कब तक टिकेगा चुनावी रेवड़ियों का अर्थशास्त्र?
Rahul ki Guarantee: चुनाव के मौसम में वायदों और प्रलोभनों की भरमार है। कोई राजनीतिक दल कर्ज माफी और सबको लखपति बनाने की बात कर रहा है तो कोई मुफ्त लैपटॉप और महिलाओं को मुफ्त परिवहन के वायदे के साथ मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रहा है।
सत्ता पक्ष भी 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त अनाज जारी रखने और गरीबों को पक्का मकान, बिजली, गैस और स्वास्थ्य बीमा की दुहाई देकर वोट मांग रहा है।

मोदी सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना (एनपीएस) की समीक्षा करने और 11.8 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत पर मुफ्त खाद्यान्न सब्सिडी योजना को अगले पांच साल के लिए बढ़ाने का ऐलान भी इसी चुनाव को देख कर किया था। मुफ़्त की योजना और स्कीम लाने वाला कोई भी दल जनता को यह नहीं बताता कि ये वायदे कैसे पूरे होते हैं और इनका खर्च कौन उठाता है? जबकि सब जानते हैं कि पैसा अंततः करदाता की जेब से ही निकलता है।
काँग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार राहुल गांधी ने कहा है कि उनके सत्ता में आते ही देश से गरीबी भाग जायेगी, क्योंकि वह 30 करोड़ गरीबों को एक-एक लाख रुपये देने जा रहे हैं। राहुल गांधी का वादा शानदार है और लोग उन्हें 2024 के लिए अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए चुनने की मांग कर रहे हैं। जाहिर है राहुल के पास इस बात का जवाब नहीं होगा कि कांग्रेस के 55 वर्ष से भी अधिक समय तक शासन में रहने के बाद भी भारत क्यों एक अत्यंत गरीब देश बना रहा?
फिर भी इस बार इंडिया गठबंधन चुनाव जीत जाता है और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो सबको लखपति बनाने के लिए पैसे का इंतजाम कैसे करेंगे? क्या देश के मिडिल क्लास से इसे वसूल करेंगे या कर्ज लेंगे? क्या एक जेब से दूसरे की जेब में पैसा डालने से गरीबी खत्म हो जाएगी? गरीबी हटाने के लिए किसी भी देश के पास कोई शॉर्टकट नहीं है, केवल तेज विकास और भ्रष्टाचार खत्म कर के ही लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है।
राहुल गांधी ने कहा है कि वह हर गरीब परिवार की एक महिला को प्रति वर्ष एक लाख रुपये देंगे। उन्होंने कहा कि इस योजना से वह भारत से गरीबी को एक झटके में खत्म कर देंगे। दुनिया के तमाम बड़े अर्थशास्त्री यह कह चुके हैं कि मुफ्त पैसा देने से कभी भी वास्तविक समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि यह अर्थव्यवस्था के लिए ही खतरनाक प्रयोग है।
अगर सचमुच किसानों की कोई हालत सुधारना चाहता है तो बाजार तक फसलों के प्रवाह को सुनिश्चित करें ताकि किसानों को अच्छी कीमत मिल सके। गावों में स्कूल की गुणवत्ता में सुधार करे ताकि उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हो सके। गाँवों के पास अस्पताल बनाए ताकि इलाज के लिए शहर जाकर पैसा ना लुटाना पड़े। किसान भी मुफ्त का पैसा नहीं चाहते, वे वही चाहते हैं जिसके वे हकदार हैं। मौजूदा मोदी सरकार 6,000 रुपये प्रति माह देकर किसानों की समस्या का समाधान होना मान रही है तो इसमे भी वोट हासिल करने की ही सोच है। जबकि अधिकतर किसानों को उत्पादन की वास्तविक लागत वापस नहीं मिलती है।
राहुल गांधी के मुताबिक उनकी क्रांतिकारी योजना के लागू होने के बाद भारत में कोई गरीबी नहीं बचेगी। फिर उन्हें यह भी बताना चाहिए था कि क्या अर्थव्यवस्था उसके बाद बच सकेगी? आखिर उनकी क्रांतिकारी योजनाओं की व्यवहारिकता कितनी है? क्या देश के नौजवान सरकार पर निर्भर रह कर अपनी तरक्की सुनिश्चित कर सकते हैं? क्या किसान कर्ज और कर्जमाफी के चक्कर में फंसे रह कर किसानी को लाभप्रद बना सकते हैं? मजदूर सरकार से 6 हजार प्रति माह की दया पर जिंदा रह सकते हैं?
