Film Heroine: अभिनेत्रियों के लिए कठिन रही है राजनीति की डगर
महिलाओं के लिए राजनीति की राहें हमेशा से ही कठिन रही हैं। उनके लिए ये तभी आसान होता है, जब वो किसी ताकतवर या राजनीतिक परिवार से होती हैं। लेकिन अगर आप नहीं हैं तो भले ही कितनी बड़ी अभिनेत्री ही क्यों ना हों, आपका चरित्र हनन होना तय है।
हेमा मालिनी को लेकर रणदीप सुरजेवाला का बयान और कंगना का नेताजी बोस को पहला प्रधानमंत्री कहने पर मजाक उड़ाना ये साबित करता है कि पुरुष प्रधान समाज में केवल जयललिता जैसी हीरोइन से तानाशाह बनी नेता ही अपनी जगह बना सकती है।

एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद जब पार्टी ने उनकी पत्नी वीएन जानकी को तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बना दिया, तब जयललिता ने उम्मीद नहीं छोड़ी और ऐसी पहली अभिनेत्री बनीं जो मुख्यमंत्री पद तक पहुंची। वीएन जानकी को ये गद्दी विरासत में मिली थी, जिसे उनके पति की शिष्या जयललिता ने कुबूल नहीं किया।
आपसी विवाद में अन्ना द्रमुक पार्टी 3 भागों में विभाजित हो गई। सबसे बड़ा हिस्सा जानकी के ही पास था। काफी हंगामे के बीच विश्वासमत पारित हुआ, लेकिन मौका देखकर राजीव गांधी सरकार ने 23 दिन के अंदर जानकी की सरकार को अनुच्छेद 356 लगाकर गिरा दिया और अगले विधानसभा चुनाव में जयललिता नेता विपक्ष और 1991 में सीएम बन गईं।
जयललिता की भी राह आसान नहीं रही और शायद विरोधी नेताओं का उनके प्रति तिरस्कार पूर्ण रवैया ही था जो उनके निरंकुश होने की वजह बना। 1989 में विधानसभा में उनके साथ मायावती जैसा गेस्ट हाउस कांड हुआ। फटी हुई साड़ी के साथ जयललिता बाहर निकलीं, लेकिन जनता ने उनके प्रति सुहानूभूति दिखाते हुए उन्हें राज्य की 39 में से 38 लोकसभा सीटें उसी साल आम चुनाव में दे दीं।
जयललिता ने दक्षिण की बाकी हीरोइंस को भी राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। हालांकि इंदिरा गांधी के रहने तक ज्यादातर कांग्रेस से जुड़ने से परहेज ही करती थीं। इंदिरा की मौत के बाद हिंदी फिल्मों की कामयाब अभिनेत्री रहीं वैजयंती माला ने 1984 के चुनावों से राजनीति में प्रवेश किया।
कांग्रेस के टिकट पर वैजयंती माला साउथ चेन्नई की सीट से 48,000 वोटों से जीतीं। लेकिन इंदिरा लहर में उनकी जीत को सीरियस नहीं लिया गया। हालांकि अगली बार तमिलनाडु के कानून मंत्री को हराकर उन्होंने वो सीट फिर जीत ली लेकिन उनकी पार्टी के लोग ही उनको लड़ते हुए देखना नहीं चाहते थे, सो उनको राज्यसभा भेजकर उनसे मुक्ति का रास्ता ढूंढा गया। राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होते होते उन्हें पार्टी के लोगों से निराशा हो गई, सोनिया गांधी को एक भावुक पत्र लिखा, पार्टी के लोगों के बारे में लिखा और 1999 में बीजेपी में शामिल हो गईं।
जयाप्रदा को 1994 में एनटी रामाराव राजनीति में लाए। वो तेलुगू देशम पार्टी के लिए प्रचार करती रहीं। लेकिन उस साल चुनाव लड़ने से मना कर दिया। बाद में चंद्रबाबू नायडू ने विद्रोह किया तो उनके साथ चलीं गई। नायडू ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया लेकिन जयाप्रदा पार्टी के लोगों के लगातार निशाने पर रहीं। उनको टीडीपी से विरक्ति हो गई।
अमर सिंह से मुलाकात उन्हें समाजवादी पार्टी में ले आई। रामपुर लोकसभा सीट से 2004 में भारी मतों से जीतने के बाद आजम खान से उनकी बिगड़ गई। आजम खान पर उन्होंने आरोप लगाया कि वो उनकी फेक न्यूड तस्वीरें बंटवा रहे हैं। बावजूद इसके वो जीत गईं लेकिन बाद में उन्हें अमर सिंह के साथ पार्टी से निकाल दिया गया। आजम खान ने जयाप्रदा पर जो 'चड्डी' वाला कमेंट किया था, वो उस वक्त राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बन गया था।
