Aditya L-1: चंद्रमा के बाद अब सूर्य की बारी

Aditya L-1: मिशन चंद्रयान के प्रज्ञान रोवर को चंद्रमा की सतह पर उतारने के बाद इसरो के वैज्ञानिकों के सामने एक और महत्वपूर्ण अभियान है। भारत का सूर्ययान आदित्य एल1 अगले महीने की शुरुआत में रवानगी के लिए तैयार है। आदित्‍य एल-1 को भेजने का मुख्‍य उद्देश्‍य, अंतरिक्ष के मौसम पर सौर गतिविधियों के प्रभावों को समझना और उनका अध्ययन करना है।

इसके लिए इसे पृथ्‍वी से करीब पंद्रह लाख किमी दूर एक प्रभा मंडल (हेलो ऑर्बिट) में रखा जाएगा, जिसके बीच में सूर्य का एक लैंग्रेंज पॉइंट है। यह पॉइंट आदित्‍य को सूर्य के सापेक्ष स्थिर स्थिति में रखने और इसे सूर्य के वायुमंडल के विकिरण से भी सुरक्षित रखने में सहायक होगा। लैंग्रेंज पॉइंट के घेरने वाले प्रभा मंडल में रखे जाने से, उपग्रह ग्रहण की अवस्‍था में भी वास्‍तविक समय में सूर्य का निरीक्षण जारी रख सकता है। मिशन के नाम में शामिल एल 1, पृथ्‍वी और सूर्य के पहले लैंग्रेज पॉइंट का संक्षिप्‍त रूप है। यहॉं पर पहले से कई देशों की डिस्कवर, सोहो, विंड, एस जैसी सोलर ऑब्‍जर्वेटरी मौजूद हैं।

isro will launch Aditya-L1 for sun after successful of chandrayaan 3 mission

जहॉं तक आदित्‍य का प्रश्‍न है, इसमें कोरोनोग्राफ (कोरोना की इमेजिंग के लिए), स्‍पेक्‍ट्रोग्राफ (विकिरण उत्‍सर्जन को मापने के लिए) मैग्‍नेटोमीटर (चुंबकीय क्षेत्र को मापने के लिए), पार्टिकल डिटेक्‍टर (सूर्य से उत्‍सर्जित पार्टिकल्‍स को मापने के लिए) जैसे सात पे लोड हैं। इनमें चार सीधे सूर्य पर नजर रखेंगे, जबकि बाकी तीन इसके कणों और क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे।

मिशन के तहत, सूर्य के प्रकाशमंडल, क्रोमोस्फीयर और इसकी सबसे बाहरी परतों (कोरोना) का निरीक्षण व अध्‍ययन किया जाएगा। ताकि कोरोना के तापमान, जो सूरज की सतह के तापमान से भी ज्‍यादा है, कोरोनल मास इजेक्‍शन, और इससे उठने वाली लपटों जैसी गतिवि‍धियों के कारणों और प्रभाव को बेहतर तरीके से समझा जा सके।

सूर्य के ऊपरी वातावरण से निकलने वाले आवेशित कणों की धाराओं से उत्‍पन्‍न होने वाली ऐसी गतिविधियॉं संचार, नेविगेशन प्रणालियों और उपग्रहों के परिचालन को बाधित कर सकती हैं और पृथ्वी पर बिजली की आपूर्ति के लिए भी संकट खड़ा कर सकती हैं। ये घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और वर्ष 2025 में इनके चरम तक पहुंचने की आशंका है।

ऐसे में भारत के इस सूर्य मिशन को लेकर बहुत आशाएं हैं। भारत के लिए भी इसकी सफलता बहुत अर्थ रखती है। यह भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता की वैश्विक साख बढ़ाने में मदद करेगा, और सूर्य के बारे में नया ज्ञान भी उत्पन्न करेगा, जिसका उपयोग अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान में सटीकता लाने और पृथ्वी पर इसके प्रभाव को कम करने के लिए किया जा सकता है।

सूर्य के लिए भेजा जाने वाला आदित्‍य एल-1 भारत का पहला सूर्य मिशन जरूर है, लेकिन दुनिया का पहला सोलर मिशन नहीं है। पिछले छह दशकों में अमेरिका, रूस (पूर्व में सोवियत संघ), जापान व यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी आदि द्वारा भेजे गए कई मिशन सूर्य की सैर करके आ चुके हैं। सूर्य के पार उड़ान भरने वाला पहला अंतरिक्ष यान पायनियर 5, वर्ष 1960 में लॉन्च किया गया। इसने सोलर विंड और इसके चुंबकीय क्षेत्र का आकलन किया था। इसके बाद वर्ष 1974 और 1976 में हेलिओस 1 और 2 लॉन्च किए गए, जिन्‍होंने पहली बार सूर्य के 43 मिलियन मील के भीतर उड़ान भरी थी। इन्होंने सौर वायु और इसके कोरोना का अध्ययन किया।

