राम मंदिर निर्माण आंदोलन पर बंटते दिख रहे हैं हिन्दू

नई दिल्ली। राममंदिर निर्माण को लेकर हिन्दू पहली बार बंटते दिख रहे हैं। पहली बार इसलिए कि इस बार विचारों के स्तर पर ही नहीं, एक्शन के स्तर पर भी बंटे हुए दिख रहे हैं हिन्दू। एक धर्मसंसद कुम्भ में हुई, दूसरी धर्म संसद अयोध्या में हो रही है। एक धर्म संसद 30 जनवरी को ख़त्म हुई, तो दूसरी धर्मसंसद 31 जनवरी को शुरू हुई। फर्क और भी हैं। कुम्भ की धर्मसंसद का नेतृत्व शंकराचार्य ने किया है। शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती की मौजूदगी में राम मंदिर के शिलान्यास का धर्मादेश आया है। वहीं, अयोध्या की धर्मसंसद का आयोजन विश्व हिन्दू परिषद ने किया है। यहां आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी अहम रहने वाली है।

बापू के शहादत दिवस पर आंदोलन का एलान

बापू के शहादत दिवस पर आंदोलन का एलान

राममंदिर निर्माण के लिए हो रही इस कवायद को हिन्दू आश्चर्य से देख रहे हैं। कुम्भ में हुई धर्म संसद से राम मंदिर के शिलान्यास की तारीख तय हो, यह तो अपेक्षा की जा सकती है। मगर, तारीख तय करने के साथ-साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हो, ऐसी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या की तारीख यानी शहादत दिवस पर गांधीजी की याद में सविनय अवज्ञा आंदोलन का राजनीतिक महत्व भी है।

जिस राष्ट्रपिता के मुख से अंतिम शब्द भी ‘हे राम' के थे, उनके शहादत दिवस को राम मंदिर के शिलान्यास की तारीख का एलान करने में इस्तेमाल करना दरअसल आंदोलन से जनता को जोड़ने की कोशिश है। धर्मसंसद आंदोलन की सफलता के मंत्र को समझती है, यह बात भी इससे साबित होती है। वहीं, धर्मसंसद में केंद्र सरकार के रवैये पर उठा विरोध का स्वर भी इस आंदोलन की रूपरेखा में झलकता है।

राजनीति से परे नहीं है धर्मसंसद

राजनीति से परे नहीं है धर्मसंसद

ऐसा नहीं है कि जो दूसरी धर्मसंसद 31 जनवरी को अयोध्या में हो रही है वह भी राजनीति से परे रहने वाली है। बल्कि वह राजनीति में आकंठ डूबी हुई दिखेगी हमेशा की तरह। धर्मसंसद की आयोजक विश्व हिन्दू परिषद हो या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ये दोनों संगठन कभी भी विशुद्ध रूप से धार्मिक या सांस्कृतिक संगठन नहीं रहे। राजनीतिक रूप से सक्रिय संगठन रहे हैं और इनकी कार्यशैली पर ध्यान दिया जाए तो यह चुनाव के मौकों पर अक्सर ऐसे आयोजन करते हैं और ऐसे नारे या आंदोलन की रूपरेखा गढ़ते हैं जिससे दक्षिणपंथी संगठन को चुनावी फायदा हो। मगर, इस बार इन्हें साधु-संतों की धर्मसंसद से भी मुकाबला करना पड़ रहा है।

यह तय है कि अयोध्या की धर्मसंसद से भी राममंदिर निर्माण की आवाज़ मुखर होकर निकलेगी। अल्टीमेटम जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल होगा। मगर, उसमें मोदी सरकार से सीधे टकराव के बजाए उसका दोष देश की राजनीति यानी परोक्ष रूप से कांग्रेस और आखिरकार न्यायालय पर थोपा जाएगा। विश्व हिन्दू परिषद की धर्मसंसद में शरीक होने वाले लोग सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर की सुनवाई में हो रही देरी पर असंतोष का इजहार कर चुके हैं। ये लोग अध्यादेश लाने की बात केंद्र सरकार से कहते रहे हैं। इस बात को सम्भव है कि वे फिर दोहराएं।

कुम्भ की धर्म संसद से निकले धर्मादेश में कहा गया है, "जबतक मंदिर निर्माण नहीं हो जाता, तबतक हर हिंदू का यह कर्तव्य होगा कि वह गिरफ्तारी देनी हो तो गिरफ्तारी दें। यह आंदोलन तब तक चलेगा जब तक रामजन्मभूमि हिंदुओं को सौंप नहीं दिया जाता और उस पर हम मंदिर का निर्माण नहीं कर लेते।"

