Harivansh: क्या सोमनाथ चटर्जी जैसा हाल होगा हरिवंश का?
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह से उनकी अपनी ही पार्टी जनता दल (यू) के नेता नाराज हैं। क्या उनका हश्र भी वही होगा जो कभी सोमनाथ चटर्जी का हुआ था?

Harivansh: इतिहास के बारे में कहावत है, वह खुद को दोहराता है। तो क्या एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराने की तैयारी में है? संसद के नए भवन के उद्घाटन के मौके पर जनता दल यूनाइटेड सांसद और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के शामिल होने को उनका दल पचा नहीं पा रहा है। ठीक चौदह साल दस महीने पहले की तरह की स्थितियां बनती दिख रही हैं। तब सोमनाथ चटर्जी के रूख को सिद्धांतवाद की कड़वी चाशनी में लगातार डूबा रहने वाला उनका दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नहीं पचा पाया था। यह बात और है कि उन दिनों प्रकाश करात की अगुआई वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सोमनाथ चटर्जी को अगले ही दिन दल की प्राथमिक सदस्यता से निकाल बाहर किया था। हरिवंश पर उनका दल हमलावर तो है लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है।
साल 2008 में डॉक्टर मनमोहन सिंह की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने तब अमेरिका से परमाणु समझौता किया था। इसके लागू होने के बाद भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन की गति तेज होने वाली थी। लेकिन अपने विचारधारा के बाड़े में बंद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अमेरिका के साथ भारत सरकार का सहयोग स्वीकार नहीं कर पा रही थी। उसके गुस्से की वजह यह रही कि उन दिनों कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को बाहर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समर्थन दे रही थी।
एक साक्षात्कार में एक बार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने छुट्टियां बिताने की पसंदीदा जगहों में यूरोप और अमेरिका की ही कुछ जगहों को बताया था। लेकिन उसी अमेरिका का परमाणु मुद्दे पर समर्थन प्रकाश करात को नहीं पचा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में वाममोर्चे ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से समर्थन वापस ले लिया था। इससे तत्कालीन सरकार अल्पमत में आ गई थी। तब भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले तत्कालीन विपक्ष ने मनमोहन सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। जिस पर 22 जुलाई 2008 को लोकसभा में चर्चा हुई।
इस अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने सांसदों के लिए ह्विप जारी कर दिया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद होने के नाते सोमनाथ चटर्जी पर भी वह ह्विप लागू होता था। लेकिन सोमनाथ चटर्जी ने कह दिया था कि चूंकि वे सदन के अध्यक्ष के पद पर हैं, लिहाजा उन पर ह्विप लागू नहीं होता। उन्होंने सदन में तटस्थ रहने का फैसला किया। यह बात और है कि समाजवादी पार्टी के सहयोग से मनमोहन सरकार बच गई। लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने दिग्गज नेता के तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अगले ही दिन यानी 23 जुलाई 2008 को पार्टी ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया था।
अब हरिवंश नारायण से उनके पार्टी की नाराजगी को देखते हैं। नई संसद के उद्घाटन का जनता दल यूनाइटेड ने बहिष्कार किया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की तरह जेडीयू भी उम्मीद लगाए बैठा था कि उसके सांसद होने के नाते हरिवंश कार्यक्रम के बहिष्कार में साथ देंगे। इसकी वजह यह रही कि पत्रकार से राजनेता बने हरिवंश को संसद के उच्च सदन राज्यसभा मे जेडीयू ने ही पहुंचाया है। लेकिन हरिवंश ने सोमनाथ चटर्जी की तरह खुद को उपसभापति के तौर पर तटस्थ ही माना। वे ना सिर्फ उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए, बल्कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की ओर से आए संदेशों को उन्होंने ही कार्यक्रम में पढ़ा।
हरिवंश के कार्यक्रम में शामिल होने को जनता दल यू अपनी नाफरमानी मान रहा है। जनता दल यू के अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन और पार्टी के सुप्रीमो नीतीश कुमार ने अभी तक इस बारे में कुछ नहीं कहा है। लेकिन नीतीश के नजदीकी और पार्टी के प्रवक्ता नीरज कुमार खुलकर हरिवंश के खिलाफ बोल रहे हैं। संसद के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होने के चलते हरिवंश की लानत-मलामत करते हुए नीरज ने कहा है कि उन पर फैसला पार्टी आलाकमान लेगा। लगता नहीं कि बिना आलाकमान की सहमति और इशारे के नीरज उपसभापति हरिवंश विरोधी बयान दे रहे हैं। अगर घटनाक्रम में बड़ा बदलाव ना हो तो आने वाले दिनों में जेडीयू हरिवंश के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई कर सकता है।
पत्रकारिता में रहते हुए ही हरिवंश बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नजदीकी माने जाने लगे थे। इसलिए जनता दल यूनाइटेड ने जब उन्हें राज्यसभा में भेजा, तब किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। तब नीतीश कुमार के सहयोगी और चुनावी रणनीतिकार रहे और अब विरोधी बने प्रशांत किशोर ने एक बार इशारा किया था कि हरिवंश को जेडीयू ने भाजपा के ही किसी बड़े नेता के कहने पर संसद भेजा था। पहले यह भी माना जाता रहा है कि भारतीय जनता पार्टी से संवाद के लिए नीतीश कुमार, हरिवंश का इस्तेमाल करते रहे हैं। साल 2017 में राष्ट्रीय जनता दल का साथ छोड़ पलटू चाचा की तोहमत झेलते हुए नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ लिया था, तब भी माना गया था कि हरिवंश ने ही नए समीकरण बनवाने में पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई थी।
वैसे हरिवंश की राजनीतिक ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दोनों सदनों के लिए उपसभापति या उपाध्यक्ष होते हैं। लोकसभा में कोई उपाध्यक्ष नहीं है, लेकिन हरिवंश अपने चुने जाने के कुछ ही दिनों बाद राज्यसभा के उपसभापति चुन लिए गए थे। पहली बार अगस्त 2018 में चुने जाने पर वो दो साल उस पद पर रहे लेकिन 2020 में कार्यकाल खत्म होने के बाद भाजपा ने दोबारा उन्हें ही राज्यसभा का उपसभापति बना दिया।
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ऐसे में हरिवंश के खिलाफ जनता दल यूनाइटेड कोई कार्रवाई करेगा तो उनकी सेहत पर खास असर नहीं पड़ने वाला। ऐसी जानकारियां हैं कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते हैं। हो सकता है कि जनता दल यू की कार्रवाई के बाद उनका कद बढ़ जाए। वे भारतीय राजनीति में नए ढंग से स्थापित हो जाएं, लेकिन इसके लिए पहले जेडीयू की कार्रवाई का इंतजार करना होगा। वैसे भी हरिवंश उस तरह की विचारधारा और कैडर आधारित राजनीति का हिस्सा नहीं रहे हैं। इसलिए उनके लिए नये विकल्प को तलाशना कई कठिन कार्य नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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