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असमंजस में फंसे झारखंड में सज गयी है विधायकों की मंडी

झारखंड में 'ऑपरेशन लोटस' की आशंका से भरे माहौल में खबर आ रही है कि यहां विधायकों की मंडी भी सज गयी है। रांची से रायपुर ले जाकर भी सत्तापक्ष के विधायक को बिकने से रोक लिया जाएगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। इसलिए इस समय सत्तापक्ष का हर विधायक एक दूसरे को आशंका भरी निगाहों से देख रहा है। हेमंत सोरेन सरकार की ओर से रायपुर पहुंचाए गए विधायकों की संख्या महज 32 है, जबकि सरकार बचा लेने के लिए 82 सदस्यों वाली विधानसभा में 42 समर्थक विधायकों की आवश्यकता है।

jharkhand political crisis MLAs being lured by parties

लिहाजा, आगे झारखंड मध्यावधि चुनाव की ओर जाएगा या भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार बन जाएगी, यह अगले चंद दिनों में तय हो जाना है। 2024 में केंद्र की राजनीति में दमदार वापसी के लिए जरूरी है कि भाजपा चौदह लोकसभा सीटों वाले झारखंड राज्य में अपनी सरकार बनाये। लेकिन भाजपा की इस जरुरत के बीच जीत हार का मामला फिफ्टी-फिफ्टी में जा फंसा है। झारखंड में सरकार बचाने और गिराने को लेकर घात प्रतिघात का दिलचस्प खेल जारी है।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन के नेतृत्व में दिसंबर 2019 से राज्य में महागठबंधन की सरकार है। जब से यह सरकार बनी है, भाजपा को निरंतर खटक रही है। रह रहकर निशाने पर लेकर इसे गिराने की अफवाहें उठती रही है। लेकिन इस बार बात आर-पार की लग रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खदान घोटाले में पकड़े गए हैं। उन पर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने का आरोप है। चुनाव आयोग ने शिकायत पर उनकी विधायकी को लेकर राज्यपाल को सूचित किया है। यह सूचना कैसी है, इस पर 'बंद मुट्ठी लाख की' वाले अंदाज में राजभवन ने चुप्पी साध रखी है। इस चुप्पी से ही खलबली मची है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए सरकार के समर्थक विधायकों को समेटकर रखना बड़ी चुनौती है क्योंकि उनकी खुद की विधायकी खतरे में फंसी है।

ताजा हालात में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पैरों तले धीरे धीरे जमीन खिसक रही है। होनी की आशंका से बचने के लिए सहयोगी कांग्रेस की सलाह पर उन्होंने गिने चुने समर्थक विधायकों को समेटकर रांची से रायपुर पहुंचा दिया है। राज्य में 82 सदस्यीय विधानसभा है। संख्या बल के मुताबिक सत्तारुढ गठबंधन के साथ कम से कम 42 विधायकों का समर्थन होना चाहिए लेकिन रायपुर में सुरक्षित पहुंचाए गए विधायकों की संख्या महज 32 बताई जा रही है।

ऐसे में हारी बाजी को जीतने के लिए पांच सितंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक दिवसीय विधानसभा का सत्र बुलाने का नया दांव चला है। शिक्षक दिवस के मौके पर बुलाए गए इस सत्र में वह जैसे तैसे विश्वास मत हासिल कर लेना चाहते हैं ताकि अगले छह महीने तक सरकार में बने रहने की वैधानिक खानापूर्ति की जा सके।

इस दरम्यान सरकार बनाने का ख्बाव देख रही भारतीय जनता पार्टी के लिए भी सकून वाली स्थिति नहीं है। जिस तरह सत्तापक्ष में राजभवन से आने वाले संभावित आदेश को लेकर संकट के घने बादल छाए हुए हैं, उसी तरह भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी की विधायकी पर तलवार लटक रही है। उनकी स्थिति को लेकर विधानसभा अध्यक्ष रविन्द्रनाथ महतो का फैसला आना है।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के कोटे से विधानसभा अध्यक्ष बने महतो मरांडी के खिलाफ सुनवाई पूरी कर चुके हैं। जैसे राज्यपाल ने हेमंत सोरेन की विधायकी का फैसला रोक रखा है वैसे ही विधानसभा अध्यक्ष ने बाबूलाल मरांडी की विधायकी का फैसला सुरक्षित कर रखा है। इससे भाजपा में भी आशंकाओं का दौर जारी है। झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी को लेकर ही भाजपा विधानसभा में सरकार को घेरने की रणनीति बुन रही है। आगे भी उनके नेतृत्व में ही नई सरकार बनाने की बात है। विधायकी जाने की सूरत में बाबूलाल मरांडी की जगह भाजपा का नेतृत्वकर्ता कौन होगा इस पर अभी कोई राय सार्वजनिक नहीं हुई है।

