Fake News Controversy: क्या फेक न्यूज पर खड़ी है 'द वायर' की सेकुलर लिबरल मीनार?
Fake News controversy: वर्ष 2005-06 की बात है जब भारतीय पत्रकारिता को लगे पेड न्यूज नाम के दीमक से मुक्त कराने के लिए वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अभियान चला रहे थे। वह देश भर में यात्रा करके समाज को पेड न्यूज के प्रति जागरूक कर रहे थे।

उस समय प्रभाषजी ने भी विचार नहीं किया होगा कि आने वाले समय में पत्रकारिता में सच का झंडा लेकर जो संस्थान जनता से पत्रकारिता बचाने के लिए चंदा मांग रहा होगा, जनता के पैसों पर कथित पत्रकारिता को बचाने का आंदोलन चला रहा होगा, वही संस्थान एक के बाद एक झूठी खबरें भी अपने पाठकों को परोस रहा होगा।
हम बात कर रहे हैं द वायर की। अपने तमाम झूठ को सच की तरह फैलाने की द वायर की जिद को समझने के लिए दिल्ली में क्राइम ब्रांच की कार्रवाई को जानना होगा। जिसमें क्राइम ब्रांच ने द वायर के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन, संपादक एम के वेणु, सिद्धार्थ भाटिया, डिप्टी एडिटर जान्हवी सेन और बिजनेस हेड मिथुन किदाम्बी के घर पर छापेमारी की।
पत्रकारिता में लग रहे झूठी खबरों के घुन को समझने के लिए द वायर की कहानी एक केस स्टडी हो सकती है, जहां बीते कुछ सालों में आधा दर्जन से अधिक झूठी खबरें प्रकाशित और प्रसारित की गई हैं। इस बार वॉयर के संपादकों के घर पर छापेमारी क्यों हुई है, इस सवाल के जवाब में भी हाल के समय के सबसे बड़े झूठ की कहानी है।
अपनी एक झूठी खबर के माध्यम से द वायर ने यह साबित करने की कोशिश की कि मेटा के स्वामित्व वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम पर भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय को मेटा ने कुछ विशेषाधिकार दे रखे हैं। इस अधिकार का उपयोग करके मालवीय किसी की यूजर की सोशल मीडिया पोस्ट को हटा सकते हैं।
यह नितांत झूठी खबर थी, जिसे द वायर ने लगातार फैलाया। खबर झूठी होने की जानकारी होने के बावजूद वह लगातार फॉलोअप स्टोरी करने का दिखावा करता रहा। इस फॉलोअप में अपने एक झूठ के बचाव में उसे दूसरा झूठ गढ़ना पड़ता था।
प्रभाषजी ने भी कहां सोचा होगा कि आने वाले समय में अंतरजाल का यह जंजाल देश के अंदर झूठ का ऐसा संसार रचने वाला है कि आम पाठक सच और झूठ के बीच अंतर ही नहीं कर पाएगा। पत्रकारिता में झूठ फैलाने वाले क्रांति के अलम्बरदार बन जाएंगे और जो उनके झूठ से सहमत नहीं होगा, उसे भक्त और गोदी मीडिया कहकर उसका उपहास उड़ाया जायेगा।
मेटा पर गढ़े गए झूठ पर द वायर की अधिक फजीहत होने की बड़ी वजह उसका अपने झूठ को सच साबित करने के लिए एक के बाद एक झूठ बोला जाना भी है। 'मेटा' के प्रवक्ता एंडी स्टोन ने खबर आने के साथ ही इसका खंडन कर दिया था। स्टोन ने द वायर की रिपोर्ट को 'गलत और भ्रामक' बताया था।
इसी मामले पर 'मेटा' के सूचना सुरक्षा प्रमुख गॉय रोसेन का पक्ष भी सामने आया था। उन्होंने द वायर द्वारा मेटा के क्रॉस-चेक कार्यक्रम पर उठाए गए सवालों को गलत ठहराया था। जिस सोशल मीडिया पोस्ट को कथित तौर पर डिलीट कराए जाने को द वायर द्वारा मुद्दा बनाया गया, रोसेन के अनुसार उसका 'पोस्ट की रिपोर्ट' से कोई लेना-देना नहीं था, जैसा कि कथित तौर पर वायर के लेख में बताया गया था। रोसेन के अनुसार- द वायर के आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद थे और झूठ से भरे हुए थे।
