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Women in Masjid: कितना इस्लामिक है मस्जिद में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश?

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Women in Masjid: कहने के लिए तो इस्लाम सिर्फ एक किताब पर टिका दीन है लेकिन इस एक किताब को परिभाषित करने के लिए जितनी किताबें लिखी गयी हैं उतना शायद ही किसी और किताब को परिभाषित करने की जरूरत पड़ी हो।

How Islamic is the entry of Muslim women in the mosque?

मुसलमान अपने हर सवाल के जवाब के लिए आखिरकार कुरान की ओर देखता है क्योंकि वो ये मानता है कि इसे अल्लाह ने पैगंबर के ऊपर उतारा है। मुसलमानों की यही मान्यता है और वो इसी मान्यता से अपना जीवन जीते हैं।

लेकिन इतना सीधा सरल साधन होने का मतलब यह नहीं होता कि मुसलमानों के सारे मसले बहुत आसानी से हल हो जाते हैं। मुसलमानों के भीतर एक अकीदा यह भी है कि कुरान रहती दुनिया तक के लिए है। जब तक इस्लाम रहेगा, मुसलमान को इसी किताब से अपने लिए रास्ता खोजना है।

इसके बाद शुरु होता है कुरान को परिभाषित करने का दौर। इसके लिए कई बार हदीसों का सहारा लिया जाता है तो कई बार तफ्सीरों का। कुरान, हदीस और तफ्सीरों की रोशनी में जो अलग अलग फतवे जारी होते हैं, उसे अपने अपने समाज में प्रमाणिक मानकर उसके हिसाब से मुसलमान अपना जीवन निर्धारित करते हैं।

इसके कारण मुसलमानों के लिए जीवन जीने की जो बातें बहुत साधारण होनी चाहिए वो बहुत जटिल बन जाती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण कुरान का अरबी भाषा में होना है। भारत की ही बात करें तो कितने प्रतिशत मुसलमान होंगे जो अरबी को जानते होंगे? ऐसे में उन्हें कुरान के ऐसे जानकारों पर निर्भर रहना पड़ता है जो अरबी के जानकार होते हैं और कुरान की आयतों की व्याख्या करते हैं।
यहीं से सारा भ्रम पैदा होता है। एक ही मसले पर इतनी तरह की बातें सामने रखी जाती हैं कि आम मुसलमान कभी समझ ही नहीं सकता कि मसले की असलियत क्या है?

इस्लाम में महिलाओं का सवाल भी एक ऐसा ही सवाल है जो आज तक तय नहीं हो सका है कि उनको इस्लाम में आखिरकार कितने हक हुकूक हासिल हैं? अलग अलग फिरकों की अपनी अलग दलीलें हैं और अपने अलग अलग फतवे।

फिर जहां मुसलमान रहते हैं वहां के समाजों का असर भी उन पर रहता है। ऐसे में कुरान हदीस की रोशनी में मुसलमानों के जैसे अधिकांश सवालों के पक्के तौर पर जवाब नहीं मिल पाते, महिलाओं को लेकर भी कोई निश्चित जवाब नहीं मिल पाता कि आखिर उनके हक क्या हैं?

जामा मस्जिद के शाही इमाम की ओर से जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में अकेले आने से रोका गया, उसके बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ कि आखिरकार महिलाओं को मस्जिद में जाने की इजाजत है या नहीं? हालांकि इस्लाम की सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं को अकेले घर से निकलना मना है। उसे किसी महरम (पुरुष गार्जियन) के साथ ही घर से निकलने की इजाजत है।

लेकिन जहां तक मुस्लिम महिलाओं के नमाज या सलात का सवाल है तो इस मामले में कुरान पूरी तरह से मौन है। हां, सही बुखारी के हवाले से जाकिर नाइक जैसे इस्लामिक विद्वान इतना जरूर कहते रहे हैं कि गुलाम औरतों को मस्जिद जाने की इजाजत है। यहां वो गुलाम से आशय अल्लाह की गुलामी से करते हैं इसलिए मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज अता करने को सही मानते हैं।

हालांकि यहां यह स्पष्ट नहीं है कि गुलाम औरत से असल में आशय क्या है? आठवीं सदी में जिस समय ये हदीसें लिखी जा रही थीं उस समय गुलाम औरत ऐसी महिलाएं एवं लड़कियां होती थीं जिन्हें मुसलमान युद्ध में जीतते थे, और बांदी या लौंडी कहते थे।

जाकिर नाईक या फिर ऐसे ही इस्लामिक जानकार मस्जिदों में जाने के लिए सही बुखारी की एक और हदीस का उल्लेख करते हैं। यह हदीस मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश की स्थिति को स्पष्ट करने की बजाय भ्रम पैदा करती है। यह हदीस कुछ इस प्रकार है: इब्न उमर ने फरमाया कि पैगंबर ने कहा, "औरतों को रात में मस्जिदों में जाने की अनुमति दें।" (सही बुखारी, खंड 2, पुस्तक 13, संख्या 22) सवाल ये उठता है कि औरतों को रात में मस्जिदों में जाने की इजाजत क्यों दी जा रही है जबकि रात में मस्जिदें बंद रहती हैं। क्या उस समय कोई ऐसी व्यवस्था थी कि औरतों को दिन के बजाय रात में नमाज पढने की इजाजत दी जाती थी?

हालांकि आज की दुनिया के कई देशों में मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में जाने की इजाजत है जिसमें सऊदी अरब भी शामिल है। शर्त यह है कि उनके और मर्द के बीच पर्दा रहता है। महिलाओं के लिए नमाज से पहले वुजु करने की अलग व्यवस्था रहती है। लेकिन भारत जैसे देश में मस्जिदों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

2020 में भगवान अयप्पा मंदिर मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बाकी धर्मों में महिलाओं की स्थिति जानने का प्रयास किया था। उस समय आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक एफिडेविट के जरिए यह तो माना था कि मुस्लिम महिलाएं मस्जिद में नमाज अता कर सकती हैं लेकिन साथ ही ये भी कहा था कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

इस्लाम में महिलाओं के सवाल पर ज्यादातर मुस्लिम संगठनों, उलेमाओं, मौलवियों, मौलानाओं, आलिमों का यही रुख होता है। वो ये तो कहते हैं कि इस्लाम में महिलाओं को सबसे ज्यादा हक हासिल है लेकिन मानवीय हक के लिए कोई पहल हो तो वो किसी भी संवैधानिक संस्था को हस्तक्षेप करने से रोकते हैं।

तीन तलाक के मामले पर पूरे देश ने देखा कि एक तरफ तीन तलाक को गलत बताते हुए भी इस्लामिक जानकारों ने इसे रोकने के लिए कानून बनाये जाने का विरोध किया। यही दोहरा रवैया शंका पैदा करता है।

जहां तक कुरान का सवाल है तो कुरान मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम मर्दों के बराबर नहीं मानता। सूरा निशा (4.34) में कुरान स्पष्ट रूप से कहता है कि मर्द औरतों से श्रेष्ठ हैं तथा औरतों पर मर्दों को पूरा हक हासिल है। इसी आयत में अल्लाह मुस्लिम मर्दों को ये अधिकार भी देता है कि अगर औरतें समझाने पर न मानें तो उन्हें खाटों पर लिटाकर पीटो।

इस्लामिक जानकारों द्वारा कुरान की इस आयत के दर्जनों अनुवाद हैं लेकिन स्त्री पर पुरुष की श्रेष्ठता और 'खाटों पर लिटाकर पीटने' से किसी अनुवादक ने उलटफेर नहीं किया है।

इसी तरह इस्लाम में औरत की गवाही को आधा कहा जाता है। अल्लाह को औरत की याददाश्त पर भरोसा नहीं था, इसलिए कुरान की सुरा 2 आयत 282 में अल्लाह फरमाते है कि दो औरतों की गवाही एक मर्द के बराबर होती है। जावेद अहमद घामड़ी जैसे इस्लाम के जानकार दलील देते हैं कि अल्लाह ऐसी व्यवस्था औरतों की 'गलती सुधारने के लिए' देता है।

यही बात हाल में ही एक एक्स मुस्लिम चैनल पर जब एक नौजवान मुस्लिम लड़की को पता चली तो उसने इसे मानने से ही इंकार कर दिया। फिर जब उस लड़की को कुरान का हवाला दिया गया तो वह फूट फूटकर रोने लगी। वह बंगलौर में रहकर नौकरी करती है। उसने आधुनिक शिक्षा पायी है और उसे अपने मुसलमान होने पर गर्व भी था। लेकिन जैसे ही उसे यह बात पता चली कि खुदा उसे आधा दिमाग वाला मानता है तो इस्लाम से उसका भरोसा उठ गया।

स्वाभाविक है इस्लाम में औरतों को मर्द के बराबर नहीं माना जाता इसलिए नमाज पढने या नमाज के वक्त मस्जिद में प्रवेश को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। मिस्र की एक महिला एक्टिविस्ट नवल अल सादवी की एक प्रसिद्ध उक्ति है कि इस्लाम का अल्लाह भी मेल गॉड (पुरुष देवता) है। पूरा इस्लाम युद्ध और मर्द के इर्द गिर्द केन्द्रित है। ऐसे में अगर महिलाओं को मस्जिदों से दूर रखा जाता है तो इस्लामिक रूप से इसमें गलत क्या है?

यह भी पढ़ें: जामा मस्जिद में महिलाओं के अकेले आने पर प्रतिबंध के फैसले की स्वाति मालीवाल ने की इरान से तुलना, भेजा नोटिस

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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English summary
How Islamic is the entry of Muslim women in the mosque?
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