Unemployment in India: पढ़े लिखे नौजवान बेरोजगार क्यों हैं?
भारत कौशल रिपोर्ट 2023 से यह बात सामने आई है कि युवाओं के पास डिग्री तो है लेकिन नौकरी नहीं है। भारत में 50.3 फीसदी डिग्रीधारी युवा नौकरी पाने के योग्य नहीं है।

Unemployment in India: भारत कौशल रिपोर्ट 2023 जारी करने से पहले देश में तीन लाख पचहत्तर हजार छात्रों का वीबाॅक्स नेशनल एम्प्लाॅयबिलिटी टेस्ट (डब्ल्यूनेट) लिया गया और 15 से अधिक उद्योगों से जुड़ी 150 कंपनियों पर किए गए इंडिया हायरिंग इंटेंट सर्वेक्षण के परिणामों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई।
रिपोर्ट के अनुसार जिन 50.3 प्रतिशत युवाओं को रोजगार के योग्य नहीं पाया गया, उनमें अधिकांश युवाओं के पास स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री थी। इसका अर्थ यह है कि जब ये डिग्रीधारी नौजवान रोजगार की तलाश में निकलेंगे तो इनमें से 50 फीसदी युवाओं के लिए बाजार में रोजगार नहीं होगा।
एमबीए की बात की जाए तो जिन युवाओं के पास एमबीए की डिग्री है, उनमें से 40 फीसदी युवाओं को नौकरी करने के योग्य नहीं माना गया। इंजीनियरिंग में ऐसे 43 फीसदी, बी कॉम के 40 फीसदी और बीएससी पृष्ठभूमि के 63 फीसदी युवा अपनी शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी नौकरी के लिए अयोग्य पाए गए। आईटीआई डिप्लोमा से जुड़े 66 फीसदी, पॉलिटेक्निक से 72 फीसदी, बीफार्मा करने वाले 43 फीसदी युवाओं को अपनी शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी किसी नौकरी के योग्य नहीं माना गया।
ऐसे अयोग्य पाए गए सभी छात्रों के पास दिखाने के लिए डिग्री है, इसके बावजूद उन्हें अपने विषय की समझ नहीं है। जब नौकरी में कौशल को आजमाने का समय आता है तब वे असफल साबित हो रहे हैं।
भारत में बेरोजगारी दर 8.0 फीसदी है। इस बेरोजगारी के पीछे स्कूल और कॉलेज में अधिक से अधिक अंक जुटाने में लगे छात्र और अभिभावक की प्रतिस्पर्धा भी है। पढ़ाई के दौरान हम सबका ध्यान अधिक से अधिक अंक और छात्र के पास-फेल पर ही केन्द्रित होता है। छात्रों की कुशलता को विकसित करने की जगह हम अधिकांश स्कूल और काॅलेजों में उसे रट्टू तोता बना रहे हैं। छात्र को कौशल सम्पन्न बनाने की ना स्कूल के पास कोई योजना है और ना परिवार इस दिशा में सोच रहा है।
पिछले पचास से अधिक सालों में एक ऐसी शैक्षणिक व्यवस्था हमारे आस-पास खड़ी की गई है, जहां पढ़ाया तो जा रहा है लेकिन पढ़ाई करके युवा नौकरी के लिए अयोग्य साबित हो रहे हैं। मतलब देश के अंदर नौकरियां हैं लेकिन उन नौकरियों के लिए काबिल लोग नहीं मिल रहे।
एक देश में दो तरह की शिक्षा
एक तरफ हम अपनी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, दूसरी तरफ हमारे यहां के छात्र विदेश जा रहे हैं। वहां नौकरी कर रहे हैं। वे अपनी मेहनत से कंपनी के सीईओ जैसे सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं। यह दोनों बातें सच कैसे हो रहीं हैं?
