Indian Democracy: भारत के लोकतंत्र को खतरा तो है, लेकिन विदेशी तत्वों से

Indian Democracy: अमेरिका की वरिष्ठतम महिला पत्रकारों में से एक है क्रिस्टीयान अमनपूर| पूरा नाम है क्रिस्टीयान मारिया हाइदे अमनपूर| वह एक ईरानी शिया मुस्लिम मोहम्मद तगीह की बेटी है| लेकिन उनकी मां रोमन कैथोलिक है| क्रिस्टीयान अमनपूर ने पिछले हफ्ते अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का इंटरव्यू लिया। यह इंटरव्यू उस समय हुआ, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकन राष्ट्रपति जो बाइडेन के न्योते पर अमेरिका पहुंचे हुए थे| एक घंटे के लंबे इंटरव्यू में से अमनपूर का एक सवाल भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है| क्रिस्टीयान अमनपूर ने बराक ओबामा से पूछा कि "राष्ट्रपति बाइडेन ने लोकतंत्र की रक्षा को अपने प्रशासन का केंद्रबिंदु बनाया है| उन्होंने चीन के राष्ट्रपति को तानाशाह कहा है, जबकि वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी कर रहे हैं, जिन्हें निरंकुश या कम से कम एक अनुदार लोकतांत्रिक माना जाता है| एक राष्ट्रपति को इस प्रकार के नेताओं के साथ उनका नामकरण करते समय या उनके साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए ?"

सवाल की भाषा स्पष्ट बता रही है कि वह बाइडेन की ओर से चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग को तानाशाह कहे जाने से, और भारत के प्रधानमंत्री मोदी की आवभगत से खफा हैं, जिन्हें क्रिस्टीयान अमनपूर ने निरंकुश और लोकतंत्र को कुचलने वाला बताया| सवाल या तो पूर्वाग्रह से ग्रसित है या प्रायोजित है| बराक ओबामा का जवाब इस मिलेजुले खेल को उजागर कर देता है|

Concerns About Indian Democracy danger from foreign elements

बराक ओबामा ने अपने जवाब में कहा-"दुनिया में हम जो शांति चाहते हैं, वह मानव हृदय में शुरू होती है... और यह भारत से ज्यादा महत्वपूर्ण और कहीं नहीं है| उस मूलभूत मूल्य को बरकरार रखना कहीं अधिक आवश्यक नहीं होगा| भारत तब तक सफल रहेगा जब तक यह धार्मिक आस्था के आधार पर विभाजित नहीं होता - और एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहता है| प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत में राष्ट्रपति को हिंदू बहुसंख्यक भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यक की सुरक्षा का उल्लेख करना चाहिए| अगर मेरी प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत हुई, जिन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूं, तो मेरे तर्क का एक हिस्सा यह होगा कि अगर आप भारत में जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं करते हैं, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि भारत किसी बिंदु पर विभाजित होना शुरू हो जाएगा|" यानि ओबामा ने भारत के फिर से धार्मिक आधार पर विभाजित होने की बात कही है|

इस सवाल और जवाब में कुछ शब्द गौर करने वाले हैं| सवाल और जवाब भारत में लोकतंत्र को खतरे, तानाशाह, निरंकुश, मुस्लिम, अल्पसंख्यक और भारत के टुकड़े टुकड़े होने का जिक्र आया है| यह कहने की जरूरत नहीं है कि ये सभी शब्द हम हर रोज भारत में कुछ ख़ास किस्म के लोगों के मुहं से सुनते ही रहते हैं| क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि जो भाषा भारत में एक ख़ास वर्ग बोल रहा है, ठीक वही भाषा अमेरिका का एक ख़ास वर्ग बोल रहा है|

Concerns About Indian Democracy danger from foreign elements

बराक ओबामा के जवाब से भारत में हंगामा हो गया है, क्योंकि उन्होंने ठीक वही भाषा बोली है, जो भारत का एक वर्ग विशेष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोल रहा है| पिछले छह महीनों में इन्हीं शब्दों का विपक्ष के एक महत्वपूर्ण नेता राहुल गांधी ने भी ब्रिटेन और अमेरिका के दौरों में इस्तेमाल किया था| ओबामा के बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी आपत्ति जताई है। ओबामा क्योंकि सरकारी पद पर नहीं हैं, इसलिए सरकारी तौर पर भारत ने कोई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है, लेकिन वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने भाजपा के मंच से ओबामा को आईना दिखाते हुए कहा कि जब वह राष्ट्रपति थे, तो अमेरिका ने सात मुस्लिम देशों पर बमबारी कर के हजारों मुस्लिमों को मौत के घाट उतारा था। इसलिए वह भारत को मुस्लिमों के अधिकारों पर ज्ञान न दें| जिनके घर शीशों के होते हैं, वे दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकते|

