Priyanka Vadra: क्या टीम राहुल ने प्रियंका वाड्रा को पैदल कर दिया?
Priyanka Vadra: तीन दिसंबर को आए चुनाव नतीजों में झटका खाने के बाद कांग्रेस में केंद्रीय स्तर पर फेरबदल तय हो गया था, लेकिन बड़े से बड़े राजनीतिक पंडित को भी उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस की तीसरी सबसे ताकतवर नेता प्रियंका वाड्रा कांग्रेस में तकरीबन पैदल कर दी जाएंगी। कांग्रेस में सोनिया और राहुल के बाद प्रियंका ही सबसे ताकतवर नेता मानी जाती हैं।
बेशक मल्लिकार्जुन खरगे पार्टी के अध्यक्ष हैं, लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी में गांधी-नेहरू परिवार के सदस्यों की हैसियत छिपी नहीं है। ऐसे में अगर प्रियंका वाड्रा को दायित्वविहीन महासचिव बनाया जाना मामूली बात नहीं है।

साल 2004 के आम चुनावों में राहुल गांधी जब संसदीय पारी की शुरूआत कर रहे थे, तब कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का एक वर्ग निराश था। कांग्रेस से हमदर्दी रखने वाले आम वोटरों का भी एक वर्ग राहुल की शुरूआत को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा था। सबकी चाहत थी कि राहुल की बजाय गांधी-नेहरू परिवार की अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि के तौर पर कांग्रेस में प्रियंका को सक्रिय किया जाना चाहिए था। देश का एक बड़ा वर्ग यह मान चुका था कि राजनीतिक समझ के लिहाज से प्रियंका, अपने भाई राहुल की तुलना में बीस हैं। कुछ लोगों ने दबी जुबान से यह भी कहा कि सोनिया गांधी ने पुरानी सोच के मुताबिक अपने उत्तराधिकारी के तौर पर बेटे को बेटी पर तवज्जो दिया। कुछ लोगों को यहां तक लगता था कि प्रियंका दूसरी इंदिरा गांधी हैं।
सोशल मीडिया के विस्तार के दौर में सियासी लड़ाइयों का सबसे बड़ा हथियार नैरेटिव बन गया है। साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जब प्रियंका गांधी को राजनीति में सक्रिय किया गया, तो उन्हें एक बार फिर इंदिरा गांधी के प्रतिरूप के रूप में बताने-जताने की तैयारी हुई। दिग्गज कांग्रेसी तक बताने लगे थे कि उनकी नाक बिल्कुल इंदिरा गांधी जैसी है। उनकी आवाज तक को इंदिरा जैसा बताया गया। इन शब्दों के जरिए यह स्थापित करने की कोशिश हुई कि मोदी-शाह के दौर को खत्म करने के लिए कांग्रेस के हाथ ताकतवर हथियार लग गया है। कांग्रेस की वह हथियार प्रियंका थीं। कहना न होगा कि एक दौर में बीजेपी भी प्रियंका के राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होने की आशंका से किंचित सहम जाती थी। उसे ऐसा लगता था कि प्रियंका ने अगर मोर्चा संभाला तो उसके लिए विपरीत हालात होंगे।
लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि कांग्रेस का प्रियंका रूपी हथियार भी कारगर नहीं है। ना तो इंदिरा की नाक काम आ सकी, ना ही उनकी जैसी आवाज। उत्तर प्रदेश में हाथरस बलात्कार कांड के बाद प्रियंका ने लड़ाका रूख जरूर अख्तियार किया। प्रियंका के सलाहकारों ने उनकी छवि गढ़ने के लिए शाब्दिक माहौल बनाने के लिए शानदार नारा भी गढ़ा, 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं'। वाम बौद्धिकों के एक वर्ग ने इन शब्दों के जरिए प्रियंका को भारत का ऐसे भविष्य के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की, जो मोदी को ना सिर्फ चुनौती दे सकती हैं, बल्कि कमल को मुरझा सकती हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने राज्य को दो हिस्सों में बांट दो महासचिवों को जिम्मा दिया। पश्चिम की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी गई तो पूरब की जिम्मेदारी प्रियंका के पास रही। दिल्ली के चश्मे से देखने वाले वाम बौद्धिकों के साथ ही पत्रकारों के एक वर्ग ने प्रियंका को लेकर उम्मीदों का आसमान खड़ा कर दिया। लेकिन उत्तर प्रदेश ने उन्हें निराश किया। हां, उसके बाद हुए चुनावों में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस जीत गई। हिमाचल की कमान कमोबेश प्रियंका ने ही संभाल रखी थी। वैसे मनाली में उनका घर भी है। इसलिए माना गया कि हिमाचल की जीत की एक वजह प्रियंका भी रहीं।
