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Aurangzeb and Tipu: अतीत को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का समय

इतिहास में अगर कोई ऐसा चरित्र है जो वर्तमान में भी दो समुदायों में टकराव पैदा कर सकता है तो उसे वर्तमान में खींचकर लाने के बजाय इतिहास में ही दफन कर देना चाहिए। इसी में भारत की भलाई है।

Aurangzeb and Tipu: महाराष्ट्र के अहमदनगर एवं कोल्हापुर में हुई हिंसक झड़पों के बाद एक बार फिर से औरंगज़ेब व टीपू सुल्तान चर्चा के केंद्र में हैं। ग़ौरतलब है कि बीते 6 जून को कोल्हापुर के कुछ युवाओं द्वारा औरंगजेब व टीपू सुल्तान की तस्वीर के साथ आपत्तिजनक ऑडियो संदेश स्टेटस में लगाए गए थे, जिसके विरोध में 7 जून को कुछ हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किया।

हालांकि राज्य प्रशासन की सक्रियता से स्थिति को नियंत्रण में ले लिया गया लेकिन अभी कोल्हापुर का मामला शांत हुआ ही था कि अब नवी मुंबई में एक मुस्लिम द्वारा अपनी प्रोफाइल पिक्चर के रूप में औरंगजेब का फोटो लगाने का विवाद सामने आ गया है। उस व्यक्ति अली मोहम्मद के खिलाफ पुलिस ने शिकायत भी दर्ज कर ली है ताकि फिर से कोई विवाद पैदा न हो।

concern on Aurangzeb and Tipu Sultan after violent clashes in Ahmednagar and Kolhapur

ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसे विवाद न पहली बार हो रहे हैं और न ही इसे आखिरी समझा जा सकता है। एक ओर कुछ लोग जहां औरंगज़ेब व टीपू सुल्तान को नायक की तरह पेश करते हैं, वहीं दूसरी ओर देश के अधिसंख्य जन इन्हें खलनायक की तरह देखते हैं। अतीत के किसी शासक को नायक या खलनायक मानने के पीछे ऐतिहासिक स्रोतों एवं साक्ष्यों के अलावा जनसाधारण की अपनी भी एक धारणा होती है। वह धारणा रातों-रात नहीं बनती, अपितु उसके पीछे समाज के मन में उस शासक द्वारा किए गए कार्यों की भी महती भूमिका होती है।

तो क्या औरंगजेब और टीपू सुल्तान ऐसे ही लोककल्याणकारी शासक थे जो प्रजा में बिना भेदभाव के शासन करते थे? दुर्भाग्य से इन दोनों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज इसकी गवाही नहीं देते। औरंगज़ेब की कट्टरता को दर्शाने के लिए 9 अप्रैल 1669 को उसके द्वारा ज़ारी राज्यादेश पर्याप्त है, जिसमें उसने सभी हिंदू मंदिरों एवं शिक्षा-केंद्रों को नष्ट करने के आदेश दिए थे। इस आदेश को काशी-मथुरा समेत उसकी सल्तनत के सभी 21 सूबों में लागू किया गया था। औरंगजेब के इस आदेश का जिक्र उसके दरबारी लेखक मुहम्मद साफी मुस्तइद्दखां ने अपनी किताब 'मआसिर-ए-आलमगीरी' में भी किया है। 1965 में प्रकाशित वाराणसी गजेटियर की पृष्ठ-संख्या 57 पर भी इस आदेश का उल्लेख है।

