Himachal Pradesh: कांग्रेस के जमीनी नेता मोदी के बढ़ते आधार से प्रभावित, इसीलिए छोड़ रहे पार्टी
Himachal Pradesh: श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में रामलला की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा का विरोध और समारोह का बॉयकॉट करने के झटके कांग्रेस को अभी भी लग रहे हैं|
कांग्रेस अगर 2014 का चुनाव हारने के बाद ए.के. एंटनी कमेटी की रिपोर्ट का अध्ययन करके खुद को सुधार लेती, तो प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का बॉयकॉट नहीं करती| भले ही सोनिया गांधी खुद न जाती, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी को भेज देती|

अब कांग्रेस भले ही यूपीए भंग कर के इंडी एलायंस बना ले, या राहुल गांधी की जितनी चाहे भारत जोड़ो यात्राएं करवा ले, देश का हिन्दू जनमानस उसके साथ नहीं जुड़ने वाला| मिलिंद देवड़ा या अशोक चव्हाण के कांग्रेस छोड़ने के राजनीतिक कारण तो होंगे ही, लेकिन उनके दिमाग में एक बात तो बैठी ही होगी कि राहुल गांधी ने 2014 से शुरू हुई हार से सबक नहीं सीखा है, इसलिए हार का सिलसिला 2024 में भी जारी रहना है|
पिछले दस साल में देश की 80 प्रतिशत हिन्दू जनता का मोदी के प्रति विश्वास और गहरा हुआ है| उसके चार बड़े कारण हैं, जिसका इम्पेक्ट इन चुनावों में दिखेगा| कश्मीर से 370 का हटाया जाना, राम जन्मभूमि मन्दिर का बनना और नागरिकता संशोधन क़ानून| उपरोक्त तीनों ही मुद्दे हिन्दुओं से जुड़े हैं|

नागरिकता संशोधन क़ानून का भारत के नागरिकों से वैसे तो कोई सीधा संबंध नहीं है| लेकिन आसपास के मुस्लिम देशों में हिन्दुओं का जो उत्पीड़न हो रहा है, उस क़ानून का ताल्लुक उनसे है| ये तीनों ही मुद्दे मोदी के पक्ष में साईलेंट क्रांति करने वाले हैं| कोई आश्चर्य नहीं होगा कि भाजपा अपने बूते पर 350 क्रास कर ले| चौथा मुद्दा भी हिन्दुओं की आस्था का है, और वह सबसे ज्यादा आहत करने वाला मामला है|
नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ चले आन्दोलन का सभी विपक्षी पार्टियों ने समर्थन किया था| राजनीतिक समर्थन अपनी जगह है| भले ही उसका कोई उचित आधार न हो, लेकिन इस आन्दोलन में जब ला इलाहा इलल्लाह के नारे लगे, तो शशि थरूर को छोड़ कर किसी विपक्षी नेता ने उस का विरोध नहीं किया| न राहुल गांधी ने, जो खुद को भगवान शिव का उपासक कहते हैं, न अरविन्द केजरीवाल ने, जो खुद को हनुमान का उपासक कहते हैं| इनके अलावा भी किसी नेता ने विरोध नही किया|
इस नारे का मतलब है अल्लाह के सिवा कोई दूसरा भगवान नहीं है| इस नारे का स्पष्ट उद्देश्य हिन्दुओं की भावनाएं आहत करना ही होता है| भारत में 80 प्रतिशत आबादी हिन्दू है| राजनीतिक विरोध में इस तरह के नारे लगा कर हिन्दुओं का मजाक उड़ाया गया, और मूर्तिपूजक राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल की तरह सब विपक्षी हिन्दू तालिया बजा रहे थे| इस चुनाव में उसी का रिएक्शन देखने को मिलेगा|
मोदी विरोधी कह रहे हैं कि 2019 में भाजपा को 37 प्रतिशत वोट मिला था, जबकि विपक्ष को 60 प्रतिशत वोट मिला था, इसलिए वे एकजुट हो कर भाजपा को हरा देंगे। फिर राहुल गांधी का मुकाबला किससे होगा? अभी तो वह ऐसी कोई सीट नहीं ढूंढ पाए हैं, जहा वह भाजपा के उम्मीदवार को आमने सामने की टक्कर में हराएं|
सीपीआई, सीपीएम और ममता बनर्जी ने उन्हें खुली चुनौती दी है कि वह अमेठी और वायनाड को भूल कर वाराणसी में मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ें| जबकि राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा सुरक्षित सीटें ढूंढ रहे हैं| इन दोनों ने अभी तक एलान नहीं किया है कि वे अपनी पैतृक रायबरेली और अमेठी सीटों से ही चुनाव लड़ेंगे|
संकट के समय कर्नाटक इंदिरा गांधी के परिवार को सहारा देता रहा है| इंदिरा गांधी चिकमंगलूर और सोनिया गांधी बेल्लारी से चुनाव जीत चुकी हैं| लेकिन भाई बहन की कर्नाटक से चुनाव लड़ने की हिम्मत भी नहीं दिख रही| क्योंकि राज्य में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद वहां भाजपा का पलड़ा भारी है|