कसौटी पर योगी आदित्यनाथ सरकार

कसौटी पर योगी आदित्यनाथ सरकार

यह बात देखने की होगी कि यूपी की योगी आदित्यनाथ की सरकार किस तरह से कुम्भ से अयोध्या कूच के आंदोलन से निबटने वाली है। अयोध्या कूच न सिर्फ मोदी सरकार के लिए, बल्कि योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए भी कठिन परीक्षा साबित होने वाली है। खासकर इसलिए कि खुद योगी आदित्यनाथ भी संत हैं। अगर कुम्भ धर्म संसद के आयोजकों की मानें तो धर्मसंसद को सभी अखाड़ा परिषदों का समर्थन भी प्राप्त है।

मगर, कुम्भ की धर्मसंसद का रुख योगी और मोदी सरकार दोनों के ख़िलाफ़ खुलकर दिखता है जब आयोजक अविमुक्तेश्वरानन्द कहते हैं, "जो सरकार काशी और प्रयाग में सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर नष्ट कर चुकी हो, उस सरकार से मंदिर निर्माण की उम्मीद करना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है। परम धर्म संसद में दुनिया भर से आए संतों और सनातन धर्म के प्रतिनिधियों ने ये तय कर लिया है कि 21 फरवरी को हर हाल में अयोध्या पहुंचना है। हमें यदि रोकने की कोशिश की जाएगी तो भी हम वहां पहुंचेंगे।"

योगी-मोदी सरकार से साधु-संतों की खुली तकरार

योगी-मोदी सरकार से साधु-संतों की खुली तकरार

योगी-मोदी सरकार से खुली तकरार और राम मंदिर शिलान्यास की तारीख तय करते हुए साधु-संत राम मंदिर आंदोलन को नया मोड़ देते दिख रहे हैं। वे इस आंदोलन को अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रहे हैं। मगर, ये बात भी साफ है कि साधु-संतों का आंदोलन जब तक विहिप, आरएसएस और बीजेपी से समर्थन हासिल नहीं कर लेता है, परवान चढ़ने वाला नहीं है। वजह साफ है कि साधु-संत के पास राजनीतिक संगठन नहीं है और साधु-संत ये भूल रहे हैं कि बीते 30 साल में राम मंदिर आंदोलन जितना धार्मिक रहा है, उससे कहीं अधिक राजनीतिक हो चुका है।

साधु-संत राम मंदिर निर्माण के लिए कुर्बानी तो दे सकते हैं, लाठी खा सकते हैं, गोली खा सकते हैं और जेल भी जा सकते हैं। यहां तक कि अनशन करते हुए जान भी दे सकते हैं। मगर, जनता को जोड़ते हुए वे कोई बड़ा आंदोलन बगैर विहिप, संघ या बीजेपी के कर लेंगे, इसमें सबको संदेह है।

अलग रुख लेने को क्यों मजबूर हुए साधु-संत?

अलग रुख लेने को क्यों मजबूर हुए साधु-संत?

राम मंदिर निर्माण के लिए 21 फरवरी की तारीख को इसलिए हिन्दू भी सफलता के नजरिए से सशंकित होकर देखने को विवश हैं। ये सवाल उठता है कि आखिर राम मंदिर पर साधु-संत अलग रुख लेने को क्यों मजबूर हो गये? इसका उत्तर इस आंदोलन पर राजनीति का कब्जा ही है। इसी राजनीतिक वर्चस्व की लडाई अयोध्या में हो रही धर्म संसद में भी देखी और समझी जा सकती है जिसकी आयोजक विहिप है।

एक धर्मसंसद जिसका नेतृत्व शंकराचार्य कर रहे हैं और एक धर्मसंसद जिसमें आरएसएस प्रमुख की मौजूदगी ही नेतृत्व को बयां करता है- इन दोनों ही धर्मसंसदों के आयोजन ने राममंदिर निर्माण पर हिन्दुओं को दो तरीके से सोचने को मजबूर कर दिया है। राम मंदिर निर्माण का आंदोलन हिन्दुओं को बांटने का अवसर बन जाएगा- ऐसा किसी ने कभी सोचा नहीं होगा। मगर, आज यह सही अर्थ में कड़वी सच्चाई बनी दिख रही है।

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