हिंदी दिवस 2020: प्रेम जैसी सहजता और 'रोटी' हिंदी भाषा की ताकत के लिए है जरूरी

गढ़पुरा, बेगूसराय। हिंदी दिवस पर वैसे तो ढेर सारी अच्छी-अच्छी बातें होती हैं। हिंदी को हमारे देश का स्वाभिमान, आम जन के दिलों में घर करने वाली भाषा और ढेर सारे अलंकरणों से विभूषित किया जाता है। हिंदी दिवस से हिंदी पखवाड़े तक में हिंदी की खूब श्रद्धा-भक्ति होती है। हिंदी एक भाषा मात्र नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता तक से जुड़ जाती है। लोग हिंदी दिवस की बधाई भी देते हैं। फेसबुक से लेकर सोशल मीडिया के लगभग हर प्लेटफार्म पर हिंदी विशिष्ट हो जाती है। फिर सप्ताह/पखवाड़ा जाता है और साथ में हिंदी के लिए उमड़ा प्रेम भी। इसलिए मेरी बातें एक सवाल से शुरू होती है।
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हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े के आयोजन की जरूरत क्यों?
सवाल यह है कि जब हिंदी हमारे देश में बोली जाने वाली सबसे प्रमुख भाषा है। देश की सर्वाधिक आबादी में बोली जाती है। फिर हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े के आयोजन की जरूरत क्यों पड़ रही है? हिंदी देश की अधिकतम आबादी के द्वारा बोली जाए जाने के बाद भी अपने ही देश में वह सम्मान हासिल क्यों नहीं कर पाई है? यूं तो इसका सीधा सा जवाब नहीं है क्योंकि यह हमें तब हिंदी के इतिहास की तरफ भी ले जाएगा जब दक्षिण भारत में भाषाई आंदोलन हुआ था। लेकिन हमें इस प्रश्न का उत्तर यहीं से मिलेगा। इसे समझने के लिए हमें अपने देश की बुनावट पर गौर करना होगा। हमारे देश की बुनाई किसी एक रंग के धागे से नहीं हुई है। यहां हर राज्यों की अपनी क्षेत्रीय भाषा है। क्षेत्रीय भाषा से प्रेम और मोह होना लाजमी है। हर किसी को उसके जीवन के मधुरतम पलों की स्मृतियां उसकी अपनी भाषा में ही आती है। हर कोई अपनी भाषा से अगाध प्रेम करता है जैसे कि वह उसकी अस्मिता से जुड़ी हुई हो। 'हिंदी' राजभाषा बननी चाहिए, इस एक इच्छा ने हिंदी का सबसे ज्यादा अहित किया है। बगैर राजभाषा बने भी हिंदी संपर्क भाषा हो सकती थी। ऐसा होने से किसी को ऐतराज भी नहीं होता। खैर समय अब इन बातों को काफी पीछे छोड़ आया है। अब नई चुनौतियां हैं जिसकी हम बात कर रहे हैं।

हिंदी को किन चुनौतियों से पार पाना होगा?
भले हम हिंदी दिवस पर हिंदी की खूब बड़ाई कर लें। हिंदी पर लच्छेदार-लंबे भाषण दे लें लेकिन वर्तमान समय में हिंदी के सामने एक साथ कई चुनौतियां हैं जिसमें भाषाई स्वीकारता से लेकर जीवकोपार्जन की भाषा बनने तक की बातें हैं। पहले बात करते हैं भाषाई स्वीकारता की। इसे समझने के लिए हमें संस्कृत भाषा की तरफ लौटना होगा और यह सोचना होगा कि हिंदी की मूल भाषा होने के बाद भी वह संकुचित क्यों होती चली गई? शुद्धतावादी नजरिए ने कालांतर में भाषा का अहित ही किया है। यह भाषा के संकुचन का बड़ा कारक हुआ है। संस्कृत भाषा ने अपनी इसी शुद्धतावादी आग्रह के कारण समय के साथ आए परिवर्तन को आत्मसात नहीं किया और वह सिकुड़ गई। जबकि मातृभाषा बंधनों से मुक्ति चाहती है। वह सहज बने रहना चाहती है ठीक जैसा सहज प्रेम होता है। कबीर के शब्दों में कहें तो 'भाषा है बहता नीर'। हिंदी को इससे सीखनी होगी। हालांकि हिंदी ने इस मामले में अपने को अच्छी तरह से समायोजित किया है। इसनें बहुत से शब्दों को समय के साथ-साथ अपनाया है जिसका परिणाम हम देख ही रहे हैं कि यह जिंदा है और आगे के लिए उम्मीद भी जगाती है। लेकिन इस उम्मीद को हमेशा जिंदा रहने के लिए इसके अलावे भी बातें हैं जो कहीं ज्यादा बड़ी हैं जिसे हमें समझना होगा।

अंग्रेजी का प्रभुत्व
इस भूमंडलीकरण के दौर में अंग्रेजी का प्रभुत्व कितनी तेजी से बढ़ रहा है यह तो हम देख ही रहे हैं। अंग्रेजी का विरोध करके हम उसके प्रभुत्व को कम नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग इस हिंदी दिवस/पखवाड़े से हिंदी में काम करने और इसे बढ़ावा देने की बातें करते हैं। ये अच्छी बातें हैं लेकिन फिर लगे हाथों जब अंग्रेजी को कोसने लग जाते हैं तब हिंदी की सांसें फूलने लगती है क्योंकि तब भाषाई दुराग्रह का पता चलता है और यह सर्वविदित है कि दुराग्रह से खुद का ही नुकसान होता है। हर भाषा श्रेष्ठ है। अगर किसी के प्रभुत्व को कम करना है तो हमें उसके सामने एक बड़ी लकीर खींचनी होगी। इसके लिए हमें सबसे बड़ी चुनैती से लड़ना होगा। पता है वह सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

आर्थिकी और रोजगार मुहैया कराने की भाषा
आज का बड़ा युवा वर्ग अंग्रेजी की तरफ झुक रहा है। मां-बाप भी अपने बच्चों की शिक्षा अंग्रेजी में ही हो इसकी भरपूर कोशिश करते हैं क्योंकि आज के दौर में अंग्रेजी में रोजगार के व्यापक अवसर हैं। युवाओं को रोजगार अंग्रेजी भाषा की जानकारी दे रही है। रोजगार देने वाले विषयों की सामग्री अंग्रेजी में स्तरीय और पर्याप्त मात्रा में आसानी से उपलब्ध है। तो लोगों में अंग्रेजी की तरफ आकर्षण होना स्वाभाविक है। यहीं हिंदी पिछड़ जाती है। अच्छे साहित्य के साथ कम से कम रोजगार देने वाले विषयों की पर्याप्त सामग्री हिंदी में भी होनी चाहिए ताकि वह केवल विशिष्ट ही नहीं बल्कि आमजन के रोजगार की भाषा बन सके। दुनियां की कोई भी भाषा अगर रोजगार देने का साधन नहीं बन पा रही है तो कितनी भी सुंदर भाषा क्यों न हो वह व्यापक भाषा नहीं बन पाती है। कभी फ्रेंच भाषा अंग्रेजी से ज्यादा व्यापक थी। लेकिन इसी एक वजह से अंग्रेजी आगे बढ़ते बढ़ते दुनियाभर में चली गई। और आज भी हमारी हिंदी के सामने वही खड़ी है। इस ग्लोबल दौर में समय की मांग के अनुसार अपनी उपस्थिति बनाए रखना निहायत जरूरी है। जो अनुकूलित होगा वह बचा रहेगा।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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