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Drug Addiction: नशे की अंधेरी दुनिया में गुम होता नौजवान

Drug Addiction: नशे की लत मन ही नहीं जीवन को भी बिखेरकर रख देती है। परिवार उजाड़ने से लेकर समाज में आपराधिक घटनाओं के आंकड़े बढ़ाने तक नशे की आदत एक बड़े कारण के तौर पर देखी जाती है। बावजूद इसके पिछले कुछ वर्षों में युवा पीढ़ी में नशा करने का रुझान बढ़ा है। जीवन को दिशाहीन करने वाली आदत को आधुनिक जीवनशैली से जोड़कर देखा जाने लगा है। मानवीय सुध समझ छीन लेने वाली लत के जाल में न पड़ने वाले युवा जरा पिछड़े समझे जाते हैं। यही वजह है कि बहुत से युवा तो हमउम्र साथियों की देखादेखी और आधुनिकता के हाइवे पर समय के साथ रफ्तार से चलने के फेर में नशे के गर्त में गिर जाते हैं। जबकि नशे की अंधेरी दुनिया में एक बार जाने के बाद लौट आना बहुत मुश्किल होता है। कई बार तो यह आदत जीवन ही लील जाती है।

इस मोर्चे पर सबसे ज्यादा चिंतनीय यह हो चला है कि हमारे यहाँ लोग नशीली दवाओं के कुचक्र में भी फंस गए हैं। इनकी आसान उपलब्धता के चलते युवा पीढ़ी कई तरह के घातक नशों के जाल में फंस रही है। हालांकि ऐसी दवाओं को बेचने के सख्त नियम होते हैं पर मादक द्रव्यों की तुलना में बहुत सी दवाइयाँ आसानी से उपलब्ध हैं। दुखद है कि नशीली दवाओं के सेवन के मोर्चे पर सामने आया एक हालिया अध्ययन और भी भयावह स्थितियों को समाने रखता है।

Drug Addiction: The youth gets lost in the dark world of drugs

एम्स के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर और मनोचिकित्सा विभाग के डॉक्टरों द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया है कि भारत में मानसिक बीमारियों और नशीली दवाओं के इस्तेमाल के कारण आत्महत्या के मामले करीब 3 गुना बढ़ गए हैं। इतना ही नहीं अध्ययनकर्ताओं की टीम का अनुमान भविष्य में हालात के और तकलीफदेह होने की तरफ इशारा करता है। वर्ष 1995 से लेकर वर्ष 2021 तक आत्महत्या के कारणों पर तुलनात्मक अध्ययन से जुड़े और एशियन जर्नल ऑफ साइकेट्री में छपे इस अध्ययन में शामिल चिकित्सकों ने आशंका जताई है कि वर्ष 2026 तक आत्महत्या के करीब 17 प्रतिशत मामलों के पीछे कारण मानसिक बीमारियां और नशीली दवाएं ही होंगी। इस अध्ययन के अनुसार देश में एक लाख की आबादी में 12 आत्महत्याएं होती हैं।

दरअसल, नशीली दवाओं के दुरुपयोग से जुड़ी चिंता दुनिया के हर समाज को घेर रही है। यह एक वैश्विक समस्या बनी हुई है। दुनिया के कोने-कोने में इस विषय को लेकर अध्ययन किए जा रहे हैं। नशीली दवाओं की उपलब्धता के नियम कठोर करने के साथ ही जन-जागरूकता अभियान भी चलाये जा रहे हैं। नशीली दवाओं और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय द्वारा हर वर्ष बाकायदा एक विषय विशेष पर एक साथ लोगों को जागरूक किया जाता है।

इस मोर्चे पर आमजन की सजगता जरूरी भी है, क्योंकि नशीली दवाओं का सेवन कई मानसिक और शारीरिक बीमारियों की जड़ बनता है। इन्सान के विचार, व्यवहार और मस्तिष्क को दिशाहीन करता है। आपराधिक घटनाओं के कई बर्बर मामलों में सामने आया है कि अपराधी को ऐसे नशीले पदार्थों की लत रही है। यही वजह है कि भारत में इस अध्ययन से जुड़े चिकित्सकों ने ख़ुदकुशी की घटनाओं पर लगाम लगाने से जुड़ी नीतियों में मानसिक बीमारियां और नशीली दवाओं से होने वाले नुकसान को भी शामिल करने की सिफारिश की है।

सामाजिक व्यवस्था से रीत रहा सामंजस्य और सहयोग का भाव हो या पारिवारिक परिवेश में खत्म होता संवाद। हमारे यहाँ हर उम्र के लोगों में बढ़ती आत्मह्त्या की प्रवृत्ति के आंकड़े बेहद डरावने हैं। महानगरों से लेकर गांवों-कस्बों तक लोग जीवन खत्म करने का मार्ग चुन ले रहे हैं। कभी परिस्थितियों से उपजा आक्रोश तो कभी अपराधबोध। कभी सपनों का पूरा न हो पाना तो पारिवारिक बिखराव। विडम्बना ही है कि हर परिस्थिति में जीवन को गले लगाने वाली जमीनी जीवनशैली वाले हमारे देश में छोटे-छोटे बच्चे ऐसा कदम उठाने से नहीं चूक रहे। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय व्यापक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 60 मिलियन से अधिक नशीली दवाओं के उपयोगकर्ता हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में उपयोगकर्ता 10-17 वर्ष के आयु वर्ग के हैं। भावी पीढ़ी का यह रुझान देखकर समझना कठिन नहीं कि भविष्य में समग्र समाज कि दशा और दिशा क्या होगी।

ज्ञात हो कि दुनियाभर में आत्महत्या के कारण होने वाली 26.6 प्रतिशत मौतें भारत में होती हैं। ऐसे में नशीली दवाओं के उपयोग के कारण अगर इस आत्महंता प्रवृत्ति के रुझान को बढ़ावा मिल रहा है तो यह बहुत चिंतनीय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2021 में नशीली दवाओं और शराब की लत से 10,560 आत्महत्याएं दर्ज की गईं थीं जबकि 2011 में यह आंकड़ा 3,658 था।

एनसीआरबी के आंकड़ों से यह बात भी सामने आई है कि नशीली दवाओं के इस्तेमाल के कारण महिलाओं के मुकाबले पुरुष अधिक आत्महत्या कर रहे हैं। समझना मुश्किल नहीं कि किसी भी तरह के नशे तक पुरुषों की पहुँच महिलाओं से ज्यादा है। हालांकि बीते कुछ बरसों में युवतियों की जीवनशैली में भी बड़ा बदलाव आया है, फिर भी पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में नशे की प्रवृत्ति आज भी कम है। लेकिन बड़ी आबादी का नशे के इस जाल में फंसना आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत मोर्चे पर बड़ी हानि है। ऐसे में इस मोर्चे पर समाज में समग्र जागरूकता के साथ साथ सरकारी स्तर पर कारगर उपाय किये जाने की जरूरत है, ताकि आनेवाली पीढियां नशें के कारण बर्बाद न हों।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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