राहुल गांधी ओबामा के इंटरव्यू से कुछ घंटे पहले ही भारत लौट आए थे| क्या राहुल गांधी की क्रिस्टीयान अमनपूर या बराक ओबामा से मुलाक़ात हुई थी, या इन दोनों के संपर्कों से मुलाक़ात हुई थी? राहुल गांधी 20 जून को भारत लौटे हैं। 4 जून तक उन्होंने कई जगहों पर भाषण दिए थे। उनके भाषणों में वही बातें कही गईं थी, जिन्हें बराक ओबामा से किए गए सवाल और जवाब में दोहराया गया है|

राहुल गांधी 5 जून के बाद कहां थे, किस किस से मुलाक़ात हुई, उसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता| इस बीच भारतीय पत्रकार सीमा सिरोही ने 8 जून को एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी की अमेरिकन अधिकारियों से हुई गोपनीय मुलाकातों का जिक्र किया था, जिनमें से एक मुलाक़ात व्हाईट हाउस में भी हुई बताई गई थी| अमेरिका डबल गेम के लिए जाना जाता रहा है| 9 जून के एक लेख "क्या मोदी को हटाने की साजिश रच रहा है अमेरिका?" में मैंने अमेरिका में भारत विरोधी लॉबी से राहुल गांधी की मुलाकातों पर कुछ सवाल उठाए थे|

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को यह खुलासा करना चाहिए कि उनकी किस किस से मुलाक़ात हुई, क्योंकि अब यह भारत की संप्रभुता, भारत के लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप और भारत की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का सवाल खड़ा हो गया है| ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा उनके दौरे का सारा बन्दोबस्त कर रहे थे| उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा है कि राहुल गांधी के कुछ कार्यक्रम सार्वजनिक थे, तो कुछ कार्यक्रम निजी थे| क्या उन निजी कार्यक्रमों में भारत विरोधी लॉबी से मुलाकातें भी शामिल थीं?

अमेरिका की डेमोक्रटिक पार्टी में भारत विरोधी लॉबी भरी हुई है। जो बाइडेन ने उनके विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजकीय यात्रा पर बुलाने और अमेरिकी कांग्रेस में उनका दूसरी बार भाषण करवाने का फैसला किया था| बराक ओबामा उसी लॉबी के सरगना हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जब उन्हें 26 जनवरी 2015 को गणतन्त्र दिवस के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर भारत बुलाया था, तो अगले दिन 27 जनवरी को उन्होंने सीरीफोर्ट में दिए एक भाषण में इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया था|

बराक ओबामा से किया गया इंटरव्यू और उसमें नरेंद्र मोदी के बारे में पूछे गए सवाल के तार उस मोदी विरोधी पूंजीपति जॉर्ज सोरोस से जुड़े हुए हैं, जिसने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि वह भारत में मोदी को सत्ता से हटाने के लिए एक अरब डॉलर अर्थात 8000 करोड़ रूपए खर्च करेंगे| इसका मतलब यह है कि जॉर्ज सोरोस लोकसभा के हर निर्वाचन क्षेत्र पर लगभग पंद्रह करोड़ रुपए खर्च करेंगे। भारत के विपक्ष को सिर्फ यह काम करना है कि वह चार सौ सीटों पर भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने का इंतजाम कर ले|

राहुल गांधी को पहले भाजपा के सामने विपक्षी एकता वाली मीटिंग में नहीं जाना था, लेकिन भारत लौटते ही वह 23 जून की पटना मीटिंग में गए| राहुल गांधी के भारत लौटते ही क्रिस्टीयान अमनपूर ने बराक ओबामा से इंटरव्यू किया| क्रिस्टीयान अमनपूर अमेरिका की उसी जर्नलिस्टस प्रोटेक्ट कमेटी की वरिष्ठ सलाहकार है, जिससे जार्ज सोरोस की एनजीओ और फोर्ड फाउंडेशन फंड देती है| फोर्ड फाउंडेशन भारत में कई संगठनों और आंदोलनकारियों को पैसा देती रही है, जिनमें अरविन्द केजरीवाल भी है, जिनके एनजीओ को पैसा मिलता रहा है|