इस बीच मोजिला के डैनियल नाजर और एलेक मफेट के बीच मेटा और वायर विवाद पर हुआ संवाद सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। जिसमें मफेट, ने 'वायर' द्वारा सार्वजनिक किये गए पत्र की खराब अंग्रेजी का मज़ाक उड़ाते हुए लिखा है, मुझे विश्वास है कि पत्र फेक है। जिसके जवाब में डैनियल नाजर इस तरह झूठे प्रचार द्वारा पाठकों को भ्रमित किए जाने पर दुःख व्यक्त करते हैं। वे लिखते हैं - "हमें मजबूत स्वतंत्र मीडिया की आवश्यकता है, जो सरकारों और बड़ी कंपनियों से टक्कर लेने का दमखम रखती हो, लेकिन द वायर के मामले में यह सही नहीं है।"
झूठी खबर के मुद्दे पर हर तरफ से हो रही फजीहत के बावजूद, द वायर ने एक वीडियो के जरिये यह समझाने की कोशिश की कि उसकी खबर सही है। जो वीडियो अपनी बात को सही साबित करने के लिए वेबसाइट ने जारी की थी, वह वीडियो भी उनके फेक न्यूज की तरफ फेक निकला। वायर अपने झूठ के साथ यहां भी नहीं ठहरा, उसने अपनी फेक न्यूज को सही साबित करने के लिए कुछ बड़े नामों का सहारा लिया। जिन नामों की सहायता से वायर अपनी बात को सही साबित करना चाहता था, उन्होंने भी वायर की रिपोर्ट पर अपने कथन को फेक बताया।
सब तरफ से पकड़े जाने के बाद द वायर वेबसाइट ने एक औपचारिक माफीनामा प्रकाशित किया लेकिन अपनी फेक स्टोरी के माध्यम से जिनकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर वेबसाइट ने दाग लगाने का प्रयास किया, माफीनामे में उनका जिक्र नहीं था।
सवाल तो उन मीडिया संस्थानों से भी है, जिन्होंने वायर की खबर के फॉलोअप में अपने यहां मेटा स्टोरी को प्रकाशित किया। जब वायर का माफीनामा आया, उसके बाद अपने पाठकों को गलत जानकारी देने के लिए उन संस्थानों ने माफी क्यों नहीं मांगी? फ्रीडम हाउस जैसी संस्थाएं, जो कथित तौर पर मीडिया के स्वतंत्रता के मुद्दे पर काम करती हैं, वो भी ऐसे मामलों में आलोचना करने की बजाय चुप क्यों रह जाती हैं?
यहां गौरतलब है कि यह किसी वायरल हुई फेक न्यूज से प्रभावित होकर भूलवश चलाई गई खबर से जुड़ा मामला नहीं है। मीडिया संस्थानों में खबरों की मारा मारी के बीच गलत खबर का चला जाना, बड़ी बात नहीं है। गलती होती है तो संस्थान भूल सुधार भी करते हैं। लेकिन पूर्वाग्रह से भरकर खबर करना और रंगे हाथों पकड़े जाने पर भी उसके बचाव में एक के बाद दूसरी फेक स्टोरी बनाते जाना और अंत में पकड़े जाने पर उसे साधारण भूल बताकर पल्ला झाड़ लेना, संस्थान के अंधविरोध को ही जगजाहिर करता है।
इसी साल द वायर द्वारा प्रसारित टेक फॉग की खबर को भी महीनों बाद वापस लिया गया। इस फेक न्यूज में दावा किया गया था कि सोशल मीडिया को भाजपा कैसे टेक फॉग के जरिए नियंत्रित कर रही है।
एक विचारधारा विशेष से प्रभावित देशी और वाशिंगटन पोस्ट-फ्रीडम हाउस जैसे विदेशी संस्थानों ने खबर को सच मानकर इसे रिपोर्ट भी किया था। अब जब यह खबर फेक साबित हो चुकी है तो क्या टेक फॉग के झूठे नैरेटिव से भारत की प्रतिष्ठा पर लगे दाग को धोया जा सकता है?
द वायर जैसे संस्थान मीडिया की स्वतंत्रता, विश्वसनीयता का दावा करके लोगों में अपनी बात रखते हैं। लेकिन उनके इन दावों की आड़ में कैसे फेक न्यूज की मीनार खड़ी की जाती है, उसके उदाहरण सामने आ रहे हैं।
द वायर जैसे संस्थान मीडिया के नाम पर खबरों का फर्जीवाड़ा करके न सिर्फ अपने अस्तित्व को खत्म कर रहे हैं बल्कि पूरे मीडिया जगत की विश्वसनीयता का संकट पैदा कर रहे हैं।
यह भी पढ़ें: Gujarat Election 2022: आयोग की जनता से अपील, कहा-'जो लगे फेक न्यूज, उसे आगे न बढ़ाएं'
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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