Congress President Election: संघ परिवार से सबक सीखे सोनिया परिवार

Congress President Election: 17 अक्टूबर को बहुत उत्साहपूर्ण माहौल में कांग्रेस के भावी अध्यक्ष के लिए देशभर में मतदान संपन्न हो गया। शायद ही इस दौर में किसी को ऐसा कोई मतदान याद हो जब किसी पार्टी अध्यक्ष के लिए इस तरह से मतदान के बूथ बने हों।

Congress President Election sonia family should learned from Sangh Parivar

भाजपा और कांग्रेस को छोड़ दें तो लगभग सभी क्षेत्रीय पार्टियां हैं और सब किसी न किसी परिवार के अधीन संचालित होती हैं। ऐसे समय में दो दशक बाद वंशवाद का आरोप झेल रही कांग्रेस में अध्यक्ष पद का चुनाव सराहनीय प्रयास है।

देश में कम्युनिस्ट पार्टियों के पतन के बाद व्यावहारिक तौर पर अब दो ही राष्ट्रीय दल बचे हैं। एक है भाजपा और दूसरी कांग्रेस।

वैसे चुनाव आयोग की अपनी सूची में अभी भी आठ नाम हैं लेकिन इन आठ नामों में कोई राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पहचानी नहीं जाती। तृणमूल कांग्रेस हो या फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस। इनकी उपस्थिति स्थानीय ही है और ये सभी वंशवादी राजनीतिक दल हैं।

बाकी बचे भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव भी मनोनयन के अनुसार ही होता रहा है। भाजपा में शीर्ष पदों पर वंशवाद तो नहीं है लेकिन इसके अध्यक्ष का चुनाव भी मतदान करके उस लोकतांत्रिक तरीके से नहीं होता जैसा इस बार कांग्रेस में हो रहा है।

भाजपा और कांग्रेस में अध्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया

भाजपा में अध्यक्ष का 'चुनाव' नहीं होता बल्कि उसकी 'नियुक्ति' होती है। जब तक अटल, आडवाणी और जोशी का युग था, वही लोग अदल बदल कर अध्यक्ष बनते रहे।

इन तीनों का राजनीतिक युग समाप्त होने के बाद जो अध्यक्ष बने वो भी 'संघ की सहमति' से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ही नियुक्त किये। इन नियुक्तियों के बाद औपचारिक रूप से राज्यों और केन्द्रीय कार्यकारिणी की सहमति जरूर ले ली जाती है।

हालांकि भाजपा का संविधान अपने अध्यक्ष की नियुक्ति के बारे में ऐसा नहीं कहता। भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए सभी राज्यों में से आधे राज्यों की कार्यकारिणी बनने के बाद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो सकती है।

अध्यक्ष पद पर बैठने वाले व्यक्ति के महत्व को देखते हुए बीजेपी पार्टी संविधान में भी संशोधन कर लेती है। जैसे अमित शाह को तीसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए भाजपा ने अपने संविधान में संशोधन किया था।

पार्टी में अब तक कोई भी अध्यक्ष लगातार दो बार ही इस पद पर रह सकता है लेकिन अमित शाह के महत्व को देखते हुए इसे लगातार तीन बार कर दिया गया।

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आशय यह है कि भाजपा वंशवादी पार्टी भले न हो लेकिन वहां भी पार्टी अध्यक्ष का वैसा चुनाव आज तक नहीं हुआ जैसा 2022 में कांग्रेस में हो रहा है।

भाजपा में पार्टी अनुशासन पर बहुत जोर होता है और वहां हर नेता एक समर्पित कार्यकर्ता की तरह होता है। शीर्ष नेतृत्व द्वारा जो निर्णय लिया जाता है उसका खुला विरोध कभी नहीं होता। इसलिए भाजपा में भी व्यावहारिक तौर पर अध्यक्ष का चुनाव होने की बजाय उसकी नियुक्ति ही होती है।