जॉर्ज सोरोस और फोर्ड फाउंडेशन एक अन्य प्रोपेगंडा एनजीओ "इंटरनेशनल विमेंस मीडिया फाउंडेशन" को भी फंड देते हैं। क्रिस्टीयान अमनपूर इसकी भी वरिष्ठ सलाहकार हैं| इस फाउंडेशन ने भारत की लेफ्ट विचारधारा की महिला पत्रकारों को भी खूब विदेश भ्रमण करवाया है| 22 जून को ही वाशिंगटन पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ दो पेज का विज्ञापन छपा था, जिन्हें अमेरिका के आठ एनजीओ ने मिल कर छपवाया था। इन आठ एनजीओ में ये दोनों प्रोपेगंडा एनजीओ भी शामिल थे, जिनकी बोर्ड मेम्बर और सीनियर एडवाईजर क्रिस्टीयान अमनपूर हैं| विज्ञापन देने वाले बाकी सभी छह एनजीओ भी वे ही थे, जिन्हें जार्ज सोरोस फंडिंग करते हैं|

तो फिर क्या बराक ओबामा को भी जार्ज सोरोस फंडिंग करते रहे हैं ? तो इसका जवाब है, हां| जॉर्ज सोरोस ने ओबामा फाउंडेशन को भारी भरकम फंड दिया है| जॉर्ज सोरोस ने अपनी ओपन सोसाइटी फाउंडेशन अपने बेटे अलेक्जेंडर सोरोस को सौंप दी है| अलेक्जेंडर सोरोस के बराक ओबामा के साथ बहुत ही घनिष्ट संबंध हैं, उसने भी ओबामा फाउंडेशन को फंड दिया है| ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के वाईस प्रेजिडेंट सलील शेट्टी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के समय उनके साथ दिखाई दिए थे, जिसका फोटो खूब वायरल हुआ था| तब भी यह सवाल उठा था कि क्या भारत जोड़ो यात्रा का सारा खर्चा जॉर्ज सोरोस उठा रहे हैं|

राहुल गांधी के अमेरिका दौरे के समय ज्यादातर सार्वजनिक कार्यक्रमों का इंतजाम वही लोग देख रहे थे, जो जॉर्ज सोरोस के संगठनों से जुड़े हैं| वहीं नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के समय जॉर्ज सोरोस से जुड़े संगठनों ने मोदी विरोधी प्रदर्शनों का भी आयोजन किया था| यही लोग पाकिस्तानियों के साथ मिल कर अमेरिका और ब्रिटेन में हिन्दू विरोधी प्रदर्शन भी करते रहते हैं|

भारत विरोधी विदेशी तत्व भारत के 2024 के लोकसभा चुनावों को प्रभावित करने की कोशिशों में जी जान से जुट चुके हैं| भारत में जो लोग उनके एजेंडे को पूरा करने में लगे हैं, उनमें से ज्यादातर लोगों को पता भी नहीं होगा कि वे किन लोगों के खतरनाक एजेंडे पर काम कर रहे हैं| लोकतंत्र बचाने के नाम पर भारत के लोकतंत्र को ही पटरी से उतारने की कोशिश शुरू हो चुकी है| जो लोग 2024 के चुनाव को आख़िरी चुनाव बता रहे हैं, वे बाहरी हाथों में खेल कर भारत के लोकतंत्र को पटरी से उतारने की कोशिशों में जुटे हैं|

अमेरिका की बहुत बड़ी लॉबी न तो भारत को मजबूत होता देखना चाहती है, न हिन्दू एजेंडे पर काम करने वाली मोदी सरकार को सत्ता में रहने देना चाहती है| इस लॉबी के ज्यादातर सदस्य वहां की डेमोक्रेटिक पार्टी से ही जुड़े हैं| कुल मिलाकर बात यह है कि भारत के लोकतंत्र पर सचमुच खतरे के बादल मंडरा रहे हैं| लेकिन यह खतरा विदेशी तत्वों और उनके एजेंटों से है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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