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Indians Leaving India: विदेश के मोह में देश से विछोह

औसत हर साल सवा से डेढ लाख भारतीय नागरिक देश छोड़कर विदेश जा रहे हैं और वहीं बस रहे हैं। केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने इस जानकारी पर संसद में मुहर लगा दी है।

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कांग्रेस सांसद अब्दुल खालिक ने वर्ष 2015 के जनवरी महीने से भारतीय नागरिकता छोड़ने वाले लोगों की संख्या का विवरण मांगा था जिस पर केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वी मुरलीधरन ने जवाब देते हुए संसद में विवरण पेश किया है। केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री ने पिछले आठ साल के आंकड़े पेश किए, जिसके अनुसार 2015 में 1,31,486, 2016 में 1,41,603, 2017 में 1,33,0,49, 2018 में 1,34,561, 2019 में 1,44,017, 2020 में 85,256, 2021 में 1,63,370 और 31 अक्तूबर, 2022 तक 1,63,370 भारतीयों ने हमेशा के लिए विदेशी नागरिकता ले ली।

पिछले 11 वर्षों में कुल 16 लाख लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़कर विदेश में बसने का निर्णय लिया है। उदाहरण के लिए अमेरिका की करीब 34 करोड़ की आबादी में प्रवासी भारतीयों की संख्या 44 लाख से अधिक हो चुकी है और इसमें लगातार इजाफा होता जा रहा है।

केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री द्वारा प्रस्तुत ये आँकड़े चौंकाने वाले हैं। 2018 में विदेश जाकर बसने वालों में कमी देखी गई अन्यथा तो जिस अनुपात में भारतीय विदेशों में बस रहे हैं, वह देश के लिए चिंता का सबब है।

क्यों छोड़ रहे हैं भारतीय अपना देश?
जिन भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ी है उनके सन्दर्भ में संसद में उपलब्ध दस्तावेजों में 'निजी कारणों' का उल्लेख है किन्तु इसकी जड़ में जायें तो मामला भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक कुव्यवस्था से जुड़ा है।

समान अवसरों की कमी, जातिगत आरक्षण के चलते भेदभाव, आर्थिक असमानता, सामाजिक रूप से भिन्नता, नित बढ़ता राजनीतिक हस्तक्षेप, अर्थव्यवस्था में अनपेक्षित उतार-चढ़ाव, उच्च जीवनशैली का अभाव जैसी कई परिस्थितियाँ भारत से बढ़ते पलायन के लिए जिम्मेदार हैं। भारतीयों की आर्थिक स्थिति सुधरने और स्टैण्डर्ड ऑफ लिविंग अच्छा होने से भी भारत से पलायन बढ़ा है।

जिन लोगों ने भारत की नागरिकता छोड़ी है उनमें एक बड़ी संख्या युवाओं की है जो 'काम का सही दाम' के चलते पश्चिम के देशों में बस गए हैं। उनके बच्चों के लिए भी विदेशों में भारत के मुकाबले अवसर अधिक हैं। टाइम्स हायर एजुकेशन की रिपोर्ट हो या क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग; भारत का एक भी विश्वविद्यालय टॉप 50 में स्थान नहीं बना पाया है। आईआईटी अथवा आईआईएम टॉप 200 में आये हैं तो उसका कारण उनमें पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा का स्तर है, न कि उनकी स्वयं की कोई खास उपादेयता।

हर वर्ष आईआईटी और आईआईएम से हजारों नौजवान पढ़कर निकलते हैं लेकिन उनमें से कितने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की टॉप पोजीशन में स्थान बना पाते हैं, यह सभी को ज्ञात है। कईयों को तो जातिगत आरक्षण ने इतना नुकसान पहुँचाया है कि वे अब कभी भारत लौटना ही नहीं चाहते, न ही अपने बच्चों को इसकी जद में आने देना चाहते हैं।