रामायण सीरियल की सीता दीपिका चिखलिया भी बीजेपी के टिकट पर 1991 में बड़ौदा से सांसद बनी थीं लेकिन उनको दूसरे तरह के विरोध का सामना करना पड़ता था। उनकी सीता वाली छवि से इतर जब भी कुछ होता था, उन्हें ट्रॉल किया जाता था। जैसे स्कूल के दिनों की एक फोटो जिसमें उनके हाथ में एक ग्लास था। आतंकी अफजल गुरू की पत्नी का रोल करना आदि। सांसद रहते ही बेटी हुई तो उन्होंने परिवार के लिए राजनीति को अलविदा कह दिया।
महाभारत की द्रौपदी रूपा गांगुली ने जरूर बंगाल में बीजेपी के बैनर तले जोरदार पारी खेली, लेकिन नारी सुरक्षा पर उनके एक बयान ने टीएमसी के नेताओं को ढेरों गंदे बयान देने का मौका दे दिया। रूपा ने कहा था कि "टीएमसी के नेताओं की पत्नियों और बेटियों को बंगाल भेजो, बिना रेप के 15 दिन तक रह पाएं तो मुझे कहना"। फिर तो हर टीएमसी नेता उनसे पूछने लगा था कि आपका कितनी बार रेप हुआ है? कई एफआईआर हुईं। सो रूपा वहां काफी विवादों में रहीं।
बंगाल में कई अभिनेत्रियों ने राजनीति की राह पकड़ी, हालांकि ममता का उन्हें आगे बढ़ाना टीएमसी नेताओं को ही रास नहीं आया। संघ्या रॉय, शताब्दी रॉय जैसी अभिनेत्रियां सांसद रही हैं और सत्तारूढ टीएमसी का होने के चलते उस तरह के बयानों का निशाना होने से बचती रही। लेकिन अपनी ही पार्टी के नेताओं के विरोध के चलते नई नई सांसद बनीं मिमी चक्रवर्ती और नुसरतजहां को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और पार्टी ने भी उनके अलग होने में ही भलाई समझी।
लेकिन बंगाल से ही लॉकेट चटर्जी जैसे एक्ट्रेस ने अपने कैरियर को तिलांजलि देने के बजाय बीजेपी का दामन थामना बेहतर समझा। रूपा गांगुली के बाद उनके हाथों में महिला बीजेपी की कमान दी गई है। इन्हीं चुनावों में लॉकेट पर एक टीएमसी नेता ने 'दो नंबरी माल' कहकर भद्दा कमेंट किया है, जिससे बार बार उसी पुरुषवादी मानसिकता का खुलासा होता है, जो महिला से मुकाबले में हारता देख उसके चरित्र पर उंगली उठाना शुरू कर देता है।
राहुल गांधी ने भी हाल के दिनों में ऐश्वर्या राय को लेकर नाचने वाली जैसे कमेंट किए तो सुप्रिया श्रीनेत्र ने कंगना से मंडी का रेट पूछा डाला। बाद में लगा कि भारी गलती हो गई तो किसी दूसरे के सिर डाल दिया। जब उर्मिला मातोंडकर कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरीं थीं, तो खुद कंगना ने उन्हें सॉफ्ट पोर्न एक्ट्रेस बोल दिया था।
ऐसे में कई बार महिलाएं ही महिलाओं को निशाना बनाती रही हैं। हालांकि रेखा, लता जैसी राज्यसभा सदस्य बिना किसी का निशाना बने चुपचाप अपनी पारी पूरी कर गईं, वहीं जया बच्चन और नफीसा अली जैसी हीरोइंस अपने को कुछ मुद्दा विशेष तक सीमित रखकर राजनीति की पारी खेलती रहीं।
पार्टी के जब अपने ही नेता अभिनेत्रियों के विरोध में आ जाएं तो काफी मुश्किल हो जाती है। साउथ की एक्ट्रेस रम्या यानी दिव्या स्पंदना का कांग्रेस में कद काफी बढ़ा। वह सोशल मीडिया की हेड तक बना दी गईं। राहुल गांधी के बेहद करीबी होने के चलते उन्हें मीडिया में काफी तवज्जो मिली। लेकिन जिस तरह अचानक राजनीति से ही उनकी विदाई कर दी गई, उस पर लोग अभी तक आश्चर्य जताते हैं।
वहीं नगमा का सालों तक अलग अलग रैलियों, चुनावों में इस्तेमाल के बाद जिस तरह एक मंच पर बदसलूकी का वीडियो सामने आया उससे लगा कि विरोधी पार्टियों के लोग ही नहीं पार्टी के अंदर के लोग भी एक्ट्रेसेज को राजनीति में पसंद नहीं करते।
ऐसे में हम कह सकते हैं कि राजनीति में जयललिता जैसा मुकाम किसी एक्ट्रेस को नहीं मिल पाया। ऐसे में फिलहाल केवल स्मृति ईरानी ही हैं, जिन्होंने राहुल गांधी जैसे कद्दावर नेता को मात देकर पार्टी में अपनी जगह स्थापित कर ली है।
उनके ऊपर भी विऱोधियों ने तमाम हमले बोले, सहेली का घर तोड़ने वाला से लेकर उनके रिश्तों की अफवाहें उड़ाकर, लेकिन फिर लोगों को समझ आ गया कि वो इतनी कमजोर मिट्टी की नहीं बनी है। उनकी वाकक्षमता और मुद्दों की समझ उन्हें कम से कम हीरोइन राजनीतिज्ञों की सूची में सबसे ऊपर रखती है। शायद बाकी उनके तौर तरीकों और अनुभव से कुछ सीख समझ पाएं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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