India US Relations: दोस्ती या मजबूरी, दोनों के लिए जरूरी
भारत के परंपरागत मोटे अनाजों को लेकर प्रधानमंत्री मोदी इसके उपयोग की सलाह देते रहते हैं। इसका कारण है मोटे अनाज से सेहत को होनेवाला फायदा।
यही कारण है कि 22 जून को व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अगर प्रधानमंत्री मोदी को दिए शाही भोज में अगर बाजरे को शामिल करवाया तो निश्चय ही उन्होंने अच्छे स्वास्थ्य के साथ भारत-अमेरिका रिश्तों को एक नई गर्माहट देने का संकेत भी दिया है।

रिश्तों में जबर्दस्त उत्साह तब दिखा जब राष्ट्रपति बाइडेन ने मोदी को भोजन के उपरांत एक विंटेज अमेरिकी कैमरा उपहार में दिया, साथ ही पहले कोडक कैमरे के लिए जॉर्ज ईस्टमैन के पेटेंट का एक अभिलेखीय प्रतिकृति प्रिंट भी भेंट किया, जो फोटोग्राफी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है। राष्ट्रपति बाइडेन को संभवतः ज्ञात है कि प्रधानमंत्री मोदी को फोटोग्राफी का पुराना शौक है। इसके अलावा अमेरिकी वन्यजीवों पर एक हार्डकवर पुस्तक भी प्रदान की जिसमें अमेरिका की प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता पर प्रकाश डाला गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी राजकीय यात्रा का मुख्य उद्देश्य लड़ाकू विमानों के लिए इंजन और तकनीक के साथ 3 बिलियन डॉलर के रक्षा ड्रोन सौदे पर हस्ताक्षर करना है जो कि भारतीय नौसेना और भारतीय रक्षा के अन्य विंग को मजबूत करेगा। भारतीय शेयर बाजार में आज इसी बात पर जबर्दस्त उत्साह का माहौल देखा गया कि भविष्य में भारत ड्रोन निर्माण का बड़ा केंद्र बन जाएगा। बाजार को मध्यम से लंबी अवधि में इनहाउस डिफेंस ड्रोन की मांग बढ़ने की उम्मीद है।
प्रधानमंत्री मोदी इन दिनों अमेरिका के स्टेेट गेस्ट के रूप में पहुंचे हैं और पूरा अमेरिका उनकी इस यात्रा को लेकर जबर्दस्त उत्साहित है। बिजनेस हाउस से लेकर डिप्लोमेट तक मोदीमय हो चुके हैं और ऐसा होने के वाजिब कारण भी है। कभी भारत को हल्के में लेने वाले तमाम अमेरिकी अपने रूख में यदि परिवर्तन कर रहे हैं तो इसके पीछे भारत की उन्नति तो है लेकिन अमरीकियों की अपनी मजबूरी भी है। घोषित रूप से अमेरिकी विदेश विभाग जब यह कहता है कि अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को बनाए रखने सहित साझा मूल्यों पर आधारित है तो इसमें गलत नहीं है। लेकिन अमेरिका के लिए व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी, वैश्विक सुरक्षा, वैश्विक स्थिरता और अब खुद अमेरिकी आर्थिक समृद्धि के लिए भारत के साथ साझेदारी बनाना हितकर है।
राष्ट्रपति बाइडेन और प्रधानमंत्री मोदी दोनों ने व्यक्तिगत रूप से इन संबंधों को यहां तक पहुंचाने में अपनी अपनी ओर से खूब पहल की है। दोनों ने कई द्विपक्षीय बैठकें की हैं। इसके अलावा दोनों नेताओं ने जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड लीडर्स तंत्र को भी विकसित किया है। वैश्विक शांति सुरक्षा और स्थिरता के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भागीदारी भी की है। भारत के लिए यदि चीन की आक्रामकता को रोकने के लिए यह भागीदारी जरूरी है तो अमेरिका के लिए चीन की आर्थिक समृद्धि से उत्पन्न चुनौतियों से जूझने की यह ताकत है। अब तो अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की अच्छी खासी संख्या भी है। अमेरिका की कुल 34 करोड़ की जनसंख्या में भारतीय मूल के भी अब चार करोड़ लोग हो गए हैं। यानी अमेरिकी लोकतंत्र में भारतवासियों की अच्छी खासी हिस्सेदारी भी हो चुकी है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस राजकीय यात्रा के लिए अमेरिका ने जबर्दस्त तैयारियां की है। अमेरिकी विदेश और रक्षा सचिवों और उनके भारतीय समकक्षों के बीच 2़2 मंत्रिस्तरीय वार्ता की गई। इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत ने दर्जनों द्विपक्षीय वार्ता और कार्य समूहों का भी सहयोग लिया गया। जिसमें अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर स्वास्थ्य, ऊर्जा से लेकर उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र शामिल हैं। यूएस-इंडिया काउंटरटेररिज्म जॉइंट वर्किंग ग्रुप को भी इस तैयारी में शामिल किया गया है।
