EWS Reservation: आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए क्रीमी लेयर की समीक्षा जरूरी
EWS Reservation: सरकारी मदद योजनाओं से ध्यान भटकाने, उसे कम करने और स्टेट के व्यापक रोल को सीमित करने का उत्तम उपाय आरक्षण है। देखा जाए तो जैसे-जैसे पूंजीवाद मजबूत होता है, इस तरह के उपक्रम सामने आते हैं क्योंकि पूंजीवाद के विरोध की एक आम मानसिकता समाज में होती है और उस विरोध को बाँटकर ही पूँजीवाद आगे बढ सकता है।

ये संयोग हो सकता है कि भारत में आर्थिक उदारीकरण और ओबीसी आरक्षण लगभग साथ-साथ शुरू हुए लेकिन उनके महीन तंतु कहाँ एक दूसरे से मिलते हैं, ये देखना हर किसी के वश की बात नहीं।
पश्चिम में जब पूँजीवाद को लगा कि सस्ते श्रम के लिए एक बड़ा वर्ग (स्त्रियां) घर की चारदीवारी में बंद है, तो कहते हैं कि आधुनिक नारीवादी आन्दोलनों को बल दिया गया और स्त्री मताधिकार की बात लाई गई। ऊपर से ये मानवाधिकार से संबंधित बातें थीं, लेकिन कहीं गहरे तल पर सस्ते श्रम को कारखानों में और दफ्तरों में खींचकर लाना था। (संदर्भ: उदयन वाजपेयी का साक्षात्कार, बनवारी के साथ, समास पत्रिका)
ऐसे ही, लिंकन के जमाने में हुआ। जब कॉरपोरेट को लगा कि खेती से मजदूर को निकालकर कारखानों में लाना है तो लिंकन उसके प्रतिनिधि बने और उन्होंने गुलाम प्रथा का अंत कर दिया। यह एक दृष्टिकोण है। कोई कह सकता है कि ये बातें स्त्री विरोधी या मजदूर विरोधी हैं जो लिबरल परिभाषा के हिसाब से रुढ़िवाद की श्रेणी में आती हैं, लेकिन इतिहास के प्रवाह की व्याख्या एकांगी नहीं होती।
भारत के आरक्षण इतिहास में अनुसूचित जाति-जनजाति आरक्षण ऐतिहासिक भेदभाव और संसाधनों पर अधिकार से दूरी के कारण था और उसमें नैतिक बल ज्यादा था। ओबीसी आरक्षण में नैतिक बल के साथ-साथ राजनीतिक बल भी था क्योंकि यहाँ समाजिक भेदभाव वैसा नहीं था जैसा दलितों के साथ-साथ था। उससे उलट EWS आरक्षण तो अधिकांशत: राजनीतिक है, खासकर अपने 8 लाख की सीमारेखा के साथ।
8 लाख सालाना आमदनी वालों को EWS आरक्षण मिलना तो हास्यास्पद है। ऐसे में लगभग हर कोई EWS का हकदार होने का जुगाड़ निकाल सकता है। इसे 3 लाख रुपये प्रतिवर्ष से ज्यादा नहीं होना चाहिए। 8 लाख रुपये तक की आमदनी ने इसके उद्देश्य को ही पंक्चर कर दिया है। लेकिन इस सीमा को कम करने के साथ दूसरी समस्या ये पैदा होगी कि ओबीसी के क्रीमी लेयर को भी 8 लाख से घटाना पड़ेगा। ओबीसी जातियां तो इस क्रीमी लेयर को बढाने की मांग कर रही हैं ऐसे में कौन इतनी राजनीतिक हैसियत रखता है कि ओबीसी क्रीमी लेयर को घटाकर 3 लाख कर दे। संभवत: इसीलिए ईडब्लूएस की सीमारेखा भी 8 लाख सालाना आय पर खींच दी गयी है, जो हास्यास्पद तो हो सकती है लेकिन मजबूरी भी दिखती है।
खैर, ट्विटर पर बहस में एक ओबीसी युवक ने दुख व्यक्त किया कि ईडब्ल्यूएस में कम नंबर में एडमिशन हो जाते हैं जबकि ओबीसी का कट ऑफ ज्यादा है। इस पर जवाब में किसी ने कहा कि फिर आप ईडब्ल्यूएस में अप्लाई करें और ओबीसी वाला सरेंडर कर दें। उसका तर्क था कि ओबीसी वाले ईडब्ल्यूएस में अप्लाई नहीं कर सकते।