फिर वर्ष 1995 में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और नासा का संयुक्त मिशन सोहो लॉन्‍च किया गया। इसका उद्देश्‍य सूर्य के कोरोना और क्रोमोस्फीयर सहित, सम्‍पूर्ण वायुमंडल का अध्ययन करना था। इसके बाद वर्ष 2006 में सौर लपटों और कोरोनल मास इजेक्शन का अध्ययन करने के लिए जुड़वां अंतरिक्ष यान स्टीरियो लॉन्च किया गया था। आखिरी सोलर प्रोब पार्कर वर्ष 2018 में लॉन्च किया गया। यह सूर्य के कोरोना के माध्यम से उड़ान भरने वाला पहला अंतरिक्ष यान है। इसे सूर्य के कोरोना को गर्म करने वाले कारकों और सौर हवा की गतिशीलता का अध्ययन करने के लिए भेजा गया था।

अभी तक इन अभियानों से जो निष्‍कर्ष हासिल हुए हैं, उनसे पता चलता है कि सूर्य का कोरोना उसकी सतह से कहीं अधिक गर्म है। सौर हवा आवेशित कणों की एक धारा है जो सूर्य से बहती है और यह पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्म और तीव्र हो चुकी है, जो सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र की वजह से है। सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र बहुत जटिल है और सूर्य की सौर लपटों, कोरोनल मास इजेक्शन जैसी कई गतिविधियों में भूमिका निभाता है। और ये गतिविधि‍यॉं पृथ्वी के मौसम और जलवायु को प्रभावित करती हैं। यह भी पाया गया कि सूर्य का कोरोना लगातार बदल रहा और अधिक गर्म होता जा रहा है। कई अलग-अलग प्रकार की सौर ज्वालाएँ हैं, जो पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़ी हो सकती हैं और पृथ्वी के वायुमंडल पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं।

सूर्य की गतिविधियॉं कैसे किसी ग्रह का स्‍वरूप बदल सकती हैं, वरुण (नेप्‍च्‍यून) इसका उदाहरण है। पिछले सप्‍ताह खगोलविदों ने पता लगाया है कि इस ग्रह पर छाए रहने वाले घने बादल लगातार कम हो रहे हैं। उन्‍होंने इसका संबंध सूर्य के जटिल चुंबकीय क्षेत्र के घटने-बढ़ने और उसके 11 वर्ष के सोलर साइकिल से होने की संभावना जताई है। उल्‍लेखनीय है कि हर 11 साल में सौर कलंकों (सनस्‍पॉट) और लपटों की संख्‍या बढ़ने के साथ सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र बदल जाता है। जब सूर्य पर तूफानी मौसम आता है तो उससे उत्‍स‍र्जि‍त होने वाला पराबैंगनी विकिरण बहुत तीव्र हो जाता है।

उन्होंने नेप्च्यून के बादलों के आवरण और सौर चक्र में मौसमी बदलावों के बीच एक दिलचस्प पैटर्न पाया है। पिछली बार पृथ्‍वी पर सौर चक्र का अनुभव 2019 में किया गया था। वर्ष 1755 के बाद यह 24 वां सोलर साइकिल था। वैसे तो कम और मध्‍यम तीव्रता वाले सौर तूफानों का आना सामान्‍य समझा जाता है। अनुमान है कि औसतन हर पांच दिन में ऐसा एक सौर तूफान आता है।

कभी-कभी बहुत सारी सौर गतिविधियॉं जब एक साथ घटित होती हैं तो पृथ्‍वी को चिंता में डाल देती हैं। पिछले साल जुलाई-अगस्‍त महीने में सिर्फ दो सप्‍ताह के भीतर सूर्य ने 35 कोरोनल मास इंजेक्‍शन (सीएमई), 14 सन स्‍पॉट अैर छह सोलर फ्लेअर उत्‍सर्जित किए। कुछ हमसे दूर रहे और कुछ सीधे पृथ्‍वी से टकरा गए। यह सीएमई सूर्य की सतह पर होने वाले एक बड़े विस्‍फोटों में से एक था। अमूमल ऐसे बड़े विस्‍फोटों की वजह से एक अरब टन पदार्थ कई लाख मील प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष में फैल सकता है। इसके बाद वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि भविष्‍य में ऐसी घटनाएं और भी बढ़ सकती हैं।

लॉन्‍च के लिए आदित्‍य एल 1 से देश और दुनिया की काफी उम्‍मीदें टिकी हैं। उससे अपेक्षा की जा रही है कि वह सूर्य के कोरोना की हाई रिज्‍योलूशन इमेज उपलब्‍ध कराएगा, उसके मैग्‍नेटिक फील्‍ड को विस्‍तार से जानेगा, सौर हवा और पृथ्‍वी के वायुमंडल के संबंधों का गहराई से अध्‍ययन करेगा और जलवायु परिवर्तन में सूर्य की भूमिका की पड़ताल करेगा। यदि वह इन अपेक्षाओं पर खरा उतरता है तो वैज्ञानिकों को कोरोना के बढ़ते तापमान और चुंबकीय क्षेत्र के निर्माण और उसमें आने वाले परिवर्तनों के कारणों को जानने में काफी मदद मिलेगी। साथ ही वे पृथ्‍वी पर सौर गतिविधियों के प्रभाव को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और अंतरिक्ष मौसम का और ज्‍यादा सटीक पूर्वानुमान लगा पाएंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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