राहुल गांधी की योजना के अनुसार पैसा 12 हजार से कम कमाने वाले व्यक्ति को नहीं, बल्कि परिवार को दिया जाएगा। इसका मतलब यह है कि यदि परिवार का पुरुष सदस्य 6 हजार कमाता है और महिला सदस्य 6 हजार कमाती है, तो वह राहुल की स्कीम से बाहर है। राहुल गांधी के अनुसार 12 हजार रुपये महीने कमाने वाला एक संपन्न परिवार है। इसलिए वह इस स्कीम से बाहर रहेगा।
देश के 20 प्रतिशत सबसे गरीब परिवारों में आने वाले अधिकांश लोग औपचारिक आर्थिक गतिविधियों से नहीं जुड़े हुए हैं। इसलिए उनकी आय भी स्थिर नहीं होती। फिर इस बात का हिसाब कोई कैसे रख सकेगा कि किसी मजदूर को वास्तव में कितना भुगतान मिला। किसी बेरोजगार को 72,000 सालाना भुगतान करके भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा ऐसा दावा केवल चुनाव के समय ही किया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि केवल इस बार ही मुफ्त योजनाओं की बाढ़ आई है। हाल के वर्षों में इस तरह की नीतियों की काफी चर्चा हुई है और विशेषज्ञों द्वारा चिंता भी जताई गई हैं। क्योंकि इस तरह के प्रलोभन का असर केंद्र और राज्य दोनों के राजकोष पर हुआ है। लोग इस बात के प्रति भी जागरूक हैं कि इन योजनाओं की भरपाई अंततः करदाता को ही करनी पड़ती है।
हर तरह से करदाता पिसता है। एक तरफ उच्च करों के रूप में वह भुगतान करता है, और दूसरी तरफ महंगाई भी झेलता है। खुद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने चेताया है कि कई राज्य बिना वित्तीय व्यवहारिकता को ध्यान में रखे मुफ्त सुविधाओं की घोषणा कर रहे हैं, लेकिन जब धन आवंटन की बात आती है तो वे पीछे हट जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मुफ्तखोरी संस्कृति पर प्रहार करते हुए श्रीलंका के ऋण संकट का उदाहरण दे चुके हैं।
कर्नाटक बजट पर एसबीआई इकोरैप ने भी कहा है कि सरकार को पांच चुनाव पूर्व गारंटी को पूरा करने के लिए सालाना लगभग 60,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। खुद सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक दलों को करदाताओं के खर्च पर नकदी और अन्य मुफ्त चीजें बांटने पर चिंता जता चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक का भी कहना है कि गैर जरूरी सब्सिडी पर व्यय बढ़ने से पूंजीगत व्यय के लिए पूंजी बाधित हो सकती है।
कई राज्य अपनी राजस्व प्राप्तियों का लगभग 8-9 प्रतिशत सब्सिडी पर खर्च कर रहे हैं। बिजली, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी विभिन्न सेवाओं और वस्तुओं पर सब्सिडी प्रदान कर रहे हैं और दूसरी तरफ पूंजीगत व्यय कम करते जा रहे हैं। हाल ही में राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने न्यू पेंशन स्कीम को खत्म कर ओल्ड पेंशन स्कीम शुरू कर दी है। केवल इस कदम से उनका पेंशन पर राजकोषीय बोझ 4 से 5 गुना तक अधिक बढ़ गया है।
अब बात करते हैं मुफ़्त की योजनाओं की अर्थव्यवस्था की। प्रत्येक परिवार को 1 लाख रुपये, एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने से बजट पर क्या असर पड़ेगा? क्या हमारा बजट घाटा चिंताजनक तरीके से नहीं बढ़ेगा और उसके कारण बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए भरपूर पैसा उपलब्ध होगा? शिक्षा, स्वास्थ्य और रक्षा के लिए जरूरी बजट का आवंटन होगा? क्या इससे भारत की संभावित आर्थिक वृद्धि पर असर नहीं पड़ेगा? एक आकलन के अनुसार राहुल गांधी की स्कीम वास्तव में लागू करने के लिए लगभग 5 लाख करोड़ की अतिरिक्त लागत आएगी।
पूरी दुनिया में यह तथ्य मान्य है कि मुफ्त नकदी के उपहार से महंगाई बढ़ती है। जिन देशों ने कोविड के दौरान लोगों को नकद पैसे दिए, वहाँ उसी अनुपात में मुद्रास्फीति भी बढ़ी। मुफ्त सुविधाएं गरीबों के एक बड़े वर्ग को गरीब बने रहने के लिए मजबूर करेगी। भारत को अपने गरीब लोगों को सक्षम बनाने की जरूरत है ताकि वे पैसा कमा सकें। उत्पादक रोजगार की उचित व्यवस्था ही गरीबी की समस्या को दूर कर सकती है, मुफ्त की चुनावी घोषणाएं नहीं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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