इंडी एलायंस बनने के बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन हो चुका है| उससे पहले पिछले तीन साल में विपक्ष महाराष्ट्र, पुदुचेरी, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान सरकारों को भी गंवा चुका है| फिर विपक्ष किस बूते पर मोदी को हराने का ख़्वाब देख रहा है| अब तो उसके सामने हिमाचल की सरकार को बचाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है|
हाल तो यह है कि सोनिया गांधी बीमारी के बहाने यूपीए भंग करके चुनाव मैदान से ही भाग गई| वह अपनी पार्टी की सरकार होने के बावजूद हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा का चुनाव लड़ने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाई, क्योंकि उन्हें पता था कि वीरभद्र सिंह का परिवार बागी हो चुका है| उन्हें पुराने वफादार अशोक गहलोत पर ही भरोसा करना पड़ा, और राजस्थान से वह राज्यसभा सांसद बन गईं।
हिमाचल के चुनाव में कांग्रेस ने वीरभद्र के चेहरे का खूब इस्तेमाल किया था, लेकिन चुनाव के बाद वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को दरकिनार कर वीरभद्र सिंह के विरोधी रहे सुखविंदर सिंह सुख्खू को मुख्यमंत्री बना दिया| यह सोनिया परिवार का घमंड था कि उन्होंने वीरभद्र सिंह के परिवार की विरासत और राजनीतिक उत्तराधिकार को दरकिनार कर दिया था| वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह को उप मुख्यमंत्री भी बना दिया होता, तो स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद कांग्रेस के उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी की राज्यसभा चुनाव में हार नहीं होती|
राममय हो गए वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह ने वहां राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस का राम नाम सत्य कर दिया| विक्रमादित्य सिंह ने डेढ़ महीना पहले ही सोनिया परिवार को तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे, जब उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के उद्घाटन का न्योता स्वीकार करते हुए आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का न्योते के लिए आभार जताया था|
एक तरह सोनिया गांधी ने न्योता ठुकरा दिया था, तो दूसरी तरफ विक्रमादित्य सिंह न्योते के लिए आरएसएस और विहिप का आभार जता रहे थे| सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा और मल्लिकार्जुन खरगे में राजनीतिक समझ होती, तो विक्रमादित्य की नाराजगी दूर करने की कोशिश शुरू होती| अब विक्रमादित्य सिंह ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को हरा कर खुद भी मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया है|
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार की हालत यह हो गई कि विपक्ष के विधायकों को मार्शलों की मदद से बाहर निकलवा कर बजट पास करवाया गया| विपक्ष का कहना है कि कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ चुकी है| बिलकुल वैसी ही परिस्थिति पैदा हो गई है जैसे 2016 में उत्तराखंड में विपक्ष की मत विभाजन की मांग ठुकरा कर स्पीकर ने ध्वनिमत से बजट पास करवा दिया था| भाजपा ने राज्यपाल को ज्ञापन भी दिया है|
अब कांग्रेस स्पीकर के माध्यम से अपने उन छह विधायकों की सदस्यता खत्म करवा कर सरकार बचाने के लिए हाथ पाँव मार रही है| सवाल यह है कि उत्तरप्रदेश हो या हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र हो या झारखंड विपक्ष के बड़े बड़े नेता अपनी पार्टियां छोड़कर भाजपा में जा रहे हैं| जो जमीन पर हैं, वे जमीनी हकीकत जानते हैं| इसलिए वे आए दिन थोक के भाव दलबदल कर भाजपा के साथ जा रहे हैं|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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