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Hindi Diwas: हिन्दी भाषा है किसकी?

Hindi Diwas: देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली जिस खड़ी बोली को हम हिन्दी कहते हैं वह भारत में किसी की भी मातृभाषा नहीं है। जिन्हें हिन्दीभाषी कहकर उनकी भाषा को हिन्दी बताया जाता है, असल में उन सब हिन्दीभाषियों की अपनी अलग अलग भाषाएं हैं, जिन्हें बोलियां कहा जाने लगा है।

उत्तर भारत में जिन बोलियों को हिन्दी का अलग अलग रूप बताया जाता है उन बोलियों का विकास हिन्दी से टूटकर नहीं हुआ है। सच्चाई इसके उलट है। बोलियां हिन्दी के पहले से मौजूद हैं और एक समय तक उन बोलियों में साहित्य सृजन भी होता रहा है। इसमें ब्रज और अवधी के साहित्य तो आज भी कई प्रकार के धार्मिक या सांस्कृतिक ग्रंथों के रूप में मौजूद हैं।

Hindi Diwas 2023 Whose language is Hindi?

इसी तरह बिहार जाएं तो भोजपुरी, मैथिली, मगही, वज्जिका, अंगिका, राजस्थान जाएं तो मारवाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, हड़ौती, शेखावटी, निमाड़ी, बागड़ी, ढूंढाणी, उत्तराखंड जाएं तो कुमाउनी, गढवाली, मध्य प्रदेश जाएं तो बुन्देली, बघेली, मालवी, छत्तीसगढ जाएं तो आदिवासियों के इलाकों में लगभग 93 बोलियां बोली जाती हैं। ये तो कथित रूप से कुछ हिन्दी भाषी राज्यों की बोलियां हैं। ठीक ठीक गणना करना इतना कठिन है जितना अनाज के ढेर में दाने गिनना। प्रमुख बोलियों की उप बोलियां हैं जो हर चार छह कोस पर थोड़ा सा बदल जाती हैं। इसके कारण वो एक नयी भाषा का रूप धारण कर लेती हैं।

ये बोलियां ही भारत की वास्तविक विरासत, पहचान और हमारी विविधता में एकता का आधार हैं। उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक अगर कोई पदयात्रा करे तो वह किसी भी भाषा को बोलनेवाला हो निर्विघ्न रूप से न केवल अपनी यात्रा पूरी कर लेगा बल्कि इस यात्रा में कुछ नयी भाषा भी सीख लेगा। इसका कारण बोलियों की वही विविधता है जो केवल हिन्दी ही नहीं बल्कि भारत की उन सभी प्रमुख 22 भाषाओं में दिखता है जिन्हें भारत सरकार द्वारा मान्य किया गया है।

अगर हिन्दी की बोलियां हैं तो मराठी की भी बोलियां हैं, गुजराती की भी बोलियां हैं और तमिल, तेलुगु तथा कन्नड़ की भी अपनी-अपनी बोलियां हैं। इन सब बोलियों में ठीक वही अंतर दिखता है जो उत्तर भारत की हिन्दी की बोलियां बताई जानेवाली भाषाओं में दिखता है। यही बोलियां उस भाषा का आधार हैं जिनके कारण उनका जन्म और विकास हुआ है। मनुष्य ने व्याकरण सीखकर बोलना शुरु नहीं किया। उसने बोलना शुरु किया तो कभी न कभी उस बोलने को व्याकरण में ढाल दिया गया ताकि बोलने को लिपिबद्ध किया जा सके।

इन बोलियों के अपने शब्द भंडार होते हैं जो उस भाषा क्षेत्र की विशिष्ट पहचान होते हैं। भारत की किसी भी भाषा में शब्द ऊपर से नहीं गढ़े गये हैं। शब्दों का जन्म धरातल से हुआ है जिन्हें उस भाषा में समाहित कर लिया गया। आश्चर्यजनक रूप से बोलियों के ये शब्द कुछ मिलते जुलते रूप में दूसरी भाषाओं में भी मिल जाते हैं। जैसे अवधी बोली में अन्न दान को शिधा पिसान कहा जाता है। यहां से दूर जब महाराष्ट्र जाएंगे तो पायेंगे कि मराठी में भी अन्न भंडार के लिए शिधा शब्द का ही इस्तेमाल होता है। इसी तरह बोलियों के शब्द आपस में तैरते हुए दूर दूर की यात्रा करते हैं और भारत की विविधता में एकता को सुनिश्चित करते हैं।

तमिल को छोड़कर अधिकांश भारतीय भाषाओं का व्याकरण संस्कृत से आता है। इसके कारण शब्दों की आकृति भले ही अलग अलग हो लेकिन उनकी वाक्य रचना का प्रकार लगभग एक जैसा है। शब्दों के बाद व्याकरण भारतीय भाषाओं के बीच एक मजबूत सेतु निर्मित करता है जिसके कारण भारत की भाषाई विविधता में अंतर्निहित एकता दिखाई देती है। इसीलिए तमिल को छोड़कर कोई भी भाषा भाषी चाहे तो उसके लिए खड़ी बोली वाली हिन्दी सीखना और बोलना आसान होता है। कुछ ऐसा ही हिन्दी वालों के साथ भी होता है।