ये सही है कि केंद्रीय लिस्ट के ओबीसी सामान्य वर्ग के आरक्षण में अप्लाई नहीं सकते, लेकिन राज्य सूची वाले ऐसा कर सकते हैं। हालाँकि इसमें सुधार किया जा सकता है कि अगर आप किसी खास कोटि में अप्लाई करना चाहते हैं तो अन्य श्रेणी का आवेदन आपको सरेंडर करना होगा।
ओबीसी आन्दोलनकारियों का असल दुख वैसा नहीं है। उनका अनुमान है कि कथित सवर्ण (हालाँकि उसे सामान्य श्रेणी कहना ज्यादा उचित है), देश की आबादी के 10 फीसदी से कम है और उन्हें 10 फीसदी आरक्षण देना उचित नहीं है। ओबीसी आन्दोलनकारियों का कहना है कि अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों की आबादी 60 फीसदी है और जातिगत जनगणना ही इसका निष्पादन कर सकती है।
जाति जनगणना की रिपोर्ट को सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया है और उसमें कई किंतु-परंतु हैं। फिलहाल जो जाति जनगणनना की रिपोर्ट है वो सन् 1931 वाली है जब देश का बँटवारा नहीं हुआ था और पिछले 90 साल में कई जातियों की संख्या तेजी से बढ़ी होगी तो कई की कम हो गई होगी।
फिलहाल दलित, जनजाति और अल्पसंख्यक गिने हुए समुदाय हैं। ओबीसी और सामान्य वर्ग की आबादी अनुमानित है। ओबीसी को लगता है कि वो 60 फीसदी है और सरकारी नौकरियों में इतने ही आरक्षण की असल हकदार है इसलिए जाति जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए। लेकिन इसमें एक पेंच है जिस वजह से संभवत: सरकार इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहती।
जाति जनगणना जारी होने से सबसे ज्यादा खतरे में वो जातियाँ होंगी जिनका प्रतिशत अत्यल्प है। भारत में हजारों जातियाँ हैं और कई की संख्या तो 0.00001 प्रतिशत में होंगी। कई दबंग जातियाँ हैं जो ओबीसी और सामान्य श्रेणी में हैं। उन्हें इससे कोई खतरा नहीं है। अभी तक जो चीजें आवरण में थीं, वो अचानक से उजागर होने से कई तरह के सामाजिक राजनीतिक खतरे हैं।
दूसरी बात ये कि जाति जनगणना दरअसल ओबीसी मांग है जिसका लक्ष्य आरक्षण की सीमा बढ़ाना है। लेकिन संख्या के अनुपात में आरक्षण उन दलित और जनजातीय लोगों के साथ अन्याय होगा जिन्हें संख्या के अनुपात में आरक्षण मिला है और बाकी सीटें ओपन हैं। अगर ओबीसी को भी संख्या के अनुपात में आरक्षण मिला तो एक प्रकार से वह इस बात को वैधता देगा कि दलित जातियों के साथ कोई खास अत्याचार नहीं हुआ था और दलित और ओबीसी समतुल्य जातियाँ हैं।
ऐसे में ये उचित नहीं है कि जातिगत संख्या के हिसाब से आरक्षण दिया जाए। हाँ, जाति जनगणना के बाद भी ऐसा हो सकता है कि दलित और जनजातियों को छोड़कर बाकी जातियों को उनकी संख्या के आधे अनुपात में आरक्षण दिया जाए। लकिन उससे पहले ये जरूरी है कि क्रीमीलेयर और EWS में आर्थिक सीमा को तार्किक किया जाए। भारत में 8 लाख प्रति वर्ष कमाने वाला गरीब नहीं होता। हम इसी बिंदु से आगे बढ़ सकते हैं।
यह भी पढ़ें: EWS Reservation: आर्थिक आधार पर आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, मोदी सरकार को मिली नैतिक जीत
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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