कोरोना: ई-टेक्नोलॉजी के युग में खत्म होती संवेदनाएं

कोरोना: ई-टेक्नोलॉजी के युग में खत्म होती संवेदनाएं

आज से दस साल पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि एक 2020 में एक वायरस विश्व के इतिहास को बदल कर रख देगा। जिस तरह से इस वायरस ने अपने पैर पसारे हैं उसे देख सुनकर भय का भाव आना सहज है। कोरोना ने बहुत कुछ बदल दिया है लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है मिलने मिलाने और एकसाथ बैठकर चर्चा करने पर। चाहे वह ऑफिस की मीटिंग्स हों, राजनैतिक बैठकें या फिर गांव की चैपालें। एक समय था जब चैपालें होती थी। भारतीय गांवों में तो आज भी चैपालों को उतना ही महत्व है। हालांकि मोबाइल क्रांति से बहुत कुछ बदला भी है लेकिन मिलकर बैठना तो भारतीय संस्कृति और समाज का हिस्सा रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी के मंत्र का पालन करते हुए हम इंटरनेट के बहुत करीब आ गए हैं। जीवन अब मोबाइल, आई पैड और लैपटाॅप के इर्द गिर्द अधिक घूम रहा है। वर्क फ्रॅाम होम यानी घर से काम करने की संस्कृति और प्रचलित हुई है। भाव भंगिमाएं और हाव भाव को मनोविज्ञान में नाॅन वर्बल कम्यूनिकेशन कहा जाता है। यह न केवल चर्चा में भूमिका निभाती हैं बल्कि कई बार तो किसी की तारीफ के लिए एक मुस्कुराहट और ताली ही काफी होती है। लेकिन वेबीनार और ऑनलाइन चर्चाओं के इस नए समय में तो केवल सर ही नजर आते हैं।

कोरोना: ई-टेक्नोलॉजी के युग में खत्म होती संवेदनाएं

साहित्य जगत और कथा-कविता पाठ की बैठकों और चर्चाओं पर भी अब कोरोना का साया है। लेखक, कवि और साहित्यकार एकसाथ मिलकर चाय पर अपनी बात कहते रहे हैं। काॅफी हाउस, घर, ऑडिटोरियम आदि में इस तरह की चर्चाएं आयोजित होती रही हैं लेकिन अब हम इस तरह के आयोजन से बच रहे हैं। लेखक भी आपस में जुडे रहने के लिए टैक्नोलाॅजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन अभी यह तरीका इतना लोकप्रिय नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि किताब, पेपर हाथ में लेकर चाय के कप के साथ अपनी कथा कविता कहने का आनंद ही कुछ और है। पुरानी पीढी के लेखकों को भी इससे दिक्कत आ सकती है। कोरोना ने वेबीनार संस्कृति को जन्म दिया है। दफ्तर का कामकाज हो या टीवी पर चल रही चर्चाएं सब कुछ अब कैमरे की छोटी सी आंख के जरिए चल रहा है। काॅरपोरेट जगत में जूम जैसी ऍप्लिकेशन के जरिए वेबीनार आयोजित हो रहे हैं। राजनैतिक विचार विमर्श के लिए राजनीतिज्ञ वेबीनार कर रहे हैं।

कोरोना: ई-टेक्नोलॉजी के युग में खत्म होती संवेदनाएं

अब तो पापा - मम्मी के लैपटाॅप स्क्रीन स्कूल के ब्लैक बोर्ड की भूमिका में है। बच्चे लैपटाॅप और मोबाइल के जरिए क्लास ले रहे हैं। ऐसे में अध्यापक और छात्र के बीच का संवेदनशील जुड़ाव गायब हो रहा है। जब हम छोटे थे तो अपनी अध्यापिका को सुबह सुबह फूल देकर उन्हें गुड माॅनिंग कहा करते थे। आजकर छात्र ऐसा तो नहीं करते लेकिन पढ़ते पढ़ाते वक्त वे टीचर की भाव भंगिमांए और चेहरे के भावों से जुडकर क्लास में बैठते हैं। टीचर और स्टूडेंट के रिश्ते में काफी स्वाभाविकता आई है। टीचर की ईमेज अब डंडे वाली गुस्सैल मैडम की नहीं रही। वे दोस्ताना हैं और बच्चों के पेरेंट्स से व्हट्सएप के जरिए जुडे हुए हैं। लेकिन कोरोना के छा जाने से छात्र अब टीचर्स से ऑनलाइन क्लास ले रहे हैं। व्हट्सएप का प्रयोग बढ गया है। कैमरे पर क्लास दे रहे टीचर का चेहरा देखकर और आवाज सुनकर ही नोट्स बन रहे हैं। विदेशों में तो यह प्रचलन काफी पहले से है लेकिन भारत के मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों को अब तक ऑनलाइन क्लास का अनुभव नहीं था। टीचर के क्लास में दाखिल होते ही बच्चे खड़े होकर उन्हें विश करते हैं और टीचर के सामने होने से बच्चों में एक सुरक्षा का भाव आता है।

