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Dowry Cases: समाज से खत्म क्यों नहीं हो रहा है दहेज रूपी दानव?

झाँसी जिले के बैरंगा थाना प्रभारी शशांक मिश्रा ने बीते दिनों सर्विस रिवॉल्वर से अपनी गर्भवती पत्नी पर गोली चला दी। पुलिस ने पहले इसे "गलती से चली गोली" बताया पर फिर परिजनों के हंगामे के बाद इस बयान को बदला। पीड़िता हॉस्पिटल में भर्ती है और जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित बताये जा रहे हैं। दो गोली हाथ में लगने और तीसरी गोली पेट को छूकर निकल जाने के कारण जान तो बच गई परंतु इस पूरे वाकये की पड़ताल करे तो समझ आएगा कि व्यक्तिगत ही नहीं अपितु सामाजिक तौर पर क्या बचा, कितना बचा और किसका बचा!

Dowry Cases

पीड़िता और उसके परिवार ने दारोगा पर दहेज़ मांगने का आरोप लगाया है। उनके अनुसार मांगी हुई रकम तो दहेज़ में दे दी गई थी परंतु सोने की अंगूठियां ना मिलने के कारण प्रताड़ना दी जा रही थी। अपुष्ट वायरल ऑडियो के अनुसार दारोगा शशांक मिश्रा 50 सोने की अंगूठी की मांग करते सुने जा सकते हैं। एक फोटो में वो विवाह की किसी रस्म में थाल भर कैश लिए नज़र भी आ रहे हैं।

पीड़िता ने बताया शशांक उस दिन अपने माँ और भाई से मिलकर घर बहुत देर से आए थे और आने पर व्यवहार बहुत रूखा और उखड़ा था। माहौल बदलने के उद्देश्य से उसने पति को नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा था कि पत्नी और होने वाले बच्चे की चिंता नहीं है क्या? यह कहते हुए पीठ पर थपकी दे दी थी। बस शशांक इस बात पर बिफर उठा कि पत्नी ने उसे मारा और दनादन गोलियां बरसा दीं। शू रैक के पीछे छिपकर पत्नी ने अपनी जान बचाई और पड़ोसियों की मदद से अस्पताल जा सकी। दहेज के लालच, क्षणिक आवेग और क्षोभ में घटित यह घटना ना तो नयी है ना अंतिम है।

बीते वर्ष केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा में बताया था कि देश में 2017 से 2021 के बीच प्रतिदिन करीब 20 दहेज हत्याएं दर्ज की गई हैं जिनमें उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन सबसे अधिक छह मौतें दर्ज हुई हैं। 2017 में 7466 दहेज हत्याएं, 2018 में 7167, 2019 में 7141, 2020 में 6966 और 2021 में 6753 दहेज हत्याएं हुईं है।

ये आंकड़े समाज की विकृति को बताते हैं। दहेज़ निषेध कानून को आए 6 दशक से ज्यादा हो गए, परन्तु दहेज को लेकर समाज में कोई बहुत सकारात्मक सुधार तो आता नज़र नहीं आ रहा है। ग्रामीण हो या शहरी दहेज का कोढ़ हर जगह फैला हुआ है। हाँ यह स्थिति रहस्यमयी जरूर है कि दक्षिण भारत में दहेज़ प्रताड़ना की अपेक्षाकृत कम घटनायें दिखती हैं।

दहेज़ की स्थिति रक्त बीज की तरह है। यह अकेले नहीं है। इसके साथ घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, हत्या, भ्रूण हत्या जैसे अपराध भी स्वतः जुड़े हुए हैं। अब समाज में फैली इस कुरीति को लेकर और क्या कहा जाए जब 2017 में महाराष्ट्र के सिलेबस में दहेज़ चैप्टर में दहेज़ कारणों में से एक कारण यह दिया गया था -"कुरूप और अपाहिज लड़कियों की शादी करने में दिक़्क़त होती है। वर पक्ष के लोग ऐसी लड़कियों से शादी करने के लिए अधिक दहेज मांगते हैं।" हालांकि लोगों के विरोध के बाद इस कारण को हटवाने का भरोसा महाराष्ट्र सरकार ने जरूर दिया था। परन्तु इस कारण द्वारा इस कुप्रथा को भी 'जस्टीफ़ाइड' करने का कारण ढूंढ ही लिया गया था।