प्रियंका ने एक तरह से पंजाब में भी चुनाव अभियान चलाया। पंजाब में चुनाव से ठीक छह महीने पहले चरणजीत सिंह चन्नी को दलित होने की वजह से कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे कद्दावर नेता को हटाकर मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन प्रियंका का दलित दांव नहीं चला। अमरिंदर ने अलग राह अख्तियार कर ली और पंजाब की सत्ता ऐसी उखड़ी कि उम्मीद भी नहीं की जा रही कि निकट भविष्य में कांग्रेस पंजाब में वापसी कर सकती है।
राजस्थान में सचिन पायलट उनके नजदीकी माने जाते रहे। लेकिन अशोक गहलोत के दांव के आगे उनकी नहीं चली। सचिन के अध्यक्ष रहते राजस्थान 2018 का चुनाव जीतने में कामयाब रही। तब अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की टीम में पार्टी के संगठन मंत्री का दायित्व संभाल रहे थे। लेकिन जैसे ही राजस्थान में जीत मिली, अशोक गहलोत ने दिल्ली से जयपुर का रूख कर लिया और सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रहे। सचिन मन मसोस कर रह गए। जब उनकी उपेक्षा बढ़ी तो उन्होंने बगावती रूख अख्तियार किया, लेकिन प्रियंका उन्हें मनाने में कामयाब रहीं। हालांकि राजस्थान में कांग्रेस अपनी खोई प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर पाई। राजस्थान में अशोक गहलोत की गतिविधियों से नाराज राहुल गांधी ने महज तीन जनसभाएं ही कीं, जबकि प्रियंका राजस्थान में सचिन पायलट के समर्थक प्रत्याशियों के लिए प्रचार करती रहीं। गांधी-नेहरू परिवार की सदस्य के नाते उनकी अगुआई पर किसी को सवाल उठाने की हैसियत भी नहीं थीं। लेकिन राजस्थान में भी प्रियंका कोई चमत्कार नहीं कर पाईं।
छत्तीसगढ़ में अनौपचारिक रूप से कहा जाता था कि भूपेश बघेल से कुछ हासिल करना है तो बेहतर है कि प्रियंका गांधी से संपर्क कर लो। दबी-जुबान से राज्य में माना जाता था कि बघेल पर प्रियंका का ही सबसे ज्यादा असर है। छत्तीसगढ़ में पिछले साल जब कांग्रेस महाधिवेशन हुआ तो प्रियंका गांधी के लिए हवाई अड्डे से लेकर अधिवेशन स्थल तक बघेल की पहल पर गुलाब की पंखुड़ियां बिछा दी गई थीं। तब बघेल की खूब आलोचना हुई थी। बघेल और उनके सहयोगियों ने ऐसा माहौल बनाया, मानो वे राज्य के भूतो न भविष्यति नेता है, जिन्हें हटा पाना मुश्किल होगा। लेकिन ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ की जनता पहले से ही मन बना चुकी थी। तीन दिसंबर को आए नतीजों से यही साफ हुआ।
कांग्रेसी अंत:पुर से खबरें उड़कर आती रही हैं कि कांग्रेस की रणनीति को लेकर पार्टी के पहले ही परिवार में एका नहीं है। कांग्रेस में सोनिया गांधी के चहेते नेताओं का अलग समूह है तो राहुल का अपना गुट है। इसी तरह प्रियंका का भी अपना गुट है। जाहिर है कि जब पार्टी का प्रथम परिवार ही एक नहीं रह पाएगा तो पूरी पार्टी में एकता कैसे होगी और वह मिलकर कैसे अपने सबसे बड़े सियासी दुश्मन मोदी-शाह का मुकाबला कर सकती है?
कांग्रेस में प्रियंका को बिना जिम्मेदारी का महासचिव बनाने का मतलब है कि पार्टी नेतृत्व को उनकी क्षमता पर भरोसा कम हो रहा है। उन्हें महासचिव पद से हटाया जाता तो उसका जवाब देना पार्टी के लिए मुश्किल होता, शायद यही वजह है कि उनका ओहदा नहीं हटाया गया है। सचिन पायलट को छत्तीसगढ़ का प्रभार देकर पार्टी ने यह जताने की कोशिश जरूर की है कि प्रियंका की पकड़ छत्तीसगढ़ पर बनी रहेगी। लेकिन इस फैसले का दूसरा पहलू भी है। सचिन को राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी से दूर कराकर अशोक गहलोत ने अपनी ताकत का परिचय दे दिया है। सोनिया गांधी के नजदीकी माने जाने वाले मोहन प्रकाश को बिहार का प्रभार देना और प्रियंका की जगह अविनाश पांडे को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देने का भी संदेश साफ है।
मोहन प्रकाश जनता परिवार के पुराने नेता हैं। नीतीश उनके करीबी हैं। कभी लालू को मुख्यमंत्री बनवाने वाले गुट के सदस्य रहे, इसलिए माना जा रहा है कि उनके जरिए कांग्रेस बिहार में जनता परिवार को साधकर अपने लिए सीटें बढ़ाने की गुंजाइश खोजेगी। वहीं अविनाश पांडे को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी का संकेत साफ है कि अखिलेश को नाराज करने का पार्टी जोखिम नहीं उठाना चाहती। रमेश चेन्निथला को महाराष्ट्र और राहुल के नजदीकी जितेंद्र सिंह को असम और मध्य प्रदेश की कमान देकर एक तरह से पार्टी ने साफ किया है कि महत्वपूर्ण राज्यों पर राहुल की ही चलेगी, और प्रियंका के लिए अभी कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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