बाबूलाल मरांडी ने बीते विधानसभा चुनाव में अपनी अलग पार्टी झारखंड विकास मोर्चा के जरिए चुनाव लड़ा था। उनकी पार्टी के तीन विधायक जीते थे। उन्होंने चुनाव के बाद खुद की पार्टी को आधे अधूरे तरीके से भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर दिया था। भाजपा ने ससम्मान उनको अपने विधायक दल का नेता तो बना लिया, लेकिन उनकी पार्टी के दो अन्य विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की भाजपा में आने की बजाय कांग्रेस में चले गए। लिहाजा, यह विलय कितना सही औऱ कितना गलत था इसकी सुनवाई विधानसभा अध्यक्ष की अदालत में पहुंच गई। अध्यक्ष रविन्द्रनाथ महतो ने अब तक बाबूलाल मरांडी की सदस्यता के मसले पर फैसले को उसी तरह लटकाए रखा है जिस तरह हफ्ते भर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता का मसला राज्यपाल रमेश बैस के दरबार में लटका पड़ा है।

फिलहाल माहौल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता पर आंच की आशंका से भरा है। राज्यपाल के फैसले के आधार पर ही तय होना है कि मुख्यमंत्री को तत्काल इस्तीफा देकर फिर चुनाव में जाने की जरुरत पड़ेगी या कि आगे उनके चुनाव पर ही कुछ समय के लिए रोक लगा दी जाएगी। चुनाव लड़ने पर रोक लगने की सूरत में मुख्यमंत्री के लिए अपना उत्तराधिकारी पेश करना जरुरी हो जाएगा। उत्तराधिकारी तय करना ही मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए नाकों चने चबाने जैसा है।

लेकिन जानकार मानते हैं फिर चुनाव लड़कर जीत आने की प्रक्रिया से गुजरने से पहले सोरेन सरकार के लिए विधानसभा में विश्वासमत हासिल करना एक बड़ी चुनौती बनने वाली है। इसकी झलक कोलकाता में कांग्रेस के तीन विधायकों की कैश के साथ हुई गिरफ्तारी के दौरान मिल चुकी है। उन तीनों को कांग्रेस पार्टी ने निलंबित कर रखा है।
विधानसभा में कांग्रेस के 18 विधायक हैं। इनमें से कई पर विश्वास मत के दौरान टूटकर भाजपा के पक्ष में आने का सर्वाधिक खतरा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा 30 विधायकों के साथ सदन में सबसे बड़ा दल है। प्रतिपक्षी भाजपा के पास सिर्फ 25 विधायक हैं। ऐसे में सबसे बड़े दल झामुमो के रहते किसी छोटे राजनीतिक दल को सरकार बनाने का न्यौता देना भी राज्यपाल के लिए कठिन काम है।

ऐसे में झामुमो में ही बड़ी टूट हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। गुपचुप तरीके से दावा किया जा रहा है कि कैश के साथ रंगे हाथ पकड़े गए विधायकों के अलावा टूटकर पाला बदलने वाले विधायकों की संख्या बड़ी है। इस जानकारी के बाद ही सत्ता पक्ष ने खरीदारों से संपर्क तोड़ने के लिए समस्त विधायकों को समेटकर पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर पहुंचाने का फैसला लिया। रायपुर पहुंचे विधायकों की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ बयान आ रहे हैं जो इस बात को बल दे रहे हैं कि पांच सितंबर को जब झारखण्ड में विधानसभा सजेगी तो उसी समय बाहर विधायकों की मंडी भी लगेगी। कौन किसके हाथ बिक जाएगा, कौन जानता है?

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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