प्रधानमंत्री मोदी अगले दो दिन जिन विषयों पर वार्ता और समझौता करने वाले हैं उनमें स्ट्रैटेजिक क्लीन एनर्जी पार्टनरशिप, क्लाइमेट एक्शन एंड फाइनेंस मोबिलाइजेशन डायलॉग, साइबर डायलॉग, सिविल स्पेस वर्किंग ग्रुप, शिक्षा और कौशल विकास वर्किंग ग्रुप, व्यापार नीति मंच, रक्षा नीति समूह, और काउंटरनारकोटिक्स कार्य समूह के मसौदे भी शामिल हैं।
भारत और अमेरिका का व्यापार समझौता मोदी के इस दौरे के महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होने जा रहे हैं। दोनों देशों के बीच इस समय व्यापार रिकॉर्ड 160 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है। कई अमेरिकी कंपनियां इस समय मोदी से मिलने और भारत में निवेश के लिए इंतजार कर रही हैं। इलेक्ट्रिक कार निर्माता टेस्ला ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वह भारत में अपना प्लांट लगाएगी। इसी तरह, भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजारों में अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहती हैं।
अमेरिका और यूरोपीय देशों के समर्थन से भारत दो साल के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल रह चुका है। अब भारत की कोशिश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनने में है। अमेरिका इसका समर्थन कर चुका है, परंतु चीन लगातार इसमें अड़ंगा लगा रहा है। अब जो अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां बन रही हैं उसमें चीन के लिए भारत का खुला विरोध भारी पड़ सकता है। क्योंकि भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक को बढ़ावा देने और इस क्षेत्र को ठोस लाभ प्रदान करने के लिए क्वाड के रूप में एकजुटता दिखाई है। क्वाड को लेकर चीन अब काफी सतर्क हो गया है।
अमेरिका और भारत के बीच रिश्तों में नई मिठास के लिए दोनों देशों की परस्पर एक दूसरे की आवश्यकताएं हैं। अमेरिका में संसाधनों की अधिकता है और मानव संसाधनों की कमी है। अभी तक चीन अमेरिकी निवेश का बड़ा हिस्सा अपने यहां ले जाता था पर अमेरिका के प्रति चीन के बदलते रूख ने अमेरिका को भारत की ओर झुकने को मजबूर किया है।
अमेरिका की नजर में भारत ही एक ऐसा देश है जो साम्राज्यवाद की सोच से दूर है। भारत को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अमेरिका को कोई बड़ी कीमत अदा नहीं करनी है। दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य शक्ति के विस्तार को रोकने के लिए भारत की समुद्री सीमा को मजबूत करना उसके लिए फायदेमंद है। इसीलिए वह भारतीय नौसेना को आधुनिक अस्त्र शस्त्र बेचने से पीछे नहीं हट रहा है। नई दिल्ली के साथ-साथ फिलीपींस जापान भी इसमें अमेरिका के साझीदार हैं।
हालांकि भारत अमेरिका का रिश्ता ऐसा रहा है कि दोनों ओर से फूंक फूंक कर ही कदम रखा गया है। भारत ने कभी भी अपनी गुटनिरपेक्ष छवि नहीं बदली इसलिए अमेरिका खुलकर भारत के साथ कभी खड़ा नहीं हुआ। अतीत में विश्व की दो महाशक्तियों की टकराहट (सोवियत संघ और अमेरिका) में भारत दोनों के साथ अपने रिश्तों को निभाता आया है। आज भी वह इस नीति से समझौता कर लेगा ऐसा लगता नहीं है। फिर भी अमेरिका की मजबूरी है कि वह एशिया में भारत को अपने साथ खड़ा दिखाए। भारत की भी अपनी मजबूरी है कि वह रूस और चीन का दुश्मन बने बिना अमेरिका से रिश्तों को आगे बढ़ाए। इसलिए दोनों करीब तो आ रहे हैं लेकिन अपने अपने हितों की अनदेखी भी नहीं कर रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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