Delhi Riots 2020: जांच में गड़बड़ कहां हुई जो आरोपी निर्दोष साबित हो रहे हैं?

दिल्ली दंगों की तीन साल की जांच पड़ताल में आरोपियों को या तो दोषमुक्त किया जा रहा है या फिर उन्हें जमानत दी जा रही है। सवाल है कि गड़बड़ कहां हुई जो आरोपी निर्दोष साबित हो रहे हैं?

Delhi Riots 2020 why accused get bail or acquitted either investigation of three years

Delhi Riots 2020: 25 फरवरी 2020 को जब पूर्वी दिल्ली में दंगा जब अपने चरम पर था तब भागीरथी विहार में दंगाइयों की एक भीड़ ने एक मेडिकल स्टोर को आग लगा दी। अब तीन साल बाद 25 फरवरी 2023 को उस आगजनी में शामिल सभी नौ दंगाइयों को अदालत ने यह कहते हुए बरी कर दिया कि इस मामले में सिर्फ एक गवाह है, जो पुलिस कांस्टेबल है। एक गवाह के आधार पर नौ लोगों को दोषी मानने से अदालत ने इंकार कर दिया। जो सभी नौ आरोपी मुक्त हुए वो दिल्ली दंगों में शामिल समुदाय विशेष के लोग थे।

22 से 25 फरवरी 2020 को पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की जांच और अदालती कार्रवाई की ये एक बानगी है। तीन साल बाद जब पलटकर उस कठिन समय को देखते हैं तो पता चलता है कि दंगाइयों ने जो घाव उस समय दिल्ली के लोगों को दिया था, वो आज भी रिस रहा है। अदलतों में गवाहों और सबूतों को अपर्याप्त मानते हुए कई दंगाई रिहा हो गये, तो कुछ जमानत पर बाहर आ गये। दंगाइयों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, एसआईटी की लंबी चौड़ी जांच पड़ताल या फिर अलग अलग दर्ज 690 एफआईआर पुलिसिया कार्रवाई बनकर रह गयी।

जो लोग दिल्ली दंगों के शिकार हुए जिसमें अधिकांश हिन्दू परिवार थे वो आज भी दंगों की भयावहता को याद करके सिहर उठते हैं। दिल्ली के खजूरी पेट्रोल पंप पर हुई आगजनी के निशान आज भी मौजूद हैं जो याद दिलाते हैं कि शायद इस कालिख की तरह दिल्ली दंगों के घाव मिटाने की कोशिश भी बहुत मन से नहीं की गयी। लापरवाही कहां हुई, चूक किसने की ये अलग बात है लेकिन परिणाम यही है कि दंगा पीड़ित न्याय से आज भी बहुत दूर हैं।

दंगों का मुख्य आरोपी ताहिर हुसैन को बनाया गया था। उस समय वह आम आदमी पार्टी का पार्षद था। उसी के घर की छत से दंगों की शुरुआत हुई। उसने और उसके साथियों ने मिलकर गुलेल से आसपास के लोगों पर गोले बरसाये। उसके खिलाफ हत्या, हत्या का षड्यंत्र, दंगा भड़काने सहित मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी दर्ज किया गया था। उस पर मनी लॉड्रिंग मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट में आरोप तय किये जा चुके हैं। अदालत ने ताहिर हुसैन पर यह आरोप तय किया है कि उसने अवैध तरीके से मिले धन का इस्तेमाल दिल्ली के दंगों को भड़काने में किया है। मनी लॉड्रिंग के अलावा कोर्ट ताहिर हुसैन पर आईपीसी की धारा 302, 307, 147, 148 और 153ए, 120 बी के अन्तर्गत आरोप तय कर चुकी है। 2017 का एमसीडी चुनाव ताहिर ने आम आदमी पार्टी के टिकट पर जीता था हालांकि दंगों के बाद उसे आम आदमी पार्टी ने निकाल दिया।

