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माउंटबेटन: भारत विभाजन और उसकी दर्दनाक विभीषिका का खलनायक

13 अगस्त 1947 की सुबह लुईस माउंटबेटन अपनी पत्नी एडविना के साथ कराची पहुंचे। अविभाजित भारत में वायसराय के नाते यह उनकी अंतिम अधिकारिक यात्रा थी। मोहम्मद अली जिन्ना और उनकी बेगम ने माउंटबेटन दंपति का बहुत ही गर्म-जोशी से स्वागत किया। शहर के गवर्नमेंट हाउस में उनके रुकने का विशेष प्रबंध किया गया, जिसे किसी 'हॉलीवुड' फिल्म के सेट की भांति सजाया गया था।

Cruel role of Mountbatten in Indias partition

रात में 'सॉफ्ट ड्रिंक्स' और मधुर संगीत के बीच सभी ने मिलकर स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाया। अगले दिन माउंटबेटन ने पाकिस्तान की लेजिस्लेटिव असेम्बली के उद्घाटन की रस्म-अदायगी की और दोपहर में दिल्ली वापस जाने के लिए विमान में सवार हो गए।

जब यह विमान पंजाब के सीमावर्ती इलाकों से गुजरा तो वहां का नजारा एलन कैंपबेल-जॉनसन ने अपनी पुस्तक 'मिशन विद माउंटबेटन' में इस प्रकार लिखा है, "जब हम पंजाब की सीमा के ऊपर से उड़ रहे थे, तो हमने कई जगह आग लगी हुई देखी। यह मनहूस रोशनियाँ मीलों तक फैली हुई थी।" एलन कैंपबेल-जॉनसन उस विमान में माउंटबेटन के साथ ही मौजूद थे।

इसी दिन सुबह 9 बजकर 30 मिनट पर माउंटबेटन को संयुक्त पंजाब के अंतिम गवर्नर, ई. जेंकिस का एक टेलीग्राम मिला, जिसमें उन्होंने लिखा, "शांति व्यवस्था स्थापित करने और रेलवे को सुरक्षित रखने के लिए हमारे पास पर्याप्त फौज अथवा पुलिस नहीं है। हमें वहां सेना को 'वॉर डिपार्टमेंट' की भांति तैनात करना होगा जिसके पास रेलवे की सुरक्षा भी रहेगी। मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड्स लाहौर शहर में सक्रिय है और गैर-मुसलमानों के खिलाफ अत्यंत हिंसक हो गए है।"
13 अगस्त को ही ई. जेंकिस ने माउंटबेटन को एक लंबा पत्र भी लिखकर स्पष्ट बताया था, "हमलें और हत्याएं इतनी हो रही है कि अब सभी घटनाओं पर नजर रखना मुश्किल हो गया है।" कुछ ही घंटों के बाद वायसराय का विमान दिल्ली हवाई अड्डे पर उतर गया और यहाँ भी 15 अगस्त को होने वाले कार्यक्रमों में सभी व्यस्त हो गए।

इसी दिन फील्ड मार्शल क्लाउड औचिनलेक ने माउंटबेटन को एक रिपोर्ट पेश कर बताया कि कैसे पूरा पंजाब सांप्रदायिक हिंसा में झुलस गया है। इसी रिपोर्ट में उन्होंने लाहौर शहर का जिक्र इस प्रकार किया है, "एक अनुमान के मुताबिक लाहौर शहर के दस प्रतिशत घर आग से जल चुके है। यह शहर का लगभग पंद्रह प्रतिशत इलाका है।"
उधर दिल्ली से लेकर कराची तक आधिकारिक कार्यक्रमों अथवा उत्सवों में एक-दो सप्ताह और बीत गए। पंजाब से पत्र, टेलीग्राम, टेलीफोन लगातार आते रहे लेकिन मगर किसी ने वहां राहत दिलाने का संतुलित प्रयास नहीं किया। अब जैसे-जैसे समय गुजरने लगा तो समाचार-पत्रों में पंजाब की हिंसक घटनाओं का जिक्र बड़े पैमाने पर प्रकाशित होना शुरू हो गया।

पंजाब के बेकाबू सांप्रदायिक हालातों को सँभालने की जिम्मेदारी एक ब्रिटिश सैन्य-अधिकारी थॉमस विनफोर्ड रीस के हाथों में थी। भारतीय समाचार-पत्रों में रीस को अच्छे से निशाना बनाया गया क्योंकि वह हर मोर्चे पर विफल हो गया था। ब्रिटिश सैनिक अधिकारी की इस आलोचना से क्रुद्ध होकर आनन-फानन में माउंटबेटन ने अपने 'बेडरूम' में 27 अगस्त की सुबह एक बैठक बुलाई, जिसमें माउंटबेटन के अलावा उनके एक ब्रिटिश सहयोगी और वीपी मेनन मौजूद थे।

