Hunger Index: भारत को कुपोषित दिखाने का कारण क्या है?
Hunger Index: हाल में जारी की गई वैश्विक भूख सूचकांक 2023 की रिपोर्ट में 125 देशों में भारत को 111वें स्थान पर रखा गया है जिसका अर्थ है कि लोगों को पेटभर खाना देने में एक देश के तौर पर भारत बेहद पिछड़ा हुआ है। हालांकि भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए रैंकिंग मापने के तरीके को ही गलत बताया है। अन्य कई शोध संस्थानों ने भी रैंकिंग को अवैज्ञानिक बताते हुए इसकी खामियां गिनाई है।
असल में विश्व भूख सूचकांक की जिस प्रकार रैंकिंग तैयार की जाती है उसकी गहराई में जाने पर पता चलता है कि इसकी जो आलोचनाएं हो रही हैं, कुछ हद तक वे सही हैं। यही कारण है कि इस रैंकिंग को दुनिया के कई देशों ने नजरअंदाज कर दिया है, जबकि भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है। आखिर इसकी वजह क्या है?

हम आजादी का अमृत काल मना रहे हैं लेकिन अभी भी कहीं न कहीं यूरोप और अमेरिका से अपनी प्रशंसा और सर्टिफिकेट चाहते हैं। इसी के चलते जब कोई भी विदेशी संस्था हमें छोटी सी भी रैंकिंग में अच्छा कह देती है तो हम दुनिया भर में ढिंढोरा पीटने लगते हैं, और जब कोई खराब कहता है तो हम तीर तलवार लेकर उसके खिलाफ बोलने लगते हैं। सवाल है कि क्या यह मानसिकता सही है? जाहिर सी बात है कि पश्चिम के अमीर देश तभी मान्यता देंगे जब हम उनकी बात मानेंगे या उनकी तरह सोचेंगे, यह नहीं होगा तो वे हमें कभी भी अच्छी रैंकिंग नहीं देंगे।
अगर भूख सूचकांक को ही देखें तो वर्ष 2023 की रिपोर्ट में भारत 125 देशों में 111 में नंबर पर है। पिछले साल 121 देशों की रैंकिंग में भारत 107वें नंबर पर था। इसी तरह 2021 में 101वें और 2020 में 94 वें नंबर पर था। यानी इस साल भारत की रैंकिंग चार सीढ़ी नीचे गिर गई है। भोजन मुहैया कराने के मामले में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका की रैंकिंग भारत से ऊपर है।
हंगर इंडेक्स का कुल स्कोर 100 पॉइंट का होता है। इसके आधार पर किसी भी देश की भूख का पता लगाया जाता है। अगर किसी देश का स्कोर शून्य है तो वहां अच्छी स्थिति है, लेकिन किसी देश का स्कोर 100 है तो वह बेहद खराब स्थिति में है। भारत का स्कोर 28.7 है और इसे गंभीर स्थिति में रखा गया है। पाकिस्तान का स्कोर 26.6 और वह भी गंभीर स्थिति में है। इसी तरह बांग्लादेश का स्कोर 19, नेपाल का 15 और श्रीलंका का 13 है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में बच्चों में वेस्टिंग रेट दुनिया में सबसे ज्यादा है यानी यहां के बच्चों का वजन उनकी हाइट के हिसाब से कम है। भारतीय बच्चों में वेस्टिंग रेट 18.7% है जबकि 35.5% बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम ऊंचाई के हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 16.6 फ़ीसदी आबादी कुपोषित है, वहीं बाल मृत्यु दर 3.1 प्रतिशत है। यानी भारत में पैदा होने वाले हर 1000 बच्चों में से 3.1% बच्चे 5 साल भी नहीं जी पाते।
प्रश्न है कि क्या भारत में इतनी बड़ी संख्या में लोग भूखे सोते हैं? भारत के पास खेती के लिए उपजाऊ जमीन है, बड़ी पैदावार है, अनाजों की विविधता है, फिर वैश्विक भूख सूचकांक में भारत अपने पड़ोसी एशियाई देशों से पीछे कैसे हैं? यही कारण है कि वैश्विक भूख सूचकांक की रिपोर्ट पर भारत सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई है। सरकार ने कहा है कि यह गलत मापन से ग्रस्त है। रिपोर्ट न सिर्फ जमीनी हकीकत से अलग है बल्कि जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को भी जानबूझकर अनदेखा किया गया है।