अब ताहिर हुसैन कोर्ट में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद को अपना वकील बनाकर केस लड़ रहा है। हुसैन की ओर से कोर्ट में खुर्शीद पेश हुए और उन्होंने तर्क दिया कि जिस व्यक्ति पर गोली चलाने का आरोप लगाया गया था, उसके सहित अन्य सभी सह-आरोपी उसी मामले में जमानत पर हैं और ताहिर हुसैन को किसी भी आग्नेयास्त्र का उपयोग करते हुए किसी ने नहीं देखा। लेकिन सच यह भी है कि उसकी छत पर जो देखा गया, उससे तो कोई इंकार नहीं कर सकता।

ताहिर को हिन्दू-मुस्लिम सबने वोट देकर पार्षद बनाया था लेकिन दंगों के दौरान वह सिर्फ मुसलमानों के प्रतिनिधि के नाते काम कर रहा था। ऐसा उसके घर के आस-पास के लोगों का ही कहना है। भारतीय कानून व्यवस्था की कमियों का लाभ उठाकर ताहिर भी दिल्ली दंगों के मामले में बरी हो जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी।

तीन साल बीत जाने के बाद दंगों से जुड़े 10 फीसदी मामलों में भी फैसला नहीं आ पाया है। अब तो बड़ी संख्या में पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद भी खो चुके हैं। तीन साल पहले हुए दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी। 700 से अधिक लोग घायल हुए। दंगों से जुड़े 675 मामले कड़कड़डूमा कोर्ट में दर्ज कराए गए थे। 20 फरवरी 2020 से लेकर 20 फरवरी 2023 तक सिर्फ 47 मामलों में फैसला आ पाया है। इनमें भी 36 आरोपी बरी हो चुके हैं। न्याय के लिहाज से इसे संतोषप्रद रिकॉर्ड नहीं माना जा सकता।

उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुआ दंगा हिन्दू मुस्लिम के बीच के सामुदायिक भरोसे पर बड़ा घाव देकर गया। यह बात और अधिक ठेस पहुंचाने वाली तब हो गई जब दंगों के बाद इस बात के प्रमाण मिलने लगे कि स्थानीय मुस्लिम आबादी में अधिकांश परिवारों को इस दंगे की आशंका पहले से थी। उन्होंने इसके लिए सावधानी बरतनी शुरू कर दी। मुस्लिम मोहल्लों में दंगों से बचाव के पर्चे मिले लेकिन इन बातों की भनक तक उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले हिन्दू परिवारों को नहीं होने दी।

इन पर्चों में मुस्लिम परिवारों को बताया गया था कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान उन्हें कैसे बर्ताव करना है। अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें क्या करना है और सामने वाले पर वार कैसे करना है। एक चश्मदीद के अनुसार दंगे से एक दो रात पहले से भजनपुरा पेट्रोल पंप पर पूरी पूरी रात पेट्रोल लेने वालों की कतार लगी रही। जो कोई सामान्य घटना नहीं थी। दंगों वाली सुबह मुस्लिम परिवार के लोग अपने बच्चों को दंगा शुरू होने से पहले ही घर ले आए थे। जैसे उन्हें किसी ने इस बात की जानकारी दे दी हो कि कुछ बड़ी घटना इस क्षेत्र में होने वाली है। सावधान हो जाओ। यह बातें फैक्ट फाइंडिंग की एक रिपोर्ट से सामने आई।

बहरहाल अब तीन साल बाद दिल्ली दंगों के फिजिकल निशान तो शायद खोजने पर न मिलें लेकिन इस पूरे यमुनापार के इलाके में दंगाइयों द्वारा भाईचारे पर जिस तरह से वार किया गया, उसके घाव आज भी रिस रहे हैं। कुछ सांप्रदायिक और स्वार्थी लोगों ने दो समुदायों के बीच जो अविश्वास पैदा किया वह इतनी जल्दी दूर नहीं होगा।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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