Intellectual Property: भारत में ज्ञान ज्यादा, पेटेंट कम
एक मजाक था जिसमें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश बिल गेट्स से कहते हैं कि अमेरिका में इतनी बेरोजगारी है फिर भी आप भारतीयों को माइक्रोसॉफ्ट में क्यों नौकरी देते हैं? तो बिल गेट्स जवाब देते हैं कि यदि मैं भारतीयों को माइक्रोसॉफ्ट में नौकरी में रख कर व्यस्त नहीं रखूँगा तो वे दूसरा माइक्रोसॉफ्ट बना लेंगे। कहने को तो यह मजाक है लेकिन यह बहुत बड़ी सच्चाई भी है।

आज भारत में अनेक कंपनियां कई कारों और मशीनों को बाहर से आयात करती हैं। उन मशीनों का मोटा मोटा तीन हिस्सा होता है। पहला मेटल जिससे वह बनी होती हैं। दूसरा डिज़ाइन, और तीसरा डिज़ाइन से जुड़ी कुछ मैकेनिकल इंजीनियरिंग। उदाहरण के तौर पर हवाई अड्डे पर प्रयोग की जाने वाली मशीनें करोड़ों में होती हैं जो सिंपल इंजीनियरिंग का काम करती हैं जैसे पुश बैक मशीन। यह करोड़ों की मिलती है लेकिन अगर इसके मेटल की कॉस्ट देखेंगे तो यह बस कुछ लाख की होगी जो कुल बिक्री मूल्य का बमुश्किल एक से दो फीसदी होगा। इसका मतलब बाकी का 98 से 99 फीसदी हम किस चीज का भुगतान कर रहें हैं?
जवाब है ओवरहेड, डिज़ाइन और इंजीनियरिंग का। सवाल है तो फिर हम इस डिज़ाइन और इंजीनियरिंग को कॉपी कर बना क्यों नहीं लेते हैं तो जवाब है नहीं बना सकते क्योंकि इस डिज़ाइन और इंजीनियरिंग का पेटेंट हमारे पास नहीं है। तो इससे क्या सीख मिलती है? सीख यह मिलती है कि अगर हम कोई नई चीज बनाते हैं तो हमें सबसे पहले उसका पेटेंट हासिल करना चाहिए तभी हम उसका लम्बे समय तक लाभ कमा सकते हैं।
आजकल डिज़ाइन और इंजीनियरिंग कॉपी कर सभी बना सकते हैं लेकिन बाजी वही मारता है जो आगे बढ़कर पेटेंट हासिल करता है। इसी काम में अमेरिकन और यूरोपियन हमसे आगे हैं। भारत में हम जो भी मशीनरी और गाड़ी आयात करते हैं उसमें 90 फीसदी से ज्यादा तो डिज़ाइन, इंजीनियरिंग और ओवरहेड का हिस्सा होता है जो हम भुगतान करते हैं। इसमें भी डिज़ाइन और इंजीनियरिंग का बड़ा हिस्सा होता है।
भारतीय ब्रेन का अमेरिका बड़ी संख्या में आयातक है और भारतीयों की सारी मेहनत और बुद्धि पर बस चंद रुपया खर्च कर अमेरिकी कम्पनियां उसका पेटेंट हासिल कर विश्वबाजार पर कब्ज़ा कर लेती हैं और अमेरिकी पूंजीपति बड़ी मात्रा में रॉयल्टी कमाते हैं। भारत से सबसे अधिक भुगतान विदेशी तकनीकी, फार्मूला या ब्रांड के रॉयल्टी के रूप में बाहर जाता है। हम गर्व करते हैं कि गूगल का सीईओ सुन्दर पिचाई हैं लेकिन कभी गूगल जैसी कंपनी भारत में हम नहीं बना पाए।
मोबाइल इन्टरनेट और कंप्यूटर में लगभग सभी चीजों पर अमेरिका का कब्ज़ा है। लेकिन उसमें काम करने वाला श्रम और दिमाग भारतीय है। हम उसके मालिक नहीं हैं। इस पिछड़ेपन का एक ही कारण है कि हम चाय की दुकान पर आईडिया बांटते हैं। पेटेंट की दुनिया में एक कहावत है पेटेंट आवेदन पहले फाइल करिए और आविष्कार बाद में करिए। भारत यहाँ पिछड़ जाता है।
एक ओर हम आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर भारत बनने का प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर चीन एवं अन्य देशों के मुकाबले में ग्लोबल लीडर बनने की भी तैयारी है। लेकिन नए नए आईडिया को जमीन पर उतारने में हम चीन और अमेरिका के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। इसका कारण है कि हम अभी भी पुराने हथियारों और तरीकों से विश्व बाजार से प्रतिद्वंदिता कर रहें हैं। पेटेंट फाइलिंग के ताजा आंकड़ें देखें तो हम अमेरिका तो दूर इनोवेशन में ही चीन से काफी पीछे हैं। हमारे पास ज्ञान तो बहुत है लेकिन पेटेंट में हम बहुत पीछे हैं।
भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय द्वारा प्रकाशित 2021-22 के वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 21-22 में कुल 5,68,049 आवेदन आये थे जिसमें पेटेंट के 66440 डिज़ाइन के 22700, कॉपीराइट के 30,988, जिओटैगिंग के 116 और ट्रेडमार्क के लिए 447805 आवेदन थे।
वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, 2019 में पूरी दुनिया से पेटेंट के लिए कुल 2,65,800 आवेदन किए गए थे जबकि भारत से केवल 2053 आवेदन हुए थे। इस प्रकार देखें तो 2019 में पूरी दुनिया की आबादी में 16 फीसदी से दखल देने वाला भारत पेटेंट आवेदन में 1 फीसदी से भी कम दखल और पेटेंट आवेदन में पूरी दुनिया में 14वीं रैंक रखता था। पेटेंट के अलावा अपने देश के लोग ब्रांड एवं ट्रेडमार्क पंजीयन के मामले में भी काफी पीछे हैं।
ट्रेडमार्क बहुत ही साधारण सा प्रयास है जो आपके व्यापार पर किये गए मेहनत को संरक्षित रखती है। बहुत से भारतीयों को यह मालूम ही नहीं है कि कई लोग व्यापार में घाटा होने के बाद भी ट्रेडमार्क और ब्रांड लोगो ही बेच कर घाटा कवर कर लेते हैं। ट्रेडमार्क, ब्रांड लोगो एक संपत्ति है जो दिन प्रतिदिन मूल्यवान बनती जाती है। यदि हमें विश्व बाजार में टिकना है तो हमें पेटेंट और ट्रेडमार्क पंजीयन में एक उछाल लानी होगी, नहीं तो हम मजदूर होकर मजदूरी पाएंगे और मलाई पेटेंट वाला ले उड़ेगा।
भारत के इस पिछड़ेपन का कारण यहाँ रिसर्च पर और उस रिसर्च की मान्यता एवं तत्पश्चात उसके डेवलपमेंट में बहुत ही कम खर्च किया जाता है। यही कारण है कि भारत पेटेंट फाइलिंग के मामले में दुनिया से और चीन से काफी पीछे है। पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी ने 76वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए, जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान के नारे में जय अनुसंधान जोड़ा था। इसमें कितनी प्रगति हुई यह वर्ष 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा।
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