कोरोना: ई-टेक्नोलॉजी के युग में खत्म होती संवेदनाएं

टीवी पर डीबेट भी अब अपना रूप बदल रहे हैं। आप देख सकते हैं कि एंकर के साथ स्टूडियो में मौजूद रहकर बहुत कम लोग चर्चा में भाग ले पा रहे हैं। अधिकतर अपने घरों से ही एंकर से जुड रहे हैं और अपनी बात अपने लैपटाॅप कैमरा के जरिए कह रहे हैं। कई चैनल्स पर फोन के जरिए ही मेहमानों को जोड़ा जा रहा है। टीवी पर जब हम किसी चिंतन को देखते सुनते हैं तो उसमें भी हाव भाव का बहुत महत्व रहता है। चिंतक किस भावना से बात कह रहा है यह उनके जैस्चर्स यानी भाव भंगिताओं से भी स्पष्ट होता है। लेकिन अब तो स्टूडियो में आना भी मेहमानों को गवारा नहीं वहीं चैनल भी कोरोना से सुरक्षा कारणों को देखते हुए कार्यक्रम के मेहमानों को टैक्नोलाॅजी के जरिए ही अपने साथ जोड़ रहे हैं। कोरोना काल में मनोरंजन के लिए भी लोग इंटरनेट पर ही निर्भर हो रहे हैं। आम आदमी का नेट यूसेज बढ गया है। थियेटर, सिनेमा हाॅल और रेस्तरां बंद हैं। ऐसे में लोग इंटरनेट पर नेटफ्लिक्स, यू-ट्यूब आदि पर फिल्में देख रहे हैं। अब घर का ड्राइंग रुम ऑफिस, स्कूल, प्ले ग्रांउड और थियेटर की भूमिका में है। कुछ देशों में ऑनलाइन कंसर्ट काफी प्रचलित हुए हैं। इसमें गीत संगीत की महफिल ऑनलाइन ही जमती है। कोरोना वायरस से संबंधित ताजा खबरों के लिए भी इंटरनेट का ही इस्तेमाल लोग अधिक कर रहे हैं। खेल के मैदान सूने पड़े हैं। बच्चे भी अब विडियो गेम्स से अपना मनोरंजन कर रहे हैं।

कोरोना: ई-टेक्नोलॉजी के युग में खत्म होती संवेदनाएं

विकिपीडिया पर नए शब्द दर्ज हो रहे हैं। लोग कोरोना वायरस से जुडी हर जानकारी इंटरनेट से जुटा रहे हैं। कोरोना काल में डिजिटल पेमेंट का चलन भी बढा है। नोट और सिक्के लेकर या देकर लोग जोखिम मोल लेने से बच रहे हैं। ऐसे में डिजिटल पेमेंट्स आसान तरीका है। पेटीएम जैसे एप तो अब जन जन के मोबाइल में है और वहीं से दूधवाले और राशनवाले को पैसे पे किए जा रहे हैं। लाॅकडाउन के चलते दूकानें व माॅल पूरी तरह नहीं खुले हैं और लोग ऑनलाइन शॉपिंग की ओर अधिक झूके हैं। घूम घूम कर कपड़े पहनकर देखने का वक्त तो जैसे चला ही जा रहा है। खरीदारी करने का मजा भी अब वैसा नहीं है। टेक्नोलाॅजी ने कोरोना काल में जीवन को सुरक्षित करने का काम तो किया है। चीजें आसान भी हुई हैं। लेकिन लोगों में अकेलेपन की भावना बढ़ रही है। हम आपस में एक दूसरे से जुडा हुआ महसूस करने में दिक्कत का अनुभव कर रहे हैं। टेलीहेल्थ भी एक नया शब्द है जो कोरोना के फैलने के बाद ही प्रचलन में आया है। इसके अंतर्गत डाॅक्टर आपको फोन पर ही सलाह देते हैं। आम आदमी हाॅस्पीटल जाने से कतरा रहा है वहीं अस्पताल भी कोरोना से लड़ने में व्यस्त हैं। ऐसे में टेलीफोन पर ही डाॅक्टर मरीज से बात कर रहे हैं। इसका भुगतान भी ऑनलाइन ही हो रहा है। कुछ देशों में कोरोना काल से निपटने के लिए रोबोट और डृोन्स की सहायता ली जा रही है। रोबोट घरों में खाना डिलिवर कर रहे हैं और अस्पतालों में मरीजों की देख-रेख में सहायता कर रहे हैं। भारत में अभी रोबोट इस स्तर तक नहीं पहुंचे हैं। इन सभी बदलावों को देखते हुए कहा जा सकता है कि विश्व भर में लाखों करोड़ों नौकरियों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। कोरोना वायरस के समय में टैक्नोलाॅजी को रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल तो हम सभी ने कर लिया है लेकिन भावनाओं और साथ का जो भाव हमें एकसाथ कार्य करके और बातचीत करके मिलता है वह नदारद हो रहा है। इससे डिप्रेशन होने के खतरे भी बढें हैं। बच्चे जब मैदान में गेंद से खेलते हैं तो वह खेल-खेल में और भी बहुत कुछ सीखते हैं जैसे चोट लग जाने पर संवेदनात्मक रवैया या फिर एक साथ आगे बढ़ने की टीम की गर्मजोशी। हमारी इस पीढ़ी को करोना काल ने एक नया पाठ बहुत जल्द पढ़ा दिया है।

कोरोना की वैक्सीन तो आ गयी है परन्तु अभी भी ट्रायल मोड में है। आशा की जानी चाहिए कि कोरोना वैक्सीन जल्द ही आम आदमी को राहत प्रदान करेगी और भविष्य एवं आने वाली पीढ़ियां इस जानलेवा बीमारी से सुरक्षित हो पाएंगी और हमारे वैज्ञानिकों का शुक्रिया करेंगी।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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