Dhirendra Shashtri: धर्म एवं संस्कार के प्रचार में टपोरियों की भाषा क्यों?
Dhirendra Shashtri: एक बार पुनः सिंदूर की चर्चा सब अपने-अपने तरीके से कर रहे हैं। इस बार कारण है विवादास्पद कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री उर्फ़ बागेश्वर बाबा द्वारा ब्याहता स्त्रियों के मांग में सिंदूर लगाने की विवेचना अपमानजनक तरीके से किया जाना है। शास्त्री जी के कथनानुसार मांग में सिंदूर और गले में मंगल सूत्र दूर से ही नज़र आ जाते हैं और हम समझ जाते हैं कि 'इस प्लॉट की रजिस्ट्री हो गयी है'!
बागेश्वर बाबा के नाम से चर्चित धीरेंद्र शास्त्री द्वारा ऐसे 'टपोरी भाषा' का प्रयोग जो प्रायः कुसंस्कारी लड़के कॉलेज में, चाय की टपरी पर या कार्यस्थल पर कहते-सुनते नज़र आते हैं, गहरी चिंता में डालता है। यह सच है कि प्लॉट का भूमि पूजन, प्लॉट की रजिस्ट्री जैसी भाषा का प्रयोग पुरुष वर्ग द्वारा आम है। परंतु साथ में यह भी सच है ऐसी भाषा अभद्रता की श्रेणी में आती है जिसे स्त्री समाज और सिंदूर के प्रति उसकी श्रद्धा का अपमान ही समझा जाएगा।

किसी भी सभ्य समाज को ऐसी भाषा, ऐसे विचार को स्वीकार नहीं करना चाहिए। समर्थक बता रहे हैं कि बाबा ने ऐसी भाषा का प्रयोग जन मानस को समझाने के उद्देश्य से कहा है, परंतु बात यह समझ नहीं आती कि सौभाग्य के चिन्हों को धारण करने की आवश्यकता और महत्ता समझाना ही था तो यह उदाहरण कितना कर्णप्रिय और प्रभावी है? अब बात समझाने की ही हो तो विशेष रूप से बिहार, यूपी में तो कई बातें गालियों की शुरुआत करके ही समझायी जाती है। तो क्या जन चेतना तक पहुँचने के लिए कल हम पुनः किसी विषय पर कथावाचकों द्वारा ऐसी किसी तथाकथित "जनभाषा" के पुनः उपयोग की अपेक्षा रखें?
समाज में कथावाचकों का प्रभाव व्यापक है। विशेष रूप से श्रीराम कथा वाचक तो अत्यन्त पूजनीय और अनुकरणीय हैं। ऐसे स्थान पर होकर सिंदूर व मंगल सूत्र को लेकर की गयी ऐसी टिप्पणी एक कथावाचक और छिछोरे की भाषा एवं विचार की विद्वता में अंतर कैसे स्थापित करेगी?
धीरेंद्र शास्त्री अपने को हनुमान भक्त बताते हैं। हनुमान और सिंदूर के मध्य के सम्बन्ध से भी वह भली भांति परिचित होंगे।
सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये।
भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम।।
वह स्वयम् सिंदूर की पवित्रता और महता को समझते हुए हनुमान जी पर इस मन्त्र का जाप करते हुए सिंदूर अर्पण करते होंगे। फिर एक ऐसे भक्त से भी सिंदूर की व्याख्या "रजिस्ट्री" या भूमि पूजन के रूप में कैसे हो गयी?
और विवेचना भी सर्व सनातन समाज के लिए उपयुक्त नहीं है। दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में सनातनी हिंदू महिलायें सिंदूर नहीं लगाती हैं। जैन, सिक्ख और बौद्ध धर्म में भी यह परंपरा और संस्कृति का अंग नहीं है। यहाँ तक कि पूर्वी मध्य और उत्तर भारत में विवाह पद्धति में मंगल सूत्र पहनाने की कोई विधि नहीं है। यह अलग बात है अब इस परंपरा का समावेश और स्वीकृति हिंदू समाज में हो रही है। यह भी उचित नहीं कि कतिपय कारणों से अगर विवाहिता सिंदूर और मंगल सूत्र धारण नहीं कर रही तो यह रोष, प्रतिकार या नकारात्मक रूप से विमर्श का विषय बने। वैधव्य को धारण की हुई या तलाक शुदा स्त्रियों का निर्णय फिर कैसे होगा? क्या ये कहा जायेगा कि रजिस्ट्री 'री-ओपन' है या "शुद्धिकरण कर दुबारा भूमि पूजन" की संभावना है?
अजीब लगा ना सुनकर? परंतु जिस भाषा का प्रयोग धीरेंद्र शास्त्री द्वारा किया गया है यह उसी भाषा का विस्तारिकरण है। जब समाज में कोई व्यक्ति अपने आप को धर्म रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है, इसकी शुचिता और सम्मान को बचाने का प्रण लेता है, जन मानस में संस्कृति और परम्पराओं को जागृत करने के लिए बातें करता है, तब उसका दायित्व कई गुना बढ़ जाता है। कर्म से पूर्व भाषा परिलक्षित होती है। हमारे शास्त्रों में भी "सत्यमं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्" को मान्यता दी गयी है। फिर ऐसे में संपूर्ण स्त्री समाज पर जाने-अनजाने या मज़ाक में भी ऐसी हल्की टिप्पणी सर्वथा अस्वीकार्य है। धर्म ध्वजा को लेकर चलने वाले अगर टपोरियों की भाषा के स्तर पर उतर जाएंगे तो समाज तो दिशा हीन हो ही जायेगा।
इन सबसे इतर स्त्री सिंदूर या मंगलसूत्र धारण करती है या नहीं इस निर्णय का अधिकार उसका व्यक्तिगत है। सुहाग के प्रतीक चिन्हों के धारण करने अथवा ना करने के आधार पर वैवहिक संस्था में उसके आस्था और समर्पण को नहीं आंका जा सकता है। अब वैसे तो पुरुष के लिए कोई वैवहिक प्रतीक नहीं हैं तो फिर लोग विशेष रूप से स्त्रियाँ कैसे समझेंगी कि पुरुष विवाहित है या अविवाहित? समझ में तो यही नहीं आता कि कोई पुरुष या महिला विवाहित है या अविवाहित यह जानने की इच्छा बलवती ही क्यों हो? अगर आकर्षण या प्रेम के अनुभव को रोकना ध्येय है तो पहली नज़र का प्यार सिर्फ फिल्मों में ही होता है। किसी के विवाहित होने ना होने की बात का पता करना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। पर सुहाग के पवित्र प्रतीक चिन्हों को "ठप्पे" की तरह परिकल्पित करना निंदनीय है। अगर बागेश्वर बाबा आगे के प्रवचनों में स्त्री वर्ग को सुहाग चिन्ह धारण करने की प्रेरणा ही देना चाहते हैं तो वह प्रभावी और मर्यादित भाषा का उपयोग करेंगे।
सच ही तो है स्त्री, श्रृंगार और सिंदूर इन तीनों को पृथक नहीं कर सकते। सदियों से सिंदूर स्त्रियों के सौभाग्य मात्र की नहीं बल्कि उनके समर्पण, अनुराग, विश्वास और विवाह परंपरा के प्रति गहरी आस्था और विपरीत परिस्थितियों में उनके साहस और धैर्य की प्रतीक रहा है। ब्याहताएँ सिंदूर को मांग में धारण करें, मस्तक पर कुमकुम की तरह लगाये या देवी, देवता को अर्पित करें हर रूप में यह स्त्रियों के विश्वास की गाथा को ही कहता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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