Exit Polls: जनमन को कितना जानते हैं एक्जिट पोल?
Exit Polls: मतदान के दौरान लोगों का मत जानना और मतगणना से पहले उसे सबको बता देने का नाम एक्जिट पोल है। इस एक्जिट पोल की शुरुआत टीवी न्यूज की देन है। 1967 में अमेरिका और जर्मनी में टीवी चैनलों के लिए इस पद्धति का प्रयोग करके यह जानने की कोशिश की गयी कि स्थानीय चुनावों में जनता किसे चुनने जा रही है। क्रमश: यह गति आगे बढ़ी और दुनियाभर में जैसे जैसे टीवी न्यूज का प्रसार हुआ एक्जिट पोल का भी विस्तार होता गया।
भारत में एक्जिट पोल का इतिहास काफी पुराना है। 1957 में पहली बार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपनियिन द्वारा जनमन जानने का प्रयास किया गया था। इसके बाद दूरदर्शन की शुरुआत और प्रसार के दौर में भी जनमन जानने का काम जारी रहा। लेकिन 24X7 न्यूज चैनलों के आगमन के साथ इसका भारतीय चुनावों में व्यापक विस्तार हो गया।

शुरुआत में यह इतना अधिक बेलगाम था कि मतदान के विभिन्न चरणों के दौरान ही सर्वेक्षण करके बताता रहता था कि किस चरण में किस पार्टी को लीड मिल रही है। जब चुनाव आयोग को यह महसूस हुआ कि इससे तो पूरी वोटिंग प्रभावित हो रही है तब मतदान के दौरान एक्जिट पोल के प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया। अब टीवी चैनल और सर्वे एजंसियां मिलकर मतदाता का मूड तो जान सकती हैं लेकिन उसे चैनल पर प्रसारित नहीं कर सकतीं। इसके लिए उन्हें आखिरी दिन के मतदान का इंतजार करना होता है ताकि उनके प्रसारण से मतदाता के मूड पर कोई प्रभाव न पड़े।
टीवी चैनलों के लिए यह एक फायदे का सौदा होता है क्योंकि इस दौरान दर्शकों की संख्या बढ़ती है और उनके एयरटाइम का रेट भी। जो सर्वेक्षण एजेंसियां होती हैं उनके लिए भी यह एक नियमित काम बन गया है। हर लोकसभा या विधानसभा चुनावों से पहले वो व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण करने का दावा करके अपने लिए व्यावसायिक अवसर पैदा करती हैं। फिर इन सर्वेक्षणों का विश्लेषण करनेवाले सेफोलॉजिस्ट भी होते हैं जो दावा करते हैं कि वही हैं जो जनता का मूड समझ सकने में कामयाब हैं। इसलिए उनकी बात पर भरोसा किया जाना चाहिए।
लेकिन यह सब तब तक काम का है, जब तक वास्तविक चुनाव परिणाम नहीं आ जाते। जैसे ही वास्तविक चुनाव परिणाम घोषित होते हैं, किसी को याद नहीं रहता कि किस एक्जिट पोल ने क्या दावा किया था। मतगणना से पहले जिस प्रक्रिया पर घण्टों घण्टों टीवी पर बहस होती है, राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आती हैं, चुनाव परिणाम सामने आते ही उस एक्जिट पोल की किसी को याद भी नहीं आती।
आज जब एक बार फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और तेलंगाना में हुए मतदान के बाद हुए एक्जिट पोल को लेकर माहौल गर्म है तब सवाल यह भी उठता है कि उनके सही गलत साबित होने का प्रतिशत क्या है? बहुत इतिहास में न भी जाएं तो 2014 का लोकसभा चुनाव इसका बेहतरीन उदाहरण कहा जा सकता है। उस समय जितने भी एक्जिट पोल थे वो सब एनडीए को बहुमत या बहुमत के आसपास पहुंचता तो बता रहे थे लेकिन किसी को ये उम्मीद नहीं थी कि अकेले बीजेपी 282 सीटें हासिल कर लेगी। उस समय सिर्फ एक नयी नवेली एजेंसी चाणक्या ने दावा किया था कि एनडीए को 340 सीटें मिल सकती हैं। जब चुनाव परिणाम आये और एनडीए को 336 सीटें मिलीं तो रातों रात टुडेज चाणक्या की चर्चा चारों ओर हो गयी।