इस बैठक में पंजाब को राहत दिलाने अथवा स्वयं का मूल्यांकन करने के बजाय माउंटबेटन का पूरा ध्यान अपने-आप को और अपने ब्रिटिश अधिकारियों को बचाने पर ही केन्द्रित था। जबकि मेनन का सुझाव था कि उन्हें समाचार-पत्रों पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए। फिर भी माउंटबेटन ने शाम चार बजे कुछ संपादकों को तलब किया और उन्हें पहले डराया कि अगर वे मैक्सिकों में होते तो अब तक उन्हें उठाकर फेंक दिया जाता। फिर उन्हें एक इशारे से समझाया कि अब सारी जिम्मेदारी भारत की संसद की है।

दरअसल, ई. जेंकिस ने 15 अगस्त को ही माउंटबेटन सहित लन्दन में भारत के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को एक टेलीग्राम भेजकर पंजाब की असंतोषजनक स्थिति से अवगत करा दिया था। इसके अलावा उसने एक सुझाव भी दिया कि अब हालातों से नयी सरकारों को निपटना चाहिए।" कुल मिलाकर अब ब्रिटिश क्राउन और उसकी सरकार सहित अधीनस्थ अधिकारी भारत को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंककर स्वदेश भागने की पूरी तैयारी कर चुके थे।

भारत के विभाजन की योजना ब्रिटिश क्राउन और वहां की संसद ने पारित की जिसके सूत्रधार लुईस माउंटबेटन ही थे। उन्होंने ही 3 जून 1947 को भारत के सांप्रदायिक विभाजन का पूरा खाका पेश किया था। इस कुख्यात योजना को 'माउंटबैटन योजना' के नाम से जाना जाता है। भारत और पाकिस्तान की सीमाओं के निर्धारण का काम सायरिल रेडक्लिफ को सौंपा गया था। यह सब जानबूझकर इतनी हड़बड़ी और जल्दबाजी में किया गया ताकि अव्यवस्था फैले और करोड़ों नागरिक अनिश्चितता और संकट में फंस जाएं।

लियोनार्ड मोसली की पुस्तक, 'द लास्ट डेज ऑफ़ द ब्रिटिश राज' के अनुसार रेडक्लिफ को लन्दन स्थित परमानेंट अंडर सेक्रेटरी ने एक बड़े से नक़्शे के माध्यम से मात्र 30 मिनट में बता दिया कि उसे 9 करोड़ लोगों के नए घरों, जीवनयापन पद्धति और राष्ट्रीयता को कैसे निर्धारित करना है। 31 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन प्रधानमंत्री नेहरू अपने समकक्ष पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के साथ पहली बार पूर्वी पंजाब के दौर पर थे। उनके साथ पत्रकारों की एक छोटी टोली भी थी, जिसमें 'इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर' के लेखक दुर्गादास भी मौजूद थे।

वे अपनी इस पुस्तक में उस दिन के घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए लिखते है, "हमनें अमृतसर से उड़ान भरी और लायलपुर में उतरे। यहाँ आधा मिलियन हिन्दू और सिख सुरक्षित भारत पहुँचने की गुहार लगा रहे थे। यह राखी का दिन था, जब हिन्दू बहनें अपने भाई की कलाई पर धागा बांधकर अपनी सुरक्षा का वचन लेती है। दर्जनभर महिलायें सर्किट हाउस में आई और उन्होंने प्रतीकात्मक धागे नेहरू के हाथ में बांध दिए। इससे हम सभी की आँखे नम हो गयी। फिर हम अपने डकोटा जहाज से लाहौर एयरफिल्ड पहुंचे, जहाँ हमारी मुलाकात फ्रांसिस मूडी और ज्ञानी करतार सिंह से हुई।"

दुर्गादास ने मूडी और अपनी बातचीत के एक घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि मूडी ने मुझसे कहा था, "तुम्हे आजादी चाहिए थी, अब ले लो आजादी।" मूडी का यह ताना न सिर्फ उसके अहंकार को दर्शाता है बल्कि बताता है कि ब्रिटिश क्राउन ने भारत के साथ स्वाधीनता के नाम पर कितना बड़ा छल किया था।

इसलिए 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश औपनिवेशिकता से भारत स्वाधीन जरुर हुआ लेकिन इतिहास के पन्नों में इस दिन भारत विभाजन का भी एक अध्याय हमेशा के लिए थोप दिया गया। यह विभाजन सिर्फ सीमाओं के निर्धारण तक सीमित नहीं था बल्कि इसके पीछे लाखों दर्दनाक विभीषिकाएँ भी दर्ज है।

लियोनार्ड मोसेली अपनी पुस्तक में इस सन्दर्भ का वर्णन करते हुए लिखते है, "अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों का विस्थापन हुआ। इस दौरान करीब 6 लाख लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दीवार से फोड़ दिए गए, बच्चियों का बलात्कार किया गया, बलात्कार कर लड़कियों के स्तन काट दिए गए और गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।"

दुर्भाग्य ऐसा था कि जब तक माउंटबेटन भारत से चला नहीं गया, तब तक पंजाब लगातार सांप्रदायिक हिंसा में जलता रहा। लेकिन नेहरु की माउंटबैटन परिवार से मित्रता के कारण भारत के दर्दनाक विभाजन के इस खलनायक की क्रूर भूमिका को कभी भी भारत की जनता के सामने नहीं आने दिया गया।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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