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जुम्मे की छुट्टी रद्द कराने गए थे, ऊर्दू स्कूल गले पड़ गया

बिहार और झारखण्ड में शुक्रवार की छुट्टी का मुद्दा अभी थमा भी नहीं था, अब सामान्य स्कूलों के नाम के आगे ऊर्दू जोड़ने का मामला सामने आ गया है। झारखंड के अंदर ऐसे 519 सरकारी स्कूलों की पहचान हुई थी जहां स्थानीय मुस्लिम समाज के दबाव में रविवार की जगह शुक्रवार को स्कूल बंद रखा जाता था। यह जानकारी झारखंड के शिक्षा विभाग ने सरकार को सौंपी है। प्रशासनिक दबाव के बाद 519 में से 469 स्कूलों में अब रविवार को अवकाश रहने लगा है।

Jharkhand Urdu schools friday as holiday

लेकिन तमाम दबाव के बाद भी 50 स्कूल ऐसे अब भी बचे हुए हैं जो शुक्रवार को ही बंद हो रहे हैं। ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल उठता है प्रशासनिक दबाव में जहां स्कूल रविवार को बंद होने प्रारंभ हुए हैं, भविष्य में वे फिर से स्कूल शुक्रवार को बंद नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी है?

बात सिर्फ शुक्रवार की छुट्टी तक नहीं है, अब एक मामला स्कूलों के नाम के साथ ऊर्दू जोड़ लेने का सामने आया है। 427 ऐसे सामान्य सरकारी स्कूलों की पहचान झारखंड में हुई है, जिन्होंने खुद से ही अपने नाम में ऊर्दू लगाना प्रारंभ कर दिया। ऐसे अपने नाम में ऊर्दू जोड़ लेने वाले सर्वाधिक 156 सामान्य स्कूल देवघर में है। ऐसे ही गोड्डा में इनकी संख्या 88, गिरिडीह में 67, पलामू में 50 है।

तमाम प्रशासनिक प्रयासों के बाद भी 57 सामान्य स्कूलों के नाम से अब तक ऊर्दू शब्द नहीं हटाया जा सका है। पलामू, जामताड़ा और गोड्डा में बहुत कोशिशों के बाद भी मुस्लिम समाज रविवार को स्कूल बंदी पर तैयार नहीं हो रहा है। सरकार का आदेश होने के बाद भी एक वर्ग विशेष के लोग सरकार के आदेश को मानने से इंकार कर रहे है।

शुक्रवार की छुट्टी से बड़ा है सीमांचल का संकट

झारखंड के स्कूलों में शुक्रवार की छुट्टी की चर्चा तो खूब हुई लेकिन बिहार के सरकारी स्कूलों में शुक्रवार की छुट्टी क्यों हो रही है, इस पर बहुत चर्चा नहीं हुई। बिहार के कटिहार में 136 ऐसे सरकारी स्कूल हैं, जहां शुक्रवार को छुट्टी रहती है। किशनगंज के पोठिया, बहादुरगंज, ठाकुरगंज और पूर्णिया के वायसी, जोकीहाट के 179 स्कूलों में भी शुक्रवार का दिन ही छुट्टी के लिए तय किया गया है। अगर आप मानचित्र पर इन स्कूलों की लोकेशन देखेंगे तो पायेंगे कि ये सभी स्कूल बिहार नेपाल बार्डर के इलाके में हैं जिन्हें यहां सीमांचल कहा जाता है।

पिछले कुछ सालों से जिस तरह बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र में मुस्लिम और क्रिश्चियन मिशनरियों की सक्रियता बढ़ी है, अचानक मदरसों और चर्चों का निर्माण बढ़ रहा है, उसके बाद यह चिन्ता स्वाभाविक है कि सरकारी स्कूलों में रविवार की जगह शुक्रवार की छुट्टी और प्रार्थना हाथ जोड़कर करने की जगह हाथ को खुला रखकर करने की नई परंपरा डाली गयी है। ईश्वर का नाम लेकर की जाने वाली पुरानी प्रार्थना में बदलाव कर स्कूलों में जबरन नई प्रार्थना प्रारंभ करवाई गयी है।

