Congress Session: कांग्रेस की डोर से विपक्ष को बांधने की कवायद
कांग्रेस के रायपुर में आयोजित महाधिवेशन में जहां एक ओर पार्टी की आंतरिक परिस्थितियों पर चर्चा होगी वहीं दूसरी ओर वह विपक्षी दलों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास भी करती दिख रही है।

Congress Session: जब आप यह आलेख पढ़ रहे हैं, तब कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन रायपुर में चल रहा है। 85 वें महाधिवेशन से कांग्रेस खुद को तरोताजा कर हाशिए से निकलने की फिराक में है। अधिवेशन के पहले दिन यह तय किया जा चुका है कि अब कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्यों के लिए चुनाव नहीं होगा। राज्यों के क्षत्रपों को सीडब्ल्यूसी में मनोनयन से लाया जाएगा। सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा को पार्टी में समायोजित करने की नई व्यवस्था बनाने पर बात होगी।
कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण राज्यों के आगामी चुनावों को देखते हुए पार्टी के पास इतना समय नहीं बचा है कि वह सीडब्ल्यूसी के लिए आंतरिक चुनाव के नाम पर कोई नया बखेड़ा खड़ा करे और उसके परिणाम को झेल पाए। वैसे 25 सालों के बाद कांग्रेस पार्टी प्रखर लोकतांत्रिक छवि के साथ बाहर आई है। गांधी नेहरू परिवार परदे के पीछे गया है। मल्लिकार्जुन खड़गे निर्वाचित अध्यक्ष के तौर पर उभरकर सामने आए हैं। दावा है कि देश की वह अकेली पार्टी है जिसने अपने अध्यक्ष को मनोनयन के बजाय मतदान के पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित किया है।
हालांकि पार्टी को इसकी कीमत तात्कालिक विवाद और विषाद से चुकाना पड़ी थी। इस मामले में चुनाव प्रक्रिया से पहले खड़े हुए बवंडर की याद आसानी से नहीं जाने वाली है। तब नेहरू गांधी परिवार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव लड़ाना चाहता था लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी से चिपके रहने के लिए गहलोत ने आलाकमान की खुली अवहेलना कर दी थी।
बुजुर्ग गहलोत आगे भी खुद को राजस्थान के मुख्यमंत्री का दावेदार बन विधानसभा चुनाव में उतरने की इच्छा पाले हुए हैं। राजस्थान में गहलोत या सचिन पायलट में से कौन नेता होगा, यह लंबित फैसला भी महाधिवेशन में तय होना है। यह अकेले राजस्थान को लेकर होने वाले फैसले की बात नहीं है। कर्नाटक, छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश में भी पार्टी के मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर निर्णय होना है। यह तय होना है कि चुनाव में उतरने से पूर्व चेहरे की घोषणा कर दी जाए या फिर हिमाचल प्रदेश की तरह चुनाव पर्यंत विधायक दल के बीच से मुख्यमंत्री चयनित करने की आजमाई प्रक्रिया का पालन किया जाए।
हालांकि छतीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पार्टी आलाकमान से इस बार टी एस सिंहदेव अथवा किसी अन्य नेता को लेकर बन सकने वाले संदेह को खत्म करवाने के जतन में लगे हैं। राहुल व प्रियंका गांधी के करीबी सचिन पायलट की भी राजस्थान को लेकर भूपेश बघेल जैसी ही चाहत है। कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष शिवकुमार पार्टी को उस मोड़ पर ले जाने को उद्यत हैं जहां पहुंचकर भावी नेता के तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया जैसे किसी प्रतिद्वंदी का जिक्र दूर दूर तक न सुनाई पड़े।
मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ बागेश्वर धाम का दर्शन कर अधिवेशन में पहुंचे हैं। इस बार उनके आगे ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे प्रतिद्वंदी नहीं हैं। लेकिन राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में अनवरत शामिल रहे दिग्गी राजा का खौफ है।
इन चार महत्वपूर्ण चुनावी राज्यों के अलावा अधिवेशन में कांग्रेस पार्टी को अगले वर्ष होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव की रणनीति तय करनी है। विपक्षी एकजुटता के संदर्भ में लगातार चर्चा हो रही है। विपक्ष के साथ किस स्तर पर जाकर समझौता करना है, इस पर मंथन होना है। सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में उसका ग्राफ गिरकर मात्र दो प्रतिशत वोट हासिल करने वाली पार्टी का क्यों बन गया है, इस पर भी विचार चल रहा है। क्या वरुण गांधी जैसे किसी दिग्गज नेता को कांग्रेस में लाकर उत्तर प्रदेश के रास्ते पार्टी में नई इबारत लिखी जा सकती है, अधिवेशन में दबी जुबान से इस पर भी चर्चा हो रही है।
महाधिवेशन में कांग्रेस विपक्षी एकता के नाम पर क्षेत्रीय दलों की दबाव की राजनीति से निपटने का फॉर्मूला भी तलाशेगी। इसमें यह भी तय किया जाएगा कि देश के किस राज्य में किस पार्टी के साथ किस तरह का गठबंधन हो और सहयोगी दलों से रिश्ता किस हद तक रखा जाए। कांग्रेस के रुख पर बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भविष्य टिका है, जो बार बार कह रहे हैं कि विपक्ष एकजुट हो तो भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में सौ सीटों के अंदर समेट दिया जाए। नीतीश के इरादे में हौसला भरने के लिए पटना जाकर कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने आई लव यू कहने का नया जुमला गढ़ दिया है। यह दीगर बात है कि रायपुर अधिवेशन से बाहर निकलने के बाद देश की सत्ता को सबसे ज्यादा समय तक सम्हालने का अनुभव रखने वाली कांग्रेस पार्टी विपक्ष के अन्य नेताओं को मनाने में कैसे लगती है।
विपक्ष के नेताओं में बिहार के नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश के अखिलेश यादव व मायावती, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, महाराष्ट्र में शरद पवार, जम्मू कश्मीर से गुलाम नबी आजाद, अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार, तेलंगाना से उभर रहे भारत राष्ट्र समिति के चंद्रशेखर राव और तमिलनाडु से एम के स्टालिन हैं। इन गैर कांग्रेसी क्षत्रपों को कांग्रेस अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के हक में "डू यू लव मी" पूछ पाती है या"आई लव यू" कहने को मजबूर हो जाती है।
विपक्षी एकजुटता को लेकर चल रही चर्चा के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राहुल गांधी की तैयारी के मद्देनजर पार्टी की स्थिति को साफ कर दिया है। उन्होंने कह रखा है कि अगले साल केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनेगी। पार्टी महासचिव जयराम रमेश महाधिवेशन में कह रहे हैं कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकजुटता के संदर्भ में चर्चा की जाएगी और भविष्य की रूपरेखा तय हो रही है। ज्यादातर नेता राहुल गांधी को आगे रखकर कह रहे हैं कि कांग्रेस के बिना देश में विपक्षी एकता की कोई भी कोशिश सफल नहीं हो सकती। इसलिए अब क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस की अगुवाई में ही एकजुट हो जाना चाहिए।
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हालांकि क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस के संबंध अतीत में कभी मधुर नहीं रहे हैं। कांग्रेस के ऊपर आरोप लगता रहा है कि वह भले ही जरूरत पड़ने पर वह क्षेत्रीय दलों को आई लव यू कहे, लेकिन जरूरत निकल जाने के बाद उसकी नीति यूज एण्ड थ्रो वाली ही रही है। इसलिए अगर वह विपक्षी दलों को एकजुट करना चाहती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की ही रहेगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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