India China Relations: टूटने लगा है चीन के शीर्ष नेतृत्व का गुरूर
morale of China's top leadership started to weaken
जून 2020 में गलवान में भारतीय जांबाजों ने जिस तरह चीनी सैनिकों को जवाब दिया था, वह इतिहास में दर्ज हो चुका है। चीन को शायद गलतफहमी थी कि भारत 1962 का ही देश है, जब उसने शांतिप्रिय देश को धोखा दिया था। लेकिन भारतीय अभिमान अब जाग गया है और जून 2020 में देश के निहत्थे जाबांज सैनिकों ने चीन की सेना को नए भारत का तेवर दिखा दिया। तब से भारत ने जो रूख अख्तियार किया, उसके बाद चीन को जैसे सांप सूंघ गया। शायद उसी का असर है कि अब चीन के शीर्ष नेतृत्व का गुरूर टूटने लगा है।
जोहान्सबर्ग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग की मुलाकात को चीन के बदलते रवैये के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि चीन के राष्ट्रपति आखिरकार यह मानने को तैयार हो गए कि सीमा पर तनाव जारी रहेगा तो इसका असर दोनों देशों के आर्थिक हितों पर पड़ेगा।

यह ठीक है कि चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन यह भी सच है कि गलवान के बाद जिस तरह भारत ने कार्रवाई की, चीन से आयात पर लगाम कसने की शुरुआत की, उसके कई ऐप को प्रतिबंधित किया, उससे थोड़ा ही सही, चीन पर असर पड़ा है। वैसे चीन की अर्थव्यवस्था इन दिनों हिचकोले खा रही है। उसकी साम्राज्यवादी नीतियों के चलते दुनियाभर में जो देश पहले उसके मुरीद होते थे, वे भी अब उससे या तो दूरी बनाने लगे हैं या फिर चीन की कंपनियों के खिलाफ उन देशों में प्रदर्शन शुरू हो गया है।
हाल के वर्षों में कुछ अफ्रीकी देशों में चीनी कंपनियों के खिलाफ हुए प्रदर्शन इसके गवाह हैं। ले-देकर चीन के साथ पाकिस्तान खड़ा है। लेकिन उसके रोड एंड बेल्ट प्रोजेक्ट को लेकर पाकिस्तान की जनता में भी असंतोष पनपने लगा है। हाल के कुछ महीनों में चीनी कामगारों और इंजीनियरों की हत्या और उन पर हुए हमलों को इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि शांति और अहिंसा के देव बुद्ध के अनुयायियों की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश की शासकीय नीति आधिपत्यवादी है। इस नीति के चलते उसके पड़ोसी देश, विशेषकर पूर्वी एशिया के देश भी उससे दूरी बनाने लगे हैं। वियतनाम जैसे देश तो कई बार खुलकर उसका विरोध करते हैं। इसलिए चीन पर दबाव स्वाभाविक है। शायद यही वजह है कि चीन के राष्ट्रपति को ब्रिक्स सम्मेलन में खुलकर कहना पड़ा कि उसकी नीति साम्राज्यवादी नहीं है। बल्कि चीन विकासशील देश है। शायद उनका आशय यह रहा कि चीन की नीतियां विकासवादी हैं, साम्राज्यवादी नहीं।
चीन को अमेरिका चौतरफा घेरने की कोशिश में है। भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिका ने क्वाड का गठन करके एक तरह से चीन को सामरिक रूप से घेरने की कोशिश की है। इन सब घटनाओं का चीन की अंदरूनी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है। बेशक शी जिनपिंग अब भी देश के सर्वोच्च नेता हैं, लेकिन उनके नेतृत्व को लेकर भी सबकुछ ठीक नहीं है। ऐसे में उन्हें भी पड़ोसियों की चिंता होने लगी है। इधर भारत न सिर्फ तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है, वरन सीमा पर भारतीय सैनिकों ने चीन को मुंहतोड़ जवाब भी दिया है, शायद यही वजह है कि शी जिनपिंग को यह स्वीकार करना पड़ा है कि लद्दाख सीमा पर शांति होनी चाहिए, जो भारत और चीन के रिश्ते के लिए जरूरी है।
जोहान्सबर्ग में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई बातचीत का निचोड़ यही है। इसी बातचीत के दौरान दोनों शीर्ष नेता लद्दाख सीमा पर तनाव को कम करने को लेकर सहमत हुए। इसके बाद माना जा रहा है कि अब दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में जो कुछ असहजता थी, वह अब खत्म हो सकती है। इसे समझने के लिए हमें चीन के विदेश मंत्रालय के बयान को देखना होगा।
