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Caste Census of Third Gender: किन्नरों को फिर पीछे धकेल देगी जातीय जनगणना

Caste Census of Third Gender: किन्नरों को जाति कोड देकर गलत किया गया है। यह उनके साथ भेदभाव और पक्षपात करने जैसा है। उन्हें किसी जाति के खाने में डालने का अर्थ उनसे परिवार के भीतर रहने का हक छीन लेना है।

concern on Caste Census of Third Gender Caste Census in bihar

Caste Census of Third Gender: 15 अप्रैल, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए किन्नरों को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी थी। लैंगिक पहचान किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद अहम होती है। ऐसे में किसी भी फॉर्म में जेंडर के दो कॉलम, स्त्री और पुरुष के साथ ही जेंडर का एक तीसरा कॉलम यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति का वजूद स्वीकार्य है, संविधान सबको समान अवसर प्रदान करता है। किन्नरों को समाज में फिर से उनका सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कई सारी हिदायतें भी दी गई थीं, लेकिन अफसोस है कि इस दिशा में कुछ ठोस काम नहीं हो सके।

15 अप्रैल से बिहार में शुरू होगा जातीय जनगणना का दूसरा चरण

इस ऐतिहासिक फैसले के बाद नौ साल हो गए हैं, लेकिन समाज में थर्ड जेंडर की स्थिति कुछ ज्यादा बदली नहीं है। समाज और सरकारें अभी भी इस वर्ग के प्रति संवेदनशील रवैया नहीं रखती। जिस राज्य में पहला किन्नर महोत्सव मनाया गया, किन्नरों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कई प्रयास किए गए, बीते बरस राज्य पुलिस में किन्नरों की सीधी नियुक्ति का रास्ता भी खुला। किन्नरों को पहचान पत्र देने और उनका डेटा बेस तैयार करने का काम शुरू हुआ। अब उसी राज्य में जातीय जनगणना से किन्नर समाज आहत है।

बात बिहार की हो रही है। बिहार ने जातीय जनगणना की तैयारी कर ली है। अलग-अलग जातियों के लिए कास्ट कोड तय किया गया है। सरकार ने किन्नर समुदाय को भी जाति मानकर उसका एक कास्ट कोड तय कर दिया। किन्नर समुदाय या थर्ड जेंडर कम्युनिटी के लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें जाति नहीं, जेंडर माना जाए। यह भी अजीब इत्तेफाक है कि जाति आधारित गणना का दूसरा चरण 15 अप्रैल से ही शुरू होने जा रहा है। पहले चरण में सभी मकानों की गिनती की गई, अब इस चरण में जाति आधारित सवाल भी पूछे जाएंगे।

किन्नर जेंडर हैं, जाति नहीं!

बता दें कि 2014 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किन्नर समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के समान ही हैं, ऐसे में उन्हें शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आरक्षण दिया जाना चाहिए। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस तीसरे वर्ग की समस्याओं को समझने के लिए जागरूकता अभियान की जरूरत भी बताई थी। सरकारें तब जागरूक कर सकती हैं, जब वे खुद जागरूक हों। सरकार को चाहिए था कि थर्ड जेंडर को जाति कोड जारी करने से पहले इस वर्ग के प्रतिनिधियों से सलाह-मशविरा करती।

किन्नर समुदाय के लोगों का मानना है कि हमारे समुदाय में अलग-अलग जाति और धर्म के लोग शामिल हैं, ऐसे में हम एक जाति कैसे हो सकते हैं! हम एक विशेष जेंडर समूह में आते हैं। ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट रेशमा प्रसाद कहती हैं कि जातीय जनगणना करवाना ही एक बड़ा अपराध है। उन्होंने सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी है।

संवेदनहीन तरीका

इंडियन साइकैट्रिक सोसायटी के अध्यक्ष डॉ विनय कुमार कहते हैं कि जातिगत जनगणना का कॉन्सेप्ट आधुनिक नहीं है। मेरे विचार से किन्नरों को जाति कोड देकर गलत किया गया है। यह उनके साथ भेदभाव और पक्षपात करने जैसा है। उन्हें किसी जाति के खाने में डालने का अर्थ उनसे परिवार के भीतर रहने का हक छीन लेना है। इस ठप्पे से वे और भी हाशिए पर चले जाएंगे।

आज जरूरत इस बात की है कि परिवार उन्हें स्वीकार करे और समाज उन्हें किसी परिवार के ट्रांसजेंडर सदस्य के रूप में मान्यता दे। आधुनिक सोच तो यह है। जाति का ठप्पा लगाने से स्टिग्मा बढ़ेगा। ये संवेदनहीन तरीका है, यह मन पर अच्छा असर नहीं कर सकता। वे पहले से ही अपमानित और कुंठित हैं। शोध यह बताते हैं उनमें मानसिक रोग और नशाखोरी की दर आम लोगों की तुलना में तीन गुनी से भी अधिक है। और वे इलाज के लिए भी नहीं जा पाते। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के प्रयास जारी होने चाहिए।

यह किन्नरों के विवाह का वक्त भी है

किन्नरों को समाज भले ही दूर रखता हो, लेकिन उनकी दुनिया में झांकने को लालायित रहता है। उनकी शव यात्रा और उनके विवाह, दोनों ही खबर बनते हैं। तमिलनाडु के कूथन्दावर मंदिर में किन्नर एक दिन के लिए विवाह भी करते हैं, अगले दिन विधवा हो जाते हैं। कूवागम उत्सव में ऐसा होता है, इस बरस यह उत्सव 18 अप्रैल से शुरू हो रहा है। मुख्य उत्सव एक से तीन मई तक रहेगा। इस उत्सव को लेकर एक पौराणिक गाथा भी है।

महाभारत युद्ध से पहले पांडवों ने विजय के लिए मां काली की पूजा का आयोजन किया। इसमें शूरवीर राजकुमार की बलि देनी थी। अर्जुन और नागकन्या उलुपी का पुत्र अरावन बलि देने को तैयार हुआ, पर एक शर्त रखी। वह विवाह करना चाहता था, तब श्रीकृष्ण ने मोहिनी रूप धरा और अरावन से विवाह किया। अगले दिन अरावन की बलि दे दी गई। कृष्ण ने पुरुष होकर स्त्री रूप धरा इसलिए किन्नर इस उत्सव को विशेष रूप से मनाते हैं। एक दिन के लिए विवाह करते हैं और अगले दिन सारे सिंगार उतारकर विधवा हो जाते हैं।

यह तो महज आस्था की एक रस्म है, पर असल में भी किन्नरों के जीवन में यही हो रहा है, एक दिन खुशी दिखती है, फिर दूसरे ही पल छिन जाती है। हम तभी उन्हें देखना पसंद करते हैं, जब हमें उनकी दुआओं की जरूरत होती है।

यह भी पढ़ें: Same Gender Marriage: केंद्र ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का किया विरोध, SC में दायर किया हलफनामा

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