इस तरह की रिपोर्ट सामने आई है, जहां बताया गया है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में जमीन खरीदने के लिए बाहर से पैसा आ रहा है। सीमांचल में मुस्लिम आबादी पहले से बढ़ी है और वे जमीन भी खरीद रहे हैं। बिहार के अंदर ऐसे क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं, जहां गैर मुसलमानों का बिना अनुमति प्रवेश अघोषित तौर पर वर्जित होगा। पिछले कुछ सालों में बिहार के अंदर कई क्षेत्रों में शोभा यात्रा निकालने के दौरान कई आपसी झड़प भी दिखी हैं। आपसी विवाद की बढ़ती ऐसी घटनाओं पर मुसलमान पक्षकारों का कहना है कि जहां मुसलमान बहुसंख्यक है, वहां से शोभा यात्रा क्यों निकाली जा रही है?

अगर इस तर्क को सही मान लें तो फिर जहां हिन्दू बहुल आबादी है, वहां मदरसा, मस्जिद, चर्च पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? हिन्दू बहुल क्षेत्रों से जमात के लोगों और पादरियों का गुजरना प्रतिबंधित कर दिया जाए। यह भारत जैसे उदारमना देश में किसे स्वीकार्य होगा? लेकिन पीएफआई और जमात वाले अपने कट्टरता के एजेन्डे के साथ मैदान में है।

मुस्लिमों के प्रबुद्ध वर्ग की तरफ ऐसी कट्टरपंथी सोच का विरोध होना चाहिए जो नहीं हो रहा। जिसका परिणाम है कि पीएफआई (पोपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) जैसे कट्टरपंथी संगठन "इंडिया 2047: टूवार्ड रूल ऑफ इंडिया" जैसी योजना के साथ भारत में सक्रिय हैं। यह दस्तावेज बिहार पीएफआई के ठिकाने से बरामद हुआ है।

बिहार पुलिस के अनुसार पीएफआई बिहार में सिमी (स्टुडेंट इस्लामिक मूवमेन्ट आफ इंडिया) के पुराने कार्यकर्ताओं को तलाश कर उन्हें फिर से सक्रिय कर रहा है। पुराने लोगों को नए सिरे से प्रशिक्षण देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यह पूरी तरह से एक गुप्त संगठन की तरह काम करेगा और कथित तौर पर मुसलमानों पर हुए अत्याचारों का गिन गिन कर बदला लेगा। सरल शब्दों में कहें तो बिहार के अंदर एक आतंकी संगठन को सक्रिय करने की तैयारी है।

बात दो साल पहले की है। फरवरी का महीना था, जब दरभंगा के जमालचक में एक सर्वेक्षण के लिए आए 17 लोगों की टीम को बंधक बना लिया गया। जमालचक दरभंगा का मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। मुसलमानों की भीड़ ने इन 17 युवकों की एक ना सुनी और उन्हें राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के लिए जानकारी इकट्ठी करने के लिए आई टीम का नाम दे दिया गया। उस टीम के साथ जबर्दस्ती की गई और हाथापाई भी हुई।

स्थानीय पुलिस ने बहुत मुश्किल से उन्हें भीड़ से निकाला। अराजक भीड़ ने उस टीम से सादे पेपर पर लिखवाया कि हम यह सारा काम बजरंग दल के लिए कर रहे हैं। जमालचक में हुई यह अपने तरह की तीसरी घटना थी। बिहार के अंदर जिन क्षेत्रों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और पीएफआई जैसा कोई कट्टरपंथी संगठन सक्रिय है, वहां ऐसी घटनाएं आम हैं।

बहरहाल, बिहार और झारखंड में शुक्रवार (जुमे) के दिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में दी गई छुट्टी के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि यहां मुसलमान बच्चे अधिक संख्या में हैं। इसलिए उनकी सुविधा को ध्यान रख कर यह छुट्टी रख दी गई तो यह दलील तब सही मानी जा सकती है, जब इस देश में पहले से दी जा रही रविवार की छुट्टी का आधार भी मजहब होता। हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह देश संविधान से चल रहा है, न कि शरिया कानून से।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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