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता 'हुआ चुनयिंग' ने दोनों शीर्ष नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद कहा है कि, 'शी जिनपिंग ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की। दोनों नेताओं ने वर्तमान चीन-भारत संबंधों और साझा हित के अन्य सवालों पर स्पष्ट और गहन विचारों पर चर्चा की।'
ब्रिक्स बैठक में पहुंचे दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने द्विपक्षीय मसलों पर भी चर्चा की और नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव को कम करने या खत्म करने को लेकर तकरीबन सहमत हो चुके हैं। इसके बाद लगता ऐसा है कि सेनाएं अपनी मौजूदा स्थिति से पीछे जाएंगी। हालांकि चीन पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं किया जा सकता।
इस बातचीत को लेकर भारतीय विदेश सचिव विनय क्वात्रा के बयान को देखना होगा। विनय ने कहा है, 'दोनों शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर जोर दिया है कि सीमावर्ती इलाकों में शांति बनाए रखना और नियंत्रण रेखा का सम्मान करना, भारत-चीन संबंधों को सामान्य बनाने के लिए जरूरी है। इस संबंध में, दोनों नेता अपने संबंधित अधिकारियों को सैनिकों की शीघ्र वापसी और तनाव कम करने के प्रयासों को तेज करने का निर्देश देने पर सहमत हुए हैं।'
यह स्वीकार करने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि भारत और चीन एक-दूसरे के पड़ोसी हैं और दोनों देशों के गर्मजोशी भरे रिश्ते दोनों देशों के आर्थिक हितों को साध सकते हैं। दोनों देशों के रिश्ते अगर ठीक रहें तो तय है कि गरीबी हटाने की दिशा में दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तेजी से काम कर सकेगी। ऐसा होना ना सिर्फ एशिया के हित में होगा, बल्कि पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के दबाव से एशिया को मुक्त होने में मदद मिलेगी।
भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई बातचीत के बाद लगता है कि अब दोनों देश इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ने के लिए सहमत हो चुके हैं। वैसे ब्रिक्स के सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने की दिशा में दोनों देशों ने जिस तरह एक बिंदु पर सहमति दिखाई, उससे साफ था कि दोनों नेता अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के साथ ही द्विपक्षीय मसलों और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने को लेकर भी सहमत होंगे।
भारत और चीन का रिश्ता सदियों पुराना है। दोनों देशों का सांस्कृतिक रिश्ता भी रहा है। जाहिर है कि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बाद सांस्कृतिक रिश्तों की बुनियाद पर भविष्य के रिश्तों के कंगूरे खड़े किए जा सकेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसा ही होगा और यह दोनों देशों की जनता के साथ ही एशिया के करोड़ों गरीबों के हितों में भी होगा। अगर रिश्ते बेहतर रहेंगे, स्थिरता रहेगी तो लोग आगे बढ़ेंगे और फिर उसका फायदा आखिरकार पूरे एशिया को ही मिलेगा।
इसलिए रिश्तों में आई इस गर्मजोशी को एशिया को बिना शर्त स्वीकार करना होगा। हालांकि चीन का जो अतीत रहा है, वह भारत को आशंकित बनाए रखेगा। लिहाजा संदेह नहीं होना चाहिए कि चीन की इस पहल के बावजूद भारत इस दिशा में फूंक-फूंककर कदम रखना चाहेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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