Himachal Pradesh: सुक्खू के हिमाचल में छिना कांग्रेस का सुख-चैन
Himachal Pradesh: उत्तर भारत में कांग्रेस के एकमात्र दुर्ग हिमाचल प्रदेश में राजनीतिक कोहराम मचा हुआ है। हर क्षण राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही हैं। अपने 6 विधायकों की क्रॉस वोटिंग के चलते राज्यसभा का रण हारने के पश्चात सुखविंदर सिंह 'सुक्खू' सरकार के भविष्य पर संकट के बादल छा गए हैं।
हालांकि अपने त्यागपत्र को मीडिया की उपज बताकर सुखविंदर सिंह ने अपनी सरकार तो बचा ली है किंतु सरकार कब तक रहेगी, यह कह पाना कठिन है। विधानसभा अध्यक्ष ने भी कांग्रेस के 6 बागी विधायकों को अयोग्य घोषित कर गेंद न्यायालय के पाले में डाल दी है ताकि सुक्खू सरकार को अंदरूनी राजनीति में डैमेज कंट्रोल का समय मिल सके। बागी विधायक न्यायालय का रुख करने जा रहे हैं।

दरअसल, यह सारा राजनीतिक प्रपंच राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी चयन के बाद जोर पकड़ गया। वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा हिमाचल से राज्यसभा जाना चाहते थे किंतु उनके नाम को लेकर राज्य इकाई से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक सहमत नहीं थे। एक प्रस्ताव सोनिया गांधी को हिमाचल से राज्यसभा भेजने का था किंतु वे राजस्थान प्रस्थान कर गईं और पूर्व केंद्रीय मंत्री अभिषेक मनु सिंघवी को पार्टी ने हिमाचल से राज्यसभा का प्रत्याशी घोषित कर दिया।
68 विधानसभा सीटों में से 40 पर कांग्रेस विधायकों के होने से सिंघवी की जीत तय मानी जा रही थी किंतु कांग्रेस में बढ़ता असंतोष एवं बाहरी प्रत्याशी होने के दंश को सिंघवी झेल नहीं पाए और सरकार की फूट ने उनके उच्च सदन में पहुंचने के रास्ते बंद कर दिए। सरकार के असंतोष को हर्ष महाजन ने अपने पक्ष में मोड़ा और स्थिति यह बन गई कि अब सुक्खू सरकार का भविष्य असमंजस में है।
पुराने कांग्रेसी हर्ष महाजन ने हिलाई कांग्रेस की राजनीतिक जड़ें
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री देस राज महाजन के बेटे हर्ष महाजन पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के मुख्य रणनीतिकार रहे हैं। 1986 से 1996 तक हर्ष महाजन प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। 1993 से 2007 तक तीन बार चंबा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे महाजन 1993 में तत्कालीन सरकार में मुख्य संसदीय सचिव रहे। 1998 में उन्हें प्रदेश कांग्रेस का चीफ व्हीप चुना गया तथा 2003 में महाजन को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। महाजन हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे हैं।
सितंबर, 2022 में विधानसभा चुनाव के दौरान हर्ष महाजन ने कांग्रेस की नीतियों से क्षुब्ध होकर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र के अनुभवी एवं वरिष्ठ नेता के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस के एक बड़े वर्ग में उनके प्रति सहानुभूति थी। विशेषकर, वीरभद्र सिंह गुट के नेताओं के लिए हर्ष महाजन भाजपायी होकर भी कांग्रेसी बने रहे। यही कारण रहा कि मात्र 25 विधायक होने के बाद भी भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में उन्हें प्रत्याशी बनाकर एक प्रकार से उनके संबंधों एवं उनके कद को परखने की राजनीतिक बिसात बिछाई।
हर्ष महाजन ने भी कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में चल रही खींचतान का भरपूर लाभ उठाया और वीरभद्र समर्थक गुट के 6 विधायकों सहित 3 निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में लाने में सफल रहे और अंततः राज्यसभा पहुंच गए।
इस पूरे घटनाक्रम में अप्रत्याशित रूप से भाजपा नेतृत्व ने हर्ष महाजन को फ्री हैंड देकर स्वयं को दूर कर लिया ताकि कांग्रेस सरकार की अस्थिरता की स्थिति में उस पर सीधे कोई आरोप न लग सके और हुआ भी यही। उत्तराखंड, झारखंड, बिहार जैसी राजनीतिक परिस्थिति होने के बाद भी भाजपा नेतृत्व पर उठ रहे सवाल इस बार सत्ताधारी कांग्रेस की खीज अधिक दर्शा रहे हैं।
वीरभद्र परिवार को शीर्ष पद न देने से बढ़ा असंतोष