इसलिए तब से लेकर अब तक जब भी कहीं चुनाव होते हैं तब टुडेज चाणक्या के अनुमानों पर जरूर नजर रखी जाती है। मसलन इस बार भी चाणक्या और एक्सिस ने ही सबसे अधिक उलटफेर भरा अनुमान लगाया है। अब तक के अनुमान के उलट टुडेज चाणक्या ने दावा किया है कि मध्य प्रदेश में बीजेपी तो तेलंगाना, छत्तीसगढ और राजस्थान में कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है। मध्य प्रदेश में भाजपा और राजस्थान में कांग्रेस की वापसी का अनुमान पूर्व में किये गये सभी राजनीतिक आकलनों को ध्वस्त करता है। तेलंगाना में कांग्रेस कोई चमत्कार कर सकती है इसका अनुमान तो पहले भी लगाया ही जा रहा है।
टीवीटुडे-एक्सिस एक्जिट पोल ने भी मध्य प्रदेश में भाजपा की वापसी का अनुमान लगाया है जबकि बाकी सर्वे एजेंसियां कमोबेश राजस्थान में भाजपा तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में कांग्रेस की सरकार बनने का अनुमान लगा रही हैं। अब तक का एक्जिट पोल का इतिहास देखें तो सटीक आकलन की बजाय तुक्का ही साबित हुए हैं। कई बार ये नतीजों के आसपास पहुंचते हुए दिखते हैं तो कई बार बुरी तरह ध्वस्त नजर आते हैं। वह टुडेज चाणक्या भी कई बार सटीक आकलन नहीं कर पाया है। 2014 में ही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में टुडेज चाणक्या ने भाजपा द्वारा 152 सीट जीतने का दावा किया था लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उसने इसके लिए माफी भी मांगी थी।
असल में सर्वे कंपनियां कई तरीकों से जनमन को भांपने की कोशिश करती है। इसका सबसे सटीक तरीका मतदान करके बाहर आ रहे लोगों का मन जानना है। इसके अलावा पिछले वोटिंग पैटर्न को भी आधार बनाया जाता है। दलों के गठबंधन की गणना की जाती है। जाति धर्म और वर्ग के आधार पर मतदान को जांचा परखा जाता है। इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण समझा जाता है सर्वेयर द्वारा वोटरों से की गयी बातचीत। उसकी बातचीत के आधार पर सर्वे एजेंसियों का सारा दारोमदार रहता है। इसलिए सर्वे सैम्पल की साइज को बहुत अधिक महत्व मिलता है। यानी जितनी ज्यादा संख्या में लोगों से बातचीत उतना अधिक सटीक आकलन होने का अनुमान लगाया जाता है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वोटिंग करनेवाला वोटर सर्वेयर को सही जानकारी देता है? आज जब पार्टियों के घोषित समर्थक या मतदाता मुखर होकर नजर आने लगे हैं तब भी भारत में सामान्य मतदाता ने किसे वोट किया है इसे गुप्त ही रखता है। खासकर ग्रामीण इलाकों में वो कभी किसी अनजान व्यक्ति को यह बताने से बचता है कि उसने किसे वोट किया है। बतायेगा भी तो सही बता देगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। ऐसा करने के पीछे उसका अपना समाजशास्त्र होता है। वह जिस भी समाज में रहता है वहां राजनीतिक गोलबंदी से बचना चाहता है इसलिए किसे वोट दिया है इसको आमतौर पर गुप्त ही रखता है। आखिरकार उसके घर जो भी वोट मांगने आता है, वह किसी को ना भी तो नहीं करता है, फिर यह कैसे बता देगा कि किसे वोट दिया और किसे नहीं दिया?
यही कारण है कि भारत में एक्जिट पोल अनुमान से आगे सटीकता तक नहीं जा पाते हैं। हां, टीवी स्टूडियो में बैठे एक्सपर्ट हों या सर्वे एजेंसियों के कर्मचारी। उनके लिए यह एक व्यावसायिक संभावनाओं से भरा एक काम जरूर होता है जिससे टीवी चैनल अपने लिए बिजनेस पैदा करते हैं। इससे किसी को कोई नुकसान भी नहीं है इसलिए रस्मी तौर पर हर चुनाव परिणाम से पहले एक्जिट पोल अपनी जगह बनाये हुए हैं। लेकिन यह कहना कि जनमन को समझने का सबसे सटीक फार्मूला एक्जिट पोल करनेवालों के पास है, उचित नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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