Sharad Pawar: शरद पवार ने फिर संभाला विपक्षी एकता का मोर्चा

राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर वीर सावरकर पर अपने रूख में बदलाव का कोई संकेत नहीं दिया है, जिस पर शरद पवार और उद्धव ठाकरे दोनों ही नाराज हैं। वे चाहते हैं कि राहुल गांधी सावरकर पर अपना बदला रुख स्पष्ट करें।

Sharad Pawar meets Mallikarjun Kharge and Rahul Gandhi over opposition unity

Sharad Pawar: कांग्रेस की प्रवक्ता अलका लांबा ने 8 अप्रेल को लिखा वह ट्विट अभी तक हटाया नहीं है, जिसमें उन्होंने शरद पवार को डरपोक और लालची बताया था| इतना ही नहीं उसमें अलका लाम्बा ने यह भी लिखा था कि निजी हितों के लिए वह तानाशाही सत्ता के गुण गा रहे हैं, हालांकि शरद पवार ने अपने इंटरव्यू में जेपीसी की मांग को फिजूल बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ में तो कुछ नहीं कहा था| इस ट्विट में उन्होंने शरद पवार की अडानी के साथ मुलाक़ात की एक पुरानी फोटो भी शेयर की थी|

Sharad Pawar meets Mallikarjun Kharge and Rahul Gandhi over opposition unity

शरद पवार यूपीए के सबसे पुराने पार्टनर हैं, वह सोनिया गांधी से भी सीनियर कांग्रेसी हैं| अलका लांबा ने जल्दबाजी में शरद पवार के खिलाफ इसलिए ट्विट कर दिया था, क्योंकि उन्होंने अडानी के व्यापार की जांच के लिए जेपीसी के गठन की मांग का विरोध किया था| शरद पवार के बदले रूख से पूरी कांग्रेस में सन्नाटा छाया हुआ था, इस सन्नाटे को अलका लांबा ने तोड़ा था|

शरद पवार के साथ विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ने वाले तारिक अनवर अब कांग्रेस में लौट चुके हैं, और फिर से कांग्रेस के महासचिव बना दिए गए हैं| वह एक मात्र नेता हैं, जिन्होंने अलका लांबा का समर्थन किया| शायद कांग्रेस ने आने वालों दिनों में शरद पवार का रूख देखने के लिए ज्यादा हल्ला नहीं किया, बल्कि अलका लांबा से भी बयान दिला दिया था कि वह उनका व्यक्तिगत ट्विट है, कांग्रेस की राय नहीं|

शरद पवार का जेपीसी की मांग से पीछे हटना, उनका विपक्ष को गच्चा देना माना जा रहा था| पहले वीर सावरकर और बाद में अडानी के मुद्दे पर उन्होंने राहुल गांधी के दोनों बड़े मुद्दों की हवा निकाली थी| बाद में प्रधानमंत्री की डिग्री के मुद्दे पर भी विपक्ष की हवा निकाल दी थी| उनके भतीजे और महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता अजीत पवार ने विपक्ष के दो तीन मुद्दों के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी थी| अजित पवार की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस के साथ हुई गुपचुप मुलाक़ात ने भी सियासी पारा चढ़ा दिया था| ऐसा लगने लगा था कि शरद पवार विपक्ष को धोखा देकर भाजपा के साथ किसी तरह की बात चला रहे हैं|

यह कोई पहली बार नहीं है, जब शरद पवार ने इस तरह के संकेत दिए हों कि वह मोदी के साथ समझौता कर सकते हैं| 2014 में तो बाकायदा भाजपा को बाहर से समर्थन देकर एनसीपी ने महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनवाई थी। मोदी सरकार ने 2017 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित कर उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश की थी| फिर 2019 में भी महाविकास अघाड़ी का गठन होने से पहले उनके भतीजे अजीत पवार ने देवेन्द्र फडनवीस के साथ उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी|

इन सब घटनाओं से इधर कांग्रेस में हडकंप मचा हुआ था, तो उधर उद्धव ठाकरे कैंप में भी खलबली मच गई थी, क्योंकि अगर शरद पवार की एकनाथ शिंदे के साथ कोई अंडरस्टेंडिंग बनती है, तो उद्धव ठाकरे कहीं के नहीं रहेंगे| शरद पवार के भरोसे ही उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ा था| अगर मुम्बई महानगर पालिका और महाराष्ट्र की अन्य महानगर पालिकाओं के चुनावों में उद्धव ठाकरे को कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन नहीं मिला, तो उनकी राजनीति ही खत्म हो जाएगी| इसलिए उद्धव ठाकरे और संजय राउत भागे भागे शरद पवार के पास पहुंचे|