भारतीयों के देश छोड़ने से आर्थिक नुकसान
केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वी मुरलीधरन ने यह जानकारी भी दी कि विदेश में जाकर बसे भारतीय देश का कितना पैसा बाहर ले गए इसके आंकड़े मंत्रालय के पास नहीं हैं क्योंकि जिन लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ दी है, मंत्रालय उनकी भारत से ले जाई गई संपत्ति पर नजर नहीं रखता है।

इसके अलावा विदेश में बसने वाले भारतीय वहाँ अपनी कमाई से संपत्ति खरीद रहे हैं। भारतीयों की विदेशों में खरीदी जाने वाली संपत्ति की संख्‍या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। लंदन, न्‍यूयॉर्क, सिंगापुर, दुबई जैसे स्थान संपत्ति खरीदने के लिए भारतीयों की पहली पसंद हैं। यानि जो भारतीय देश की नागरिकता छोड़कर गये, उससे देश को आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। यदि वे देश में ही रहते तो उनका धन यहीं काम आता।

कितने विदेशियों ने ली भारत की नागरिकता?
विदेश राज्य मंत्री मुरलीधरन ने लोकसभा के माध्यम से देश को जानकारी दी कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के नागरिकों के अलावा 2015 में 93, 2016 में 153, 2017 में 175, 2018 में 129, 2019 में 113, 2020 में 27, 2021 में 42 और 2022 में सिर्फ 60 विदेशी नागरिकों ने भारतीय नागरिकता हासिल की।

यानि भारत में विदेशियों के बसने की दर अभी काफी कम है जबकि दावा यह किया जाता है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के आकर्षण के चलते विदेशी यहाँ बहुतायत में आना चाहते हैं। बेशक वे यहाँ भ्रमण के लिए आना चाहते हैं किन्तु यहाँ बसना उन्हें स्वीकार नहीं होता क्योंकि भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था इतनी उलझी हुई है कि वे यहाँ उस सुख सुविधा एवं स्वतंत्रता से नहीं रह सकते, जिसके वे आदी होते हैं।

क्या सभी जीते हैं लेविश लाइफस्टाइल?
भारत की नागरिकता छोड़कर विदेश बसने वाले सभी भारतीय जिस बेहतर जीवनशैली के सपने संजोते हैं, क्या वे सभी ऐसे ही जी पाते हैं? शायद नहीं। हजारों की संख्या में भारतीय, विदेशी जेलों में बंद हैं और सजा काट रहे हैं। लोकसभा के प्राप्त जानकारी के अनुसार, 8,441 भारतीय विदेशी जेलों में बंद हैं। इनमें अकेले यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान की जेलों में 4,389 भारतीय बंद हैं।

हालांकि इनमें से आधे वे हैं जो काम के सिलसिले में विदेश गए और वहाँ के कानून का पालन न करने के कारण जेल में बंद हुए किन्तु यदि आठ हजार से अधिक भारतीय भी जेलों में बंद हैं तो विदेश की जो चकाचौंध उन्हें खींचती है, वह उनके लिए बुरा सपना भी हो सकती है।

सरकार के लिये ब्रेन ड्रेन को कम करना बहुत आवश्यक है क्योंकि इससे कई बार ऐसे 'हीरे' भी देश से चले गए हैं जिन्हें वापस लाना अब संभव नहीं है। ऋषि सुनक, सत्य नडेला, इंदिरा नूयी, विनोद खोसला, सुंदर पिचाई, विनोद दाहम, शांतनु नारायण, अजयपाल सिंह बंगा, सबीर भाटिया जैसे व्यक्तित्व भारत में ही रहते, यहीं उन्हें उत्कृष्ट अवसर मिलते तो क्या हम माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, हॉट मेल, पेप्सिको, एडोब जैसी संस्थायें नहीं खड़ी कर सकते थे?

भारत की मेधा और प्रतिभा दुनिया को रास्ता दिखा रही है किन्तु दूसरे देश में जाकर। यह हमारे सिस्टम की सबसे बड़ी असफलता है। क्या इसके दूरगामी परिणाम के बारे में नीति निर्माता चिंतित हैं?

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