कांग्रेस ने 2022 का हिमाचल विधानसभा चुनाव 6 बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह के चेहरे पर लड़ा था। वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह ने विधानसभा चुनाव में जो मेहनत की थी उसका पारितोषक वे मुख्यमंत्री पद के रूप में चाहती थीं किंतु कांग्रेस नेतृत्व; विशेषकर प्रियंका गांधी ने वीरभद्र विरोधी सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री बनाकर वीरभद्र समर्थकों में असंतोष के बीज बो दिए।
इसके इतर हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार मुकेश अग्निहोत्री को उपमुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस नेतृत्व ने प्रतिभा सिंह और उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह का ही अपमान कर डाला। हालांकि कांग्रेस की सरकारों में असंतोष नई बात नहीं है किंतु हिमाचल प्रदेश में असंतोष को दबाने के लिए उपमुख्यमंत्री पद का सृजन कांग्रेस की नई रणनीति थी जिसका उसे कोई लाभ होता नहीं दिख रहा।
संभवतः प्रियंका गांधी ने उपमुख्यमंत्री का दांव गुटबाजी रोकने और हिमाचल में परिवारवादी राजनीति पर भाजपा के हमलों से निजात पाने को चला था किंतु मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री दोनों हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से बनाकर उन्होंने मंडी संसदीय क्षेत्र में असंतोष के बीज बो दिए और बीते सवा वर्ष से बरकरार यह असंतोष राज्यसभा चुनाव के दौरान फूट गया। अब स्थिति यह है कि सुक्खू सरकार रहेगी या जाएगी; सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरा है।
विक्रमादित्य सिंह ने सुक्खू सरकार मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देते हुए अपने परिवार की अनदेखी का आरोप लगाया और अपने पिता वीरभद्र सिंह की तुलना अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर से करते हुए कहा कि उनकी प्रतिमा के लिए शिमला के माल रोड पर 2 गज जमीन तक सुक्खू सरकार ने नहीं दी। विक्रमादित्य सिंह के त्यागपत्र ने सरकार में व्याप्त असंतोष को सड़क पर ला दिया है और वीरभद्र समर्थक विधायक अब आरपार के मूड में हैं।
हालांकि सुक्खू सरकार ने उनका मंत्री पद से त्यागपत्र अस्वीकार कर दिया है जिसके बाद विक्रमादित्य सिंह के सुर भी नरम पड़े हैं और वे आलाकमान की ओर ताक रहे हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि विक्रमादित्य ने अपना त्यागपत्र वापस ले लिया है, जिसकी पुष्टि संदेहास्पद बनी हुई है।
कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष अब विकट स्थिति
हिमाचल प्रदेश सरकार को लेकर कांग्रेस नेतृत्व देर से ही सही किंतु सक्रिय हुआ है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार एवं भूपेंद्र सिंह हुड्डा को शिमला भेजकर डैमेज कंट्रोल की कवायद प्रारंभ की गई है। हिमाचल प्रभारी राजीव शुक्ला पहले से ही शिमला में डटे हुए हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि कांग्रेस के 6 बागी विधायक अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं। 6 विधायकों के अयोग्य घोषित होने के बाद अब हिमाचल विधानसभा में 62 विधायक बचे हैं और सरकार बचाने के लिए सुक्खू को 32 विधायकों का साथ चाहिए, जो उनके पास है।
हालांकि कांग्रेस के 6 विधायकों की अयोग्यता के चलते यदि अब एक भी विधायक कांग्रेस से टूटा तो सुक्खू सरकार अल्पमत में आ जाएगी। मुख्यमंत्री निवास में बैठकों का दौर जारी है किंतु अब स्थिति यह है कि यदि असंतोष दबाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व सुक्खू को मुख्यमंत्री पद से हटाता है तो हमीरपुर बगावत का नया केंद्र बनेगा और यदि विक्रमादित्य को नहीं मना पाता है तो वीरभद्र परिवार के भाजपा के नजदीक जाने की संभावना है।
हालांकि 6 विधायकों की अयोग्यता के चलते वीरभद्र गुट कमजोर हो गया है किंतु विक्रमादित्य और उनकी माता प्रतिभा सिंह अभी भी अपने समर्थकों को एकजुट कर सकती हैं। अब कांग्रेस नेतृत्व को बीच का रास्ता निकालना है जो वर्तमान में नजर नहीं आ रहा। वैसे गलती कांग्रेस नेतृत्व की है कि उसने गुटबाजी पर समय रहते लगाम नहीं लगाई और स्थिति ऐसी बनने दी कि न तो राज्यसभा की सीट मिली और न ही सरकार की स्थिरता बरकरार रहती दिख रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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