इतिहासकारों का मानना है कि इस आदेश के बाद गुजरात का सोमनाथ मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशवदेव मंदिर, अहमदाबाद का चिंतामणि मंदिर, बीजापुर का मंदिर, वडनगर का हथेश्वर मंदिर, उदयपुर में झीलों के किनारे बने 3 मंदिर, उज्जैन के आसपास के मंदिर, चितौड़ के 63 मंदिर, सवाई माधोपुर में मलारना मंदिर, मथुरा में राजा मानसिंह द्वारा 1590 में निर्माण कराए गए गोविंद देव मंदिर समेत देश भर के सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर ध्वस्त करा दिए गए। मज़हबी ज़िद व जुनून में उसने हिंदुओं के त्योहारों एवं धार्मिक प्रथाओं को भी प्रतिबंधित कर दिया था। 1679ई. में उसने हिंदुओं पर जजिया कर लगाकर, उन्हें दोयम दर्ज़े का जीवन जीने को विवश कर दिया।

तलवार या शासन का भय दिखाकर औरंगजेब ने बड़े पैमाने पर हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया। इस्लाम न स्वीकार करने पर उसने निर्दोष एवं निहत्थे हिंदुओं का क़त्लेआम करवाने में भी कोई संकोच नहीं किया। मज़हबी सोच व सनक में उसने सिख धर्मगुरु तेगबहादुर जी का सिर कटवा दिया, गुरुगोविंद सिंह जी के साहबजादों को जिंदा दीवारों में चिनबा दिया, संभाजी को अमानुषिक यातनाएँ देकर मरवाया। जिस देश में श्रवण कुमार और देवव्रत भीष्म जैसे पितृभक्त पुत्रों और राम-भरत-लक्ष्मण जैसे भाइयों की कथा-परंपरा प्रचलित हो, वहाँ अपने बूढ़े एवं लाचार पिता को कैद में रखने वाला तथा अपने तीन भाइयों दारा, शुजा और मुराद की हत्या कराने वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्ति का आदर्श या नायक कैसे हो सकता है?

औरंगजेब पर सवाल उठने पर कुछ लोग सम्राट अशोक का उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि उन्होंने भी अपने परिवार के लोगों का दमन किया था। लेकिन सम्राट अशोक के अपवाद को उदाहरण की तरह प्रस्तुत करने वाले लोग स्मरण रखें कि लोक में उसकी व्यापक स्वीकार्यता का मूल कारण उसका प्रायश्चित-बोध एवं मानस परिवर्तन के बाद सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा जैसे शाश्वत मानवीय सिद्धांतों के प्रति उपजी उसकी दृढ़ निष्ठा थी, न कि साम्राज्य-विस्तार की लालसा।

इसी तरह टीपू सुल्तान का महिमामंडन करने वाले लोग भी उसकी क्रूरता एवं कट्टरता के विवरणों से भरे ऐतिहासिक प्रमाणों एवं अभिलेखों आदि पर एकदम मौन साध जाते हैं। 19 जनवरी, 1790 को बुरदुज जमाउन खान को एक पत्र में टीपू ने स्वयं लिखा है, 'क्या आपको पता है कि हाल ही में मैंने मालाबार पर एक बड़ी जीत दर्ज की है और चार लाख से अधिक हिंदुओं का इस्लाम में कंवर्जन करवाया है।' सईद अब्दुल दुलाई और अपने एक अधिकारी जमान खान को लिखे पत्र में वह कहता है, 'पैगंबर मोहम्मद और अल्लाह के करम से कालीकट के सभी हिंदुओं को मुसलमान बना दिया है। केवल कोचिन स्टेट के सीमावर्त्ती इलाकों के कुछ लोगों का धर्मांतरण अभी नहीं कराया जा सका है। मैं जल्द ही इसमें भी क़ामयाबी हासिल कर लूँगा।'

टीपू ने घोषित तौर पर अपनी तलवार पर खुदवा रखा था -' मेरे मालिक मेरी सहायता कर कि मैं संसार से क़ाफ़िरों (ग़ैर मुसलमानों) को समाप्त कर दूँ।' 'द मैसूर गजेटियर' के अनुसार टीपू ने लगभग 1,000 मंदिरों का ध्वंस करवाया था। स्वयं टीपू के शब्दों में, 'यदि सारी दुनिया भी मुझे मिल जाए, तब भी