इस मीटिंग में उद्धव ठाकरे ने शरद पवार से पूछा कि वह क्या करने जा रहे हैं, क्योंकि उनके बयान भी विपक्षी एकता के खिलाफ हैं ,और अजीत पवार को ईडी से क्लीन चिट दिला कर भाजपा उन पर भी डोरे डाल रही है| शरद पवार के अडानी समर्थक बयानों को उनकी राजनीतिक गुगली माना जा रहा था। लेकिन अलका लांबा जैसी कांग्रेस की छुटकी नेता से बेइज्जती करवाने के बाद शरद पवार ने 13 अप्रेल की रात को मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से मुलाक़ात करके एक और गुगली मार दी| उनकी इस ताज़ा गुगली से वह नीतीश कुमार से भी बड़े पल्टूराम बन गए हैं| इतनी जल्दी तो नीतीश कुमार ने भी कभी पलटी नहीं मारी थी|

इसके पीछे की कहानी यह है कि राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर वीर सावरकर पर अपने रूख में बदलाव का कोई संकेत नहीं दिया है, जिस पर शरद पवार और उद्धव ठाकरे दोनों ही राहुल गांधी से नाराज हैं| वे चाहते हैं कि राहुल गांधी कोई न कोई संकेत दें| यह बात उद्धव ठाकरे ने शरद पवार से मुलाक़ात के समय भी कही है, क्योंकि भाजपा महाराष्ट्र में इसी को मुद्दा बना रही है| मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना ने तो बाकायदा पूरे राज्य में सावरकर यात्राओं का आयोजन शुरू किया हुआ है।

इसी बीच बात को बिगड़ता देख मल्लिकार्जुन खड़गे ने शरद पवार को फोन किया और एक बार दिल्ली आकर मिलने के लिए कहा था| शरद पवार से हुई मुलाक़ात के बाद मीडिया से बात करते हुए खड़गे ने उनका आभार भी जताया कि वह मुलाक़ात के लिए मुम्बई से दिल्ली आए| बैठक में राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल भी मौजूद थे, लेकिन इस बैठक में शरद पवार और राहुल गांधी में कोई सीधी बातचीत नहीं हुई| शरद पवार से मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल ही बातें करते रहे|

कांग्रेस ने शरद पवार की हर बात को सुना और उनकी हर बात को मानने का वचन दिया है| शरद पवार ने मल्लिकार्जुन खड़गे से कहा कि राहुल गांधी को मुम्बई आकर उद्धव ठाकरे से मिलना चाहिए| वीर सावरकर विवाद के बाद जब उद्धव ठाकरे ने विपक्ष की मीटिंग का बायकाट किया था, तो उसके बाद संजय राउत ने राहुल गांधी से मुलाक़ात की थी| इस मुलाक़ात में उन्होंने उद्धव ठाकरे की तरफ से राहुल गांधी को मातोश्री में आने का न्योता दिया था| लेकिन कांग्रेस उद्धव ठाकरे का कद बाल ठाकरे जितना नहीं बनाना चाहती कि देश का हर बड़ा नेता उन्हें मातोश्री में मिलने जाए, इसके बावजूद मजबूरी क्या नहीं करवाती| बताया जा रहा है कि विपक्षी एकता के लिए राहुल गांधी खुद क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मुलाकातें करने जाएंगे, इसी सिलसिले वह उद्धव ठाकरे से मिलने मातोश्री में भी जाएंगे|

शरद पवार और कांग्रेस नेताओं की मुलाक़ात में अरविन्द केजरीवाल, ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव को लेकर भी बात हुई| कांग्रेस की तरफ से शरद पवार को इन तीनों से संपर्क साधने के लिए आग्रह किया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है| नीतीश कुमार की केजरीवाल से मुलाकात के बाद अब शरद पवार और मल्लिकार्जुन खड़गे भी उनसे मुलाक़ात करेंगे| अगर केजरीवाल ने जरा सी भी दिलचस्पी दिखाई (हालांकि इसकी कोई संभावना नहीं है) तो राहुल गांधी भी केजरीवाल से मुलाक़ात करेंगे|

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    अगर विपक्षी एकता में केजरीवाल को हर राज्य में कुछ सीटें मिलने की गारंटी मिले तो यह संभव हो सकता है, क्योंकि राष्ट्रीय पार्टी बनने के बाद अब केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं बढ़ गई है| पिछले तीन दिन से विपक्षी एकता के जो प्रयास हुए हैं, उससे एक बात उभर कर आई है कि तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का गठबंधन करवाने के लिए सीपीएम बंगाल में गठबंधन से बाहर रहने को तैयार है| क्योंकि ममता की बड़ी आपत्ति सीपीएम को लेकर है| इसी तरह केरल में भी सीपीएम विपक्षी एकता से बाहर रहेगी, क्योंकि वहां कांग्रेस ही सीपीएम के सामने टक्कर में है|

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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