हिन्दी भाषी राज्यों से गैर हिन्दीभाषी राज्यों में जानेवाले मजदूर और कारीगर बिनी किसी औपचारिक पढाई के अगर वहां की भाषा सीख जाते हैं तो उसके पीछे भारत के भाषा शास्त्र का यही जादुई कमाल है। फिर भी भाषा के नाम पर अगर विवाद पैदा किया जाता है और हिन्दी थोपने का आरोप लगता है तो इसके पीछे राजनीतिक स्वार्थ तो हो सकते हैं सामाजिक यथार्थ कुछ भी नहीं है।

अगर हिन्दी किसी अन्य भाषा के लिए खतरा है तो वह उन बोलियों के लिए भी उतना ही बड़ा खतरा है जिन्हें हिन्दी की बोलियां बताकर प्रचारित किया जाता है। हिन्दी के प्रभाव से उन बोलियों पर ही सबसे अधिक संकट मंडराया है जो खड़ी बोली के विकास से पहले अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती थीं। हिन्दी ने किसी अन्य भारतीय भाषा का उतना अतिक्रमण नहीं किया है जितना कथित हिन्दीभाषी राज्यों की बोलियों का ही अतिक्रमण हुआ है। मानक खड़ी बोली गांव गांव तक बोली जाने लगी है जिसके कारण उस क्षेत्र की बोली के अस्तित्व पर आज नहीं तो कल संकट अवश्य पैदा होगा।

तो क्या इसका अर्थ यह होगा कि उत्तर भारत के लोग मानक भाषा के रूप में खड़ी बोली का त्याग कर दें? नहीं। अब यह संभव नहीं है। यूरोप में जैसे अंग्रेजी एक मानक बोली के रूप में विकसित हो गयी और धीरे धीरे संसार के दूसरे हिस्सों तक पहुंच गयी कुछ वैसा हाल हिन्दी का है। इसकी सुगमता के कारण तमाम तरह के विरोध के बावजूद यह क्रमश: आगे की ओर बढ़ रही है। उस तमिलनाडु में आज एकाध प्रतिशत लोग हिन्दी समझते बोलते हैं जो न केवल अलग व्याकरण बल्कि अलग मन मानस लेकर बैठा है।

हिन्दी का साहित्यिक स्वरूप चाहे जैसा हो लेकिन इसका व्यावहारिक स्वरूप संपर्क भाषा वाला ही है। जब लोगों ने पदयात्रा करके देश के अलग अलग हिस्सों में जाना बंद कर दिया तब एक दूसरे से संपर्क के लिए भाषाई संकट का पैदा होना अस्वाभाविक नहीं है। हवाई जहाज के इस युग में कुछ महीनों की यात्रा कुछ घण्टों में सिमट गयी है। ऐसे में नयी भाषा का सीखना और अपनी भाषा के शब्दों को उस भाषा में बांटने का जो क्रमिक चलन था वह भी खत्म हो गया है। इसके कारण भाषाएं रूढ हो गयी हैं और शायद लोगों के मन भी। ऐसे में एक संपर्क भाषा तो सबको चाहिए जो अंग्रेजी कदापि नहीं हो सकती।

अंग्रेजी शासन प्रशासन और कॉरपोरेट जगत की भाषा है। वह शासन तो कर सकती है लेकिन भारत के जनसामान्य के बीच संपर्क स्थापित करना उसके बूते की बात नहीं। यहां हमें अपनी कोई एक मानक भाषा चुनना ही होगा जहां हिन्दी के अलावा कोई और विकल्प दिखता नहीं। जैसे अंग्रेजी यूरोप में किसी की मातृभाषा न होकर भी यूरोप ही नहीं दुनियाभर की संपर्क भाषा बन गयी ठीक वही हाल हिन्दी का है। किसी की भी मातृभाषा न होना ही इसकी वो अच्छाई है जो लोगों के बीच एक संपर्क भाषा के रूप में क्रमश: विस्तारित हो रही है।

किसी एक की भी मातृभाषा न होना खड़ी बोली वाली हिन्दी के लिए ठीक वैसे ही वरदान है जैसे यूरोप में अंग्रेजी के लिए बना। हिन्दी किसी अन्य भारतीय भाषा का अतिक्रमण करने की क्षमता नहीं रखती। उसके शब्दों का भंडार स्थानीय परिवेश के अनुसार बदलता रहता है। उसने तो अरबी, फारसी के बाद अंग्रेजी के भी इतने शब्दों को अपने अंदर समाहित कर लिया है कि कुछ लोग इसे हिंगलिश तक कहने लगे हैं। ये हिन्दी की बुराई नहीं बल्कि उसकी अच्छाई है और अपनी इसी अच्छाई की वजह से राजनीतिक विरोध के बावजूद भारत के जनसाधारण के बीच मजबूत संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हो रही है। इसे राष्ट्रभाषा और राजभाषा के रूप में पहचान दिलाने की बजाय अगर संपर्क भाषा के रूप में ही देखा जाएगा तो इसका राजनीतिक विरोध भी अपने आप खत्म हो जाएगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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