Islamophobia: इस्लामिक देशों के एजेंडे पर चल रहा संयुक्त राष्ट्र?
Islamophobia: संयुक्त राष्ट्र (यूनाइटेड नेशंस) ने 15 मार्च को ऐतिहासिक पहल करते हुए दुनिया में बढ़ते इस्लामोफोबिया के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है। यूएन में सिर्फ प्रस्ताव ही पारित नहीं हुआ बल्कि दुनियाभर के देशों से कहा गया है कि वो अपने यहां ऐसे कानून बनाये जिससे इस्लाम की बेहूरमती न होने पाये।
इस्लामोफोबिया के खिलाफ इस प्रस्ताव को आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कन्ट्रीज (OIC) की ओर से पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में पेश किया था जिसके समर्थन में 115 देशों ने मतदान किया। इनमें चीन, रूस और अमेरिका भी शामिल हैं। 44 देशों ने इस मतदान में हिस्सा नहीं लिया जिसमें भारत सहित यूरोप के अधिकांश देश शामिल हैं।

इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र में भारत की राजदूत श्रीमती रुचिरा कम्बोज ने भारत के इस मतदान से दूर रहने की वजह बताते हुए कहा कि "यह समय है जब हमें रिलिजिसफोबिया की ओर ध्यान देने की जरूरत है, बजाय इसके कि हम एक धर्म की बात करें।" उन्होंने दुनिया के 1.2 अरब हिन्दुओं, 50 करोड़ बौद्धों और 2 करोड़ सिखों की बात करते हुए कहा कि हमें उनके भी मानवाधिकारों की बात करनी चाहिए जिनके साथ धर्म के नाम पर भेदभाव किया जाता है और उनका उत्पीड़न होता है।
असल में संयुक्त राष्ट्र में इस्लामोफोबिया को लेकर जो प्रस्ताव आया है वह प्रस्ताव ही भेदभावपूर्ण है। इसमें एक धर्म के खिलाफ लोगों की बढ़ती नफरत पर चिंता तो व्यक्त की गयी है लेकिन अन्य धर्मों के खिलाफ जो नफरत है उसकी अनदेखी कर दी गयी है। यूएन द्वारा जारी प्रेस रिपोर्ट में ईसाई और यहूदी का एक लाइन में जिक्र तो है लेकिन दुनिया के तीसरे बड़े धर्म हिन्दू का जिक्र "अन्य" के रूप में किया गया है।
जबकि जिस पाकिस्तान ने यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत किया है, उस पाकिस्तान में हिन्दुओं, ईसाइयों को नरकीय जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। नागरिक अधिकारों का ऐसा भीषण भेदभाव है कि कोई गैर मुस्लिम पाकिस्तान के शीर्ष पदों पर संवैधानिक रूप से बैठ ही नहीं सकता।
लेकिन इस प्रस्ताव के यूएन में पास होने से ऐसा लगता है कि संयुक्त राष्ट्र नहीं बल्कि उसका बुनियादी चरित्र बदलकर ओआईसी वाला हो गया है। संयुक्त राष्ट्र में पिछले साल से इस्लामोफोबिया के खिलाफ माहौल बनना शुरु हुआ और इस साल प्रस्ताव पास करके दुनियाभर के देशों को इसे रोकने के लिए कानून बनाने के लिए कह दिया गया।
अब इसके लिए पर्याप्त धन और प्रभाव का इस्तेमाल भविष्य में किया जाएगा ताकि दुनिया के सभी गैर मुस्लिम देशों में ऐसे कानून बन जाएं ताकि वहां इस्लाम की सच्चाई बताने, या फिर इस्लामिक हिंसा के बारे में जानकारी देने को अपराध माना जाए।
इस्लामिक देशों में ऐसा पहले से ही है। दुनिया के जितने भी इस्लामिक देश हैं वहां इस्लाम की निंदा, आलोचना या उसके प्रतीकों पर सवाल उठाने को अपराध समझा जाता है। पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देश में तो इसके लिए आजीवन कारावास और मौत की सजा तक का प्रावधान है।
मतलब इस्लामिक देशों में रहते हुए आप किसी भी प्रकार से इस्लामिक सिद्धांतों, प्रतीकों पर सवाल नहीं उठा सकते। एक मनुष्य की सभी प्रकार की अभिव्यक्ति की आजादी तब खत्म हो जाती है जब वह इस्लाम पर सवाल उठाना चाहता है। ओआईसी और अन्य इस्लामिक देश अब यही व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र के जरिए संसार के सभी गैर इस्लामिक देशों में बनाना चाहते हैं।
असल में संयुक्त राष्ट्र में ओआईसी का प्रभाव इस सदी की शुरुआत में उस समय बढ़ना शुरु हुआ जब दुनियाभर में इस्लामिक आतंकवाद पैर पसार चुका था। इसी दौर में ओआईसी ने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकल संसार में उभरते विरोधाभासों से निपटने में मदद की पेशकश की। इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी की इस पेशकश का संयुक्त राष्ट्र ने स्वागत किया। लेकिन अब लगभग 23-24 साल बाद वह सहयोग इस्लामोफोबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव और प्रयास के रूप में सामने आया है।
इस बीच संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2006 में आतंकवाद के खिलाफ जिस प्रस्ताव को पेश किया गया था वह भी मेलजोल से विवादों को सुलझाने और सभी धर्मों का सम्मान करने जैसे उपदेशों से भरा हुआ था। लेकिन उस समय जिस काउण्टर टेररिज्म इंपलीमेन्टेशन टास्क फोर्स का गठन किया गया था वह खत्म हो चुका है। स्वाभाविक है इस्लामिक देशों के संगठन के साथ तालमेल करके संयुक्त राष्ट्र ने जो पहल शुरु की थी, आखिरकार ओआईसी ने संयुक्त राष्ट्र को ही इस्लामिक देशों के संगठन के रूप में परिवर्तित कर दिया।