संघ भाजपा संबंध

इसका एक बड़ा कारण भाजपा की राजनीति पर संघ का प्रभाव है। जैसे कांग्रेस के पास सोनिया परिवार है वैसे ही भाजपा के पास संघ परिवार है। जैसे कांग्रेस अपने नीतिगत निर्देशों के लिए सोनिया परिवार पर आश्रित है वैसे ही भाजपा नीतिगत निर्णय में संघ से सलाह मशविरा जरुर करता है।

राज्य से लेकर केन्द्र की कार्यकारिणी तक संघ एक या एक से अधिक संगठन मंत्री भाजपा में नियुक्त करता है। यह संगठन मंत्री भाजपा के कामकाज में सीधे तौर पर शामिल रहता है। लेकिन इसकी नियुक्ति और वापसी संघ के हाथ में ही रहती है।

अगर संघ भाजपा संबंधों को देखें तो संघ भाजपा के काम काज में शामिल होकर भी उससे दूर रहता है। संघ द्वारा नियुक्त संगठन मंत्री भाजपा के रोजमर्रा के काम काज का हिस्सा जरूर होता है लेकिन संघ सीधे तौर पर भाजपा के रोजमर्रा के काम काज से दूर रहता है।

किसी समय जब कांग्रेस सेवादल एक सशक्त संगठन होता था तब कांग्रेस पार्टी और सेवादल का भी कुछ ऐसा ही संबंध होता था। लेकिन कांग्रेस के लंबे समय तक सत्ता में रहने का दुष्परिणाम ये हुआ कि सेवादल समाप्त हो गया। या फिर कह सकते हैं कि सत्ता सुख ने कांग्रेस सेवादल को समाप्त कर दिया।

अब कांग्रेस अपने सेवादल को तो सशक्त नहीं बना सकता लेकिन इतना जरूर कर सकता है कि वह संघ भाजपा संबंधों से सबक सीखे।

राहुल गांधी बार बार संघ परिवार पर वैचारिक हमला जरूर करते हैं लेकिन उन्हें कम से कम संघ परिवार की कार्यप्रणाली से सबक सीखना चाहिए। जिस तरह संघ सीधे तौर पर भाजपा के कार्य में दखल दिये बिना भाजपा की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है कुछ उसी तरह की नीति अब सोनिया परिवार को भी अपनानी होगी।

निर्णायक नहीं, सलाहकार की भूमिका निभाए सोनिया परिवार

सोनिया परिवार के लिए अब जरूरी है कि वो कांग्रेस के लिए ठीक उसी तरह सलाहकार की भूमिका में आ जाएं जैसे भाजपा के लिए संघ परिवार है। यह बात सही है कि सोनिया परिवार कोई संगठन नहीं है कि अपना संगठन मंत्री नियुक्त करे लेकिन इतना तो कर ही सकता है कि वह कांग्रेस में रोजमर्रा के कामकाज से अपने आप को अलग कर ले। ऐसा करने से कांग्रेस में उस परिपाटी का अंत हो जाएगा जिसमें सबकुछ दस जनपथ से तय होता था।

कांग्रेस में बीते बीस सालों की राजनीति ऐसी हो गयी है कि नेता जनता से ज्यादा समय दस जनपथ (सोनिया गांधी का आवास) को साधने में लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस के प्रथम परिवार में जिसकी पहुंच है, उसी का कांग्रेस में महत्व है।

इस परिपाटी को नष्ट किये बिना कांग्रेस का उत्थान संभव नहीं है। इसे पूरी तरह से समाप्त करना भले संभव न हो लेकिन इसे सीमित तो किया ही जा सकता है। राजनीति के लिए राहुल गांधी की कथित अयोग्यता इस दिशा में कांग्रेस पार्टी के लिए वरदान बन सकती है। ये उन्हीं की जिद्द है कि आज कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए मतदान हो रहा है।

इस मतदान से कौन अध्यक्ष बनेगा यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण ये होगा कि कांग्रेस के नेता सचमुच उसको अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करें। अगर इतनी सारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बाद भी कांग्रेस के अध्यक्ष को दस जनपथ के नाम से ब्लैकमेल किया जाएगा तो फिर इस लोकतंत्रिक प्रक्रिया का महत्व ही क्या रह जाएगा?

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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