लिए मना लिया है|

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    जबकि शरद पवार की मजबूरी है कि पी.ए.संगमा के कारण एनसीपी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था, लेकिन बाद में संगमा के नई पार्टी बना लेने के बाद एनसीपी का प्रभाव क्षेत्र लगातार घटता गया और अब उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छिन गया है| पवार अगर अपनी जिद्द पर कायम रहते हैं, और कर्नाटक की 40 सीटों पर चुनाव लड़ते हैं, तो इसका नुकसान कांग्रेस को ही होगा|

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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