वास्तव में एक देश में हम अपने छात्रों को दो तरह की शिक्षा दे रहे हैं। एक पब्लिक स्कूल की शिक्षा और दूसरी सरकारी स्कूल की शिक्षा। एक तरफ देश की बड़ी आबादी आज भी अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर है। वहां की शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता ही जा रहा है। दूसरी तरफ निजी स्कूल हैं। जहां की दिन प्रतिदिन महंगी होती जा रही शिक्षा, मध्यम वर्गीय परिवारों से दूर हो रही है। मध्यम वर्गीय परिवारों की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर चला जाता है। करोड़ों परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ा पाने की हैसियत में नहीं हैं। ये निजी स्कूल अब शिक्षा के मंदिर की जगह शिक्षा की दुकान में तब्दील हो गए हैं। इन शिक्षा की दुकानों के मालिक आम तौर पर किसी ना किसी दल के नेता हैं या फिर राजनीतिक दलों को मोटा चंदा पहुंचा रहे हैं।
एक रूका हुआ फैसला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले ने देश के अंदर गरीबी में जी रहे समाज को उम्मीद की एक रोशनी दिखाई थी। अगस्त 2015 के अपने आदेश में न्यायालय ने राज्य के सभी सरकारी अधिकारियों को अपने बच्चों की प्राथमिक शिक्षा सरकारी स्कूलों में अनिवार्य रूप से कराने को कहा था। न्यायालय ने ऐसा नहीं करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने को भी कहा था। न्यायालय के इस निर्णय के संबंध में जिसने भी जाना, उसके लिए शिक्षा के क्षेत्र में यह एक नई क्रांति की तरह ही था।
साल 2015 में उच्च न्यायालय ने प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश दिया था कि वह अन्य अधिकारियों से परामर्श कर यह सुनिश्चित करें कि सरकारी, अर्धसरकारी विभागों के कर्मचारी, स्थानीय निकायों के जन प्रतिनिधियों, न्यायपालिका एवं सरकारी खजाने से वेतन, मानदेय या धन प्राप्त करने वाले लोगों के बच्चे अनिवार्य रूप से उत्तर प्रदेश राज्य प्राथमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करें।
न्यायालय द्वारा ऐसा न करने वालों के खिलाफ दण्डात्मक कार्रवाई की भी अनुशंसा की गई थी। यह भी कहा गया था कि यदि कोई इस आदेश को नहीं मानता और अपने बच्चे को निजी स्कूल में पढ़ाने के लिए भेजता है तो उस स्कूल में दी जाने वाली फीस के बराबर की धनराशि उससे सरकारी खजाने में जमा कराई जाए। ऐसे लोगों की पदोन्नति और वेतन वृद्धि दोनों कुछ समय के लिए रोकने की बात भी कहीं गई थी। न्यायालय के इस आदेश का देश भर के अभिभावकों ने स्वागत किया हालांकि देश के शिक्षा माफियाओं की ताकत को समझने वाले, पहले ही कह रहे थे कि प्रदेश में यह लागू नहीं होगा।
यदि उत्तर प्रदेश में यह आदेश लागू हो जाता तो निश्चित तौर पर इससे शिक्षा माफियाओं को मुंह की खानी पड़ती और जब प्रदेश के सभी महत्वपूर्ण लोगों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते तो सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर भी सुधरता।
शिक्षा में भेदभाव क्यों?
सरकारी शिक्षा मॉडल का प्रचार कर रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से भी लोगों को उम्मीद थी कि उनके स्कूलों में बच्चे-बच्चे में भेद नहीं होगा। दिल्ली के सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री और पूर्व शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से दूर रखा। जब सरकार चलाने वाले ही अपनी शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास नहीं करेंगे, फिर वे देश और प्रदेश की जनता से यह उम्मीद कैसे लगा सकते हैं कि वह उनकी सरकारी शिक्षा पर विश्वास करेगी।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने 23 दिसम्बर 1991 को बिहार में पहला चरवाहा विद्यालय 25 एकड़ की जमीन पर मुजफ्फरपुर के तुर्की में खुलवाया था। इस प्रयोग को यूनिसेफ सहित दुनिया भर में सराहा गया लेकिन लालू प्रसाद यादव को अपने बच्चों को पढ़ाना था तो उन्हें चरवाहा विद्यालय में दाखिल नहीं कराया। यह सवाल ना उस समय के विपक्ष ने पूछा और ना ही जनता ने कि बिहार में ऐसे सरकारी स्कूल क्यों नहीं खुल सकते, जहां बिहार के सांसद, विधायक और मंत्री के बच्चे भी पढ़ें, सरकार के अधिकारी के बच्चे भी पढ़ें और वहां के आम नागरिकों के बच्चे भी। एक स्कूल में सभी पृष्ठभूमि के बच्चे जब मिलकर एक साथ पढ़ेंगे, तभी तो होगा सच्चे अर्थों में सामाजिक न्याय।
रोजगारोन्मुख शिक्षा का अभाव
आये दिन ऐसी खबरें आती हैं कि चपरासी और सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिए ग्रेजुएट और पीएचडी डिग्री धारी तक अप्लाई करते पाये जाते हैं। ऐसी खबरें सनसनी तो पैदा करती हैं लेकिन इनकी तह में जाकर जानने का प्रयास नहीं किया जाता कि आखिर क्या कारण है कि ऐसी डिग्री लेने के बाद भी उनमें रोजगार पाने की क्षमता नहीं है?
आज देश में स्नातक किए हुए साढ़े पांच करोड़ युवा दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं क्योंकि उन्होंने जिस विषय की पढ़ाई की थी, उस विषय को उन्होंने गंभीरता से लिया नहीं। उनकी पढ़ाई सिर्फ डिग्री हासिल करने की पढ़ाई बनकर रह गई। वह डिग्री उन्होंने हासिल भी कर ली लेकिन उस डिग्री से वे रोजगार हासिल नहीं कर पाए।
भारत में 2030 तक दसवीं पास तीस करोड़ युवा हो जाएंगे। सवाल यह है कि जब इनके पास बेसिक स्किल नहीं होगी तो इन्हें रोजगार कैसे मिलेगा? इसलिए शिक्षा को डिग्री उन्मुख ना होकर, रोजगारोन्मुख बनाया जाना चाहिए। नौजवान सिर्फ डिग्री के लिए पढ़ाई ना करें बल्कि अपनी शैक्षणिक योग्यता के साथ रोजगार कौशल से भी युक्त हों।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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