इस्लामिक देशों खासकर अरब देशों के पास पैसा है और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं हमेशा अपने दानदाताओं के प्रभाव में रहती हैं। अगर संयुक्त राष्ट्र इस्लामोफोबिया से निपटने के लिए संसाधन खर्च करने की बात कर रहा है तो इसके पीछे अमीर अरब देशों का ही पैसा होगा। पाकिस्तान जैसे देश तो सिर्फ मुखौटा हैं जो आगे बढ़कर अपने आपको सच्चा इस्लामिक मुल्क साबित करना चाहते हैं। यह अरब देशों का ही पैसा और प्रभाव है कि संयुक्त राष्ट्र सभी प्रकार के मानवाधिकारों को किनारे करके इस्लामिक प्रतीकों की रक्षा करने में जुट गया है।
संयुक्त राष्ट्र के इस 'इस्लामीकरण' में यूएन सेक्रेटरी जनरल एन्टोनियो गुन्टेरेस, उनकी डिपुटी अमीना मोहम्मद या फिर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के अध्यक्ष वोल्कर तुर्क की तिकड़ी की भी अहम भूमिका है। वोल्कर तीन दशक से संयुक्त राष्ट्र से जुड़े हैं और उनके कैरियर की शुरुआत ही कुवैत की फंडिंग से हुई थी। उनके वक्तव्य, बयान और प्रयास संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के बजाय इस्लामिक अधिकारों के लिए लड़नेवाले किसी मौलाना की तरह होते हैं। यूरोप में जब से इस्लाम की सच्चाई बताने या कुरान जलाने की घटनाएं हुई हैं तब से इस तिकड़ी के इस्लामिक प्रतीकों की इज्जत करने तथा इस्लाम के प्रति सहिष्णुता बढाने वाले बयान आते रहते हैं।
उन प्रयासों का यह चरम था कि सभी प्रकार के नागरिकों के मानवाधिकार किनारे करते हुए किसी इस्लामिक संगठन की तरह संयुक्त राष्ट्र ने इस्लामोफोबिया के खिलाफ न सिर्फ प्रस्ताव पारित कर दिया बल्कि हर साल 15 मार्च को इसके खिलाफ एकजुट होने का आह्वान भी कर दिया। यह बिल्कुल वही तरीका है कि क्राईम करके अपने आप को विक्टिम घोषित कर दो। इससे लोग आपके क्राइम के बजाय आपके विक्टिम होने पर चर्चा शुरु कर देंगे।
संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वो इस्लामिक देशों के संगठन की तरह व्यवहार करे। इस्लामिक सिद्धांत मेलजोल वाली सभ्यताओं में विश्वास नहीं करते इसलिए उन्होंने अपना अलग वैश्विक संगठन ओआईसी बना रखा है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र भी अगर ओआईसी की भाषा बोलेगा तो दुनिया के उन देशों के लिए संकट पैदा होगा जो संयुक्त राष्ट्र को सर्वधर्म समभावी संगठन मानकर उससे जुड़े हुए हैं।
इस्लामोफोबिया उन लोगों द्वारा गढा गया एक सिद्धांत है जो नहीं चाहते कि इस्लामिक सच्चाइयां सबके सामने आये। वरना अगर इनकी नीयत ठीक होती तो संसार के अलग अलग बौद्धिक और सामाजिक मंचों का इस्तेमाल करके वो यह साबित कर देते संसार के लोग इस्लाम के बारे में जैसा सोचते हैं, इस्लाम वैसा नहीं है। यह करने के बजाय इस्लामिक देशों का समूह और अब संयुक्त राष्ट्र भी गैर इस्लामिक देशों को भी उन इस्लामिक देशों की तरह बनाना चाहते हैं जहां इस्लाम की आलोचना या समीक्षा के लिए भी सरकारी सजा का प्रावधान है।
अब संयुक्त राष्ट्र चाह रहा है संसार के सभी प्रकार के संचार माध्यमों से इस्लाम की आलोचना या समीक्षा पर रोक लगे। खासकर सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर ऐसे फिल्टर्स का इस्तेमाल किया जाए जो इस्लाम की आलोचना को खत्म करते हों। लेकिन खुद मुस्लिम समुदाय जो इस्लाम के अलावा बाकी हर धर्म को कुफ्र मानकर उसे समाप्त करने की वकालत करता है उसके ऊपर कोई चर्चा करने से संयुक्त राष्ट्र क्यों परहेज कर रहा है? क्या इस प्रकार से कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था अपनी विश्वसनीयता बचाकर रख पायेगी?
यह तो अच्छा है संयुक्त राष्ट्र के इस भेदभावपूर्ण प्रस्ताव से भारत सहित संसार के 44 देशों ने अपने आपको अलग कर लिया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सामने यह सवाल हमेशा रहेगा कि धार्मिक भेदभाव की बजाय उन्होंने इस्लामोफोबिया का मुद्दा क्यों उठाया? संसार के सभी गैर मुस्लिम देशों को दार-उल-हर्ब मानकर उसके खिलाफ जंग को जायज माननेवालों पर सवाल क्यों नहीं उठाया जा सकता? पूरी मानवता को काफिर और मोमिन में बांटनेवाली विचारधारा पर अगर कोई व्यक्ति सवाल उठाता है तो उस सवाल का जवाब देने के बजाय उसे ही इस्लामोफोबिया का दोषी ठहरा देना कहां का मानवाधिकार है, जिसकी वकालत यूएन कर रहा है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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