कोई भी सामाजिक विकृति एक पक्ष के साथ नहीं होती है। दहेज़ लिया तभी जाता है जब इसे दिया जाए। कानून के अनुसार 'दहेज़ लेना और देना' दोनों अपराध है। परन्तु हम अक्सर आपराधिक मामले सिर्फ वर पक्ष पर ही दर्ज़ देखते हैं। दहेज संबंधी केस में वधू पक्ष की एक और गैर-जिम्मेदाराना हरकत यह होती है कि ससुराल जाने के बाद अगर लड़की को दहेज़ के लिए सताया जाता है और वह अपने मायके में इसकी शिकायत करती भी है तो उसे 'एडजस्ट' करने के लिए ही कहा जाता है। अब यह 'तथाकथित एडजस्टमेंट' की परिणीति ऐसे ही होती है जैसा झांसी वाले मामले में हुआ। हत्या, हत्या का प्रयास, सालों तक चलने वाले दहेज़ और तलाक के मामले, व्यक्ति ही नहीं परिवार और पीढ़ियां समाप्त कर देता है।

एक बहुत बड़ी विडंबना दहेज़ कानून के दुरुपयोग की भी है जिसकी परिधि में बेगुनाह भी आ रहे हैं और परिवार के परिवार नष्ट हो रहे हैं। 2017 में सिर्फ हरियाणा के रोहतक जिले में दहेज के लिए प्रताड़ित करने के 34 प्रतिशत केस झूठे मिले थे। वर्ष 2017 में जिले में 275 केस दहेज प्रताड़ना के दर्ज हुए थे। पुलिस ने जांच के दौरान 2017 में 80 केस रद्द कर दिए।

आरोपों से बरी हो जाने के बाद भी व्यक्ति और परिवार की मानसिक और सामाजिक स्थिति क्या होती होगी? अभी 26 अगस्त 2023 को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने हाल में स्वप्नदास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में कठोर टिप्पणी करते हुए कहा, 'महिलाओं ने भारतीय दंड संहिता यानी आइपीसी की धारा 498 ए का दुरुपयोग करके एक तरह से कानूनी आतंकवाद फैला दिया है।'

देश के विभिन्न हाईकोर्ट ने दहेज के झूठे मामलों पर कठोर टिप्पणियां की हैं। फरवरी 2022 में दहेज उत्पीड़न मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया था। उसने कहा था कि पति के रिलेटिव पर स्पष्ट आरोप के बिना मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का मज़ाक बनाने जैसा है। कोर्ट ने विस्तार देते हुए कहा कि हाल के दिनों में विवाह में विवाद की स्थिति बढ़ी है। ऐसे में सेटेलमेंट जल्दी कराने और अपना पक्ष मजबूत करने के लिए वधू पक्ष वर पक्ष के रिश्तेदारों पर भी दहेज़ प्रताड़ना का केस कर देते हैं, जो कि चिंतनीय है।

निश्चय ही दहेज जैसी सामाजिक कुरीति को खत्म करने के लिए भारत में कठोर कानून की आवश्यकता तो है लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए जो कुछ सेफगार्ड होने चाहिए, उसका अभाव है। हालांकि अब विभिन्न हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के बाद दहेज उत्पीड़न के संदिग्ध मामलों में केस को मिडिएशन सेन्टर भेज दिया जाता है लेकिन इतने भर से परिवारों की बर्बादी नहीं रुक जाती। अगर दहेज प्रताड़ना संगीन अपराध है तो इसको रोकने के लिए बने कानून का दुरुपयोग भी इसकी महत्ता को कम करता है।

कानून के साथ साथ हमें सामाजिक रूप से भी दहेज जैसे दानव से लड़ने की जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि यह एक कुरीति है जो कुछ सौ साल पहले ही उत्तर भारत के समाज में फैली है। बेटे के विवाह में दहेज लेना ये हमारी वैदिक विवाह परंपरा का हिस्सा नहीं है। इस लिहाज से इसे कानूनी रूप से अपराध बनाने से पहले हमें सामाजिक रूप से अनैतिक और आपराधिक कृत्य बनाना होगा।

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