भारत सरकार ने कहा है कि खाद्य सुरक्षा और अपनी आबादी की पोषण संबंधी जरूरत को पूरा नहीं करने वाले राष्ट्र के रूप में भारत की छवि को खराब करने के लिए निरंतर प्रयास होता रहा है। विदशी संगठनों द्वारा जारी हंगर इंडेक्स को गलत तरीके से मापा गया है। इंडेक्स की गणना के लिए उपयोग किए जाने वाले चार संकेतों में से तीन बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित है और पूरी आबादी का प्रतिनिधि नहीं करते हैं। कुपोषित आबादी के अनुपात का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण संकेतक अनुमान 3000 से भी छोटे नमूने के आधार पर किया गया है जो कि एक जनमत सर्वेक्षण पर आधारित है।
भारत जैसे विशाल आकार के देश के लिए छोटे से नमूने से एकत्र किए गए डाटा का उपयोग किया गया है जो न सिर्फ गलत है बल्कि अनैतिक भी है।
मालूम हो कि जी एच आई में ज्यादा आय वाले देशों को शामिल नहीं किया जाता। आमतौर पर भूख को नापने का पैमाना है कि शरीर में कितनी मात्रा में कैलोरी जा रही है। लेकिन वैश्विक भूख सूचकांक इस चीज को नहीं देखता। वह भूख की सामान्य परिभाषा को नहीं मानता, बल्कि कई और चीजों को शामिल करता है, जैसे माइक्रो न्यूट्रिएंट्स की कमी, अल्प पोषण, चाइल्ड वेस्टिंग, क्रॉनिक अल्प पोषण और आवश्यक पोषण और खराब पर्यावरण की वजह से 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत की दर।
हर देश को अंकों की स्केल पर नापा जाता है। अंतिम स्कोर की गणना अल्प पोषण और बाल मृत्यु दर दोनों को 33.33 प्रतिशत अंक और चाइल्ड वेस्टिंग और चाइल्ड स्टंटिंग को 16.66 प्रतिशत के अंक पर नापा जाता है। जिन देशों को 9.9 या उससे कम मिलते हैं उन्हें भूख की निचली कैटेगरी में डाला जाता है, जिनका अंक 20 से 35% तक होता है उन्हें सीरियस कैटेगरी में डाला जाता है, जिनका अंक 50 या उससे ऊपर होता है उसे खतरनाक की श्रेणी में माना जाता है। भारत को 28.7 का स्कोर मिला है यानी यह सीरियस कैटेगरी में आता है जबकि नेपाल को 15.0, पाकिस्तान को 26.6 श्रीलंका को 13.3 और बांग्लादेश को 19.0 अंक मिले हैं।
भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। कई मामलों में भारत की दुनिया भर में धाक है। कोरोना महामारी के दौरान भारत दुनिया भर के देशों को मदद करने में आगे रहा है। 81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया जाना सरकार की खाद्य सुरक्षा प्रतिबद्धता को दर्शाता है। लेकिन भूख सूचकांक में हर बार पीछे क्यों रह जाता है?
इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च ने अपनी एक रिपोर्ट में इसके कारणों की पड़ताल की है। जांच में कहा गया कि भूख को नापने का पश्चिमी पैमाना सही नहीं है। हर देश का अपना पैमाना होना चाहिए क्योंकि हर देश की परिस्थितियां, पर्यावरण और खान-पान अलग है। जी एच आई जिन चार चीजों से भूख को नापती है वह है अल्प पोषण, चाइल्ड स्टंटिंग, चाइल्ड वेस्टिंग और चाइल्ड मार्टिलिटी। इन चारों से भूख नहीं नापा जाता बल्कि इन चारों मानकों से सेहत की स्थिति पता की जा सकती है। ऐसे में इसे हंगर इंडेक्स का नाम देना ही असंगत है।
इसलिए अब समय आ गया है कि हम खुद अपना आकलन करें। हम अपनी खुद की रैंकिंग लाएं, ताकि हम अपने देश की तरक्की खुद चेक कर सकें। हर साल देख सकें कि हम खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर कितने आगे बढ़े या अभी भी पीछे रह गए हैं। भारत में एनएसएसओ द्वारा इसका अध्ययन किया जाता रहा है उसे फिर से गति प्रदान करने की जरूरत है। हमारे देश में बहुत सी ऐसी संस्थाएं हैं जो यह काम कर सकती हैं। खुद नीति आयोग यह कर सकता है, जिसमें हम राज्यों को रैंक करते हुए देख सकते हैं कि कौन सा राज्य आगे है और कौन पीछे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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