Uniform Civil Code: समान नागरिक संहिता और वनवासी समाज की चिंताएं
22वें विधि आयोग द्वारा समान नागरिक संहिता पर जो सुझाव और आपत्तियां मांगी गयी हैं उसमें आयोग के सामने वनवासी समाज द्वारा भी अपनी आपत्तियां दर्ज कराई गयी हैं। सवाल यह है कि क्या समान नागरिक कानून लागू होने से हिन्दुओं के एक बड़े समुदाय वनवासी समाज की चिंताएं बढ़ेंगी? झारखंड, छत्तीसगढ़ सहित उत्तर-पूर्व के राज्यों में वनवासी समाज द्वारा समान नागरिक संहिता पर बढ़ रहा विरोध तो इसी बात को इंगित कर रहा है।
दरअसल, दो सप्ताह पूर्व विधि आयोग ने सार्वजनिक व धार्मिक संगठनों से देश में समान नागरिक संहिता पर राय मांगी थी जिसके लिए 30 दिन का समय दिया गया था किन्तु हाल ही में भोपाल में बूथ कार्यकर्ताओं की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समान नागरिक संहिता की वकालत करके इस ज्वलंत मुद्दे को पुनः राजनीतिक एवं सामाजिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। उन्होंने दोहरी व्यवस्था से देश चलने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर कुछ समूह भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। भारत में अभी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में विभिन्न समुदायों में उनके धर्म, आस्था और विश्वास के आधार पर अलग-अलग कानून हैं। समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद भारत में किसी धर्म, लिंग और लैंगिक झुकाव से इतर सभी पर एक समान कानून लागू होगा।

किन्तु भारत में जब जब समान नागरिक संहिता का सवाल आया है तब तब इसका सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक विरोध होता रहा है। अभी तक देश का दूसरा सबसे बड़ा समुदाय, मुस्लिम समुदाय समान नागरिक संहिता को मजहबी आधार पर नकारता है। हालांकि मुस्लिमों में भी शिया मुसलमान समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं किन्तु उनका राजनीतिक झुकाव भारतीय जनता पार्टी की ओर होने के कारण बहुसंख्यक सुन्नी मुस्लिम समाज उन्हें अहमियत नहीं देता। कुछ ऐसी ही चिंताएं अन्य मजहबी समूहों और पंथों की भी हैं किन्तु अब हिन्दू पक्ष से भी समान नागरिक संहिता के विरोध में स्वर सुनाई दे रहे हैं। खासकर वनवासी समाज, जिसकी राजनीतिक ताकत कोई भी राजनीतिक दल नकार नहीं सकता।
वनवासी समाज के अपने कानून, संवैधानिक अधिकार एवं मान्यताएं
समान नागरिक संहिता के हो-हल्ले के बीच अभी इस तथ्य पर पर्दा पड़ा है कि यदि यह कानून का रूप लेता है तो आदिवासी प्रथागत कानून, छोटा नागपुर काश्तकारी (सीएनटी) और संथाल परगना काश्तकारी (एसपीटी) अधिनियम, विल्किंसन नियम, पेसा कानून, पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के नियम, वनवासियों के विवाह और तलाक कानूनों का क्या होगा? इसके अलावा वनवासी समाज के कई नियम-कानून आज तक हस्तलिखित नहीं हुए हैं किन्तु वृहद् समाज तक उनकी स्वीकार्यता है। वनवासी प्रथागत कानून के तहत महिलाओं को विवाह के बाद पैतृक भूमि का अधिकार नहीं दिया जाता है। सीएनटी और एसपीटी के तहत वनवासी भूमि को अधिकार प्राप्त हैं। नागा जनजातियों, बैगा, लुशाई और गोंड जनजाति आदि में बहुविवाह प्रथा है। इसके अलावा कश्मीर से लेकर असम तक तियान, टोडा, लद्दाखी बोटा, रोटा और खासा जैसे कई समुदायों में 'बहुपति प्रथा' प्रचलित है। दक्षिण भारत के जनजाति समाज में अपने सगे-संबंधियों से विवाह का चलन है।
सवाल यह उठ रहा है कि वनवासी समाज की ये प्रथाएं क्या समान नागरिक संहिता के चलते समाप्त हो जाएंगी? इसके अलावा नगालैंड में समान नागरिक संहिता के चलते अनुच्छेद 371ए के प्रावधानों को कमजोर करने का अंदेशा जताया जा रहा है जिनमें कहा गया है कि नगाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं, नागा प्रथागत कानून एवं प्रक्रिया से संबंधित और अन्य मामलों में संसद का कोई भी अधिनियम राज्य पर लागू नहीं होगा। इसी प्रकार मिज़ोरम का अपना पर्सनल लॉ है और वहां उनकी अपनी प्रथाओं का पालन होता है न कि धर्म का। उत्तर पूर्व का खासी समुदाय मातृसत्तात्मक नियमों पर चलता है और समुदाय में परिवार की सबसे छोटी बेटी को संपत्ति का संरक्षक माना जाता है। इस समुदाय को संविधान की छठी अनुसूची में विशेष अधिकार मिले हुए हैं जो समान नागरिक संहिता के चलते शिथिल या समाप्त हो सकते हैं।
27 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति की आबादी वाला राज्य झारखंड पहले से ही 'सरना कोड बिल' की मांग के चलते हिन्दुओं में विभेद का सामना कर रहा है जिसके अंतर्गत वनवासी समाज को हिन्दू समाज से पृथक कर अलग 'सरना धर्म' का दर्जा देने की मांग होती रही है। ऐसे में समान नागरिक संहिता के मुद्दे ने झारखंड के वनवासी समाज की चिंताओं में वृद्धि करते हुए उन्हें इस अनुचित मांग को और उठाने का अवसर दे दिया है। 2016 में जब भारत के विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर लोगों की राय मांगी तो राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करते हुए प्रथागत अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप की मांग की थी जिसमें कहा गया था कि इस तरह के कदम से देश की 6,743 जातियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और उनकी मान्यताएं एवं संस्कृति समाप्त हो जाएगी।
इस बार भी वनवासी समाज की ओर से ऐसी ही याचिकाएं दायर करने की बात की गई है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार अकेले नागालैंड में 86.46 प्रतिशत, मेघालय में 86.15 प्रतिशत और त्रिपुरा में 31.76 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति है जिसका समान नागरिक संहिता पर विरोध मोदी सरकार को भारी पड़ सकता है।
समान नागरिक संहिता की पृष्ठभूमि और वर्तमान
समान नागरिक संहिता का मुद्दा 1835 में तब चर्चा में आया जब इसकी अवधारणा को लेकर एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें अपराध, सबूत व अनुबंध जैसे विषयों पर भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता लाने की बात कही गई। हालांकि इस रिपोर्ट में हिंदू और मुसलमानों के पर्सनल लॉ को इस एकरूपता से बाहर रखने की सिफारिश की गई थी। स्वतंत्रता से पूर्व भारत की धार्मिक विविधता को देखते हुए अंग्रेजों ने 1872 में भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम बनाया जबकि 1880 में मुस्लिम समुदाय के लिए काजी अधिनियम का गठन किया गया। 1936 में पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1937 में शरियत अधिनियम तथा 1939 में मुस्लिम विवाह अधिनियम का गठन कर अंग्रेजों ने हिंदू और सिखों को छोड़कर सभी के लिए कानून बना दिए थे जिसमें मजहब और रिलीजन के आधार को प्रमुखता दी गई थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नेहरू सरकार ने समान नागरिक संहिता की व्यापक मांग के बाद भी हिन्दुओं के लिए 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम, 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम तथा हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम बनाकर एक प्रकार से सामाजिक रीति-नीति को बदलने का काम कर दिया था। 1986 में राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो प्रकरण विवाद में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को रद्द करने के लिए मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित किया था। अब जबकि 22वें विधि आयोग ने जनता से समान नागरिक संहिता को लेकर जनता से राय मांगी है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रुख से प्रतीत हो रहा है कि अब यह मुद्दा किसी परिणिति तक पहुंच सकता है, इस पर वनवासी समाज की चिंताओं को दूर करना होगा।
हालांकि जनजातीय मामलों के विशेषज्ञ एवं क़ानूनी सलाहकार लक्ष्मण राज सिंह मरकाम का कहना है कि समान नागरिक संहिता, अनुच्छेद 44 के अन्तर्गत जनजातियों की परंपरा को संरक्षण देता है। लेकिन समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले इसको लेकर आदिवासी क्षेत्रों में दुष्प्रचार कर रहे हैं। वहीं अनुच्छेद 244 (अनुसूचित क्षेत्रों) एवं अनुच्छेद 342 के तहत समान नागरिक संहिता अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं हो सकती है। संविधान सभा की बैठक में यह बात बाबा साहब अंबेडकर ने भी कही थी। अतः जनजाति समाज समान नागरिक संहिता से डरने की जरूरत ही नहीं है। उन्हें अनावश्यक रूप से इस मुद्दे पर भड़काया जा रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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