योग दिवस विशेष: संसार में कैसे फैला भारत का योग व ध्यान ?
योग दिवस विशेष: संसार में कैसे फैला भारत का योग व ध्यान?
कोई सवा सौ साल पहले की बात है। स्वामी विवेकानंद एक दिन दक्षिणेश्वर मठ में गुरु मां से मिलने जाते हैं। रामकृष्ण परमहंस तब तक अपना शरीर छोड़ चुके थे। वो गुरु मां से सात समंदर पार जाने की अनुमति मांगते हैं। शारदा मां इसकी अनुमति दे देती हैं, और विवेकानंद धर्म प्रचार के लिए अमेरिका की यात्रा पर निकल जाते हैं।
यह घटना इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले भारत के साधु-संत समंदर पार नहीं करते थे। संत समाज में यह अघोषित निर्देश था कि उन्हें समुद्र पार नहीं करना है। लेकिन विवेकानंद ने धर्म प्रचार के लिए उन्नीसवीं सदी के आखिर में समुद्र पार जाने की जो शुरुआत की वह बीसवीं सदी में एक सैलाब बन गया। आज संसार के हर कोने में भारत के साधु-संत है जो धर्म, मानवता और योग-ध्यान का प्रसार कर रहे हैं।

विवेकानंद के बाद दूसरे बड़े संत हुए जिन्होंने पश्चिम में योग और ध्यान पर बड़ा काम किया, उनका नाम है परमहंस योगानंद। योगानंद लाहिड़ी महाशय की परंपरा में दीक्षित क्रिया योगी थे और अमेरिका में उन्होंने सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की। इसी तरह भारत के पहले योग इंस्टीट्यूट इंडियन योग इंस्टीट्यूट, मुंबई के प्रमुख योगेन्द्र जी ने 1920 के बाद से ही वैज्ञानिक रूप से भारत ही नहीं विदेशों में भी योग को प्रमाणित करना शुरु कर दिया था। 1924 में महाराष्ट्र के लोनावाला में अपना योग केन्द्र स्थापित करनेवाले स्वामी कुवलयानंद ने भी देश विदेश में वैज्ञानिक विधि से योग को प्रमाणित करने के लिए बड़ा काम किया।
इसके बाद जो बड़े संत पश्चिम की ओर गये उनमें प्रमुख रूप से विष्णुदेवानंद और सत्यानंद सरस्वती थे। ये दोनों स्वामी शिवानंद के शिष्य थे जिनका आश्रम ऋषिकेश में था। स्वामी शिवानंद सरस्वती ने 1940 के दशक में अपने इन दो प्रमुख शिष्यों को योग के प्रचार प्रसार के लिए नियुक्त किया। स्वामी विष्णुदेवानंद ने जहां अमेरिका में शिवानंद योग वेदान्त सेन्टर की स्थापना की तथा वैश्विक स्तर पर योग आसन तथा भारतीय जीवन दर्शन का प्रचार-प्रसार शुरु किया। इसी तरह स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने 1960 के दशक में बिहार के मुंगेर में बिहार स्कूल ऑफ योग की स्थापना की और देश विदेश में योग ध्यान का प्रसार किया। इसी समय हिमालय से गये एक योगी स्वामी राम ने भी अमेरिका में योग पर सशक्त कार्य किया।
ये सभी योगगुरु जानते थे कि पश्चिम की दुनिया उनकी बात को तब तक स्वीकार नहीं करेगी जब तक वो अपनी बात को लैबोरेटरी में प्रमाणित नहीं कर देते। इसलिए इन संतों ने योग के चमत्कारों को लैबोरेटरी में सिद्ध किया। जैसे, स्वामी नाद ब्रह्मानंद ने स्वास रोकने वाले कुंभक का ऐसा प्रयोग किया कि कई मिनट तक वो सांस रोककर बैठे रहे और उनके शरीर से भंवरे की गुंजन वाली ध्वनि निकलती रही। स्वामी राम ने अमेरिका के मेनिंजर फाउण्डेशन में 1969 में हृदय गति रोकने, शरीर पर औरा या प्रकाश को प्रकट करने तथा साइंस की सीमा से परे जाकर शरीर का ताप बढाने के प्रयोग किये। उस समय स्वामी राम ने कहा था कि "ये प्रयोग मैं इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि मैं कोई जादूगर हूं। बल्कि इसलिए कर रहा हूं ताकि संसार के लोग जान सकें कि एक व्यक्ति जब अपने मष्तिष्क पर नियंत्रण कर ले तो वह अपने शरीर पर किस प्रकार नियंत्रण कर सकता है।" इन संतों के ऐसे ही प्रयोगों ने पश्चिमी जगत में ये उत्कंठा पैदा की कि वो योग के बारे में अधिक से अधिक जानें।
इन संतों, योगियों का प्रयास का परिणाम रहा कि बीसवीं सदी पूरी दुनिया के लिए योग के उभार व प्रचार-प्रसार की रही। 2016 में आईपीएसओएस के अध्ययन ने पाया कि अमेरिका में उस समय 3.5 करोड़ से अधिक लोग योग आसन कर रहे थे। आज अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, एशिया और अरब देशों में भी योग और ध्यान का अभ्यास किया जाता है। सबसे कट्टर इस्लामिक मुल्क समझे जानेवाले सऊदी अरब में नऊफ मरवाई के प्रयासों से योग को खेल का दर्जा प्रदान किया गया है और उसके अभ्यास को सरकारी मान्यता मिली हुई है।
योग के इसी प्रसार का असर रहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब सितंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र संघ में योग के लिए अंतराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव किया तब पूरी दुनिया से उनके इस प्रस्ताव को समर्थन मिला। संयुक्त राष्ट्र में एकमत से 177 देशों ने योग के लिए 21 जून की तिथि निर्धारित कर दी। आज संसारभर में 21 जून योग दिवस के रूप में मान्य है। यह सब न होता, अगर भारत के साधु संतों और योगियों ने संसारभर में इसके प्रसार के लिए 100-125 वर्ष पहले कठिन प्रयास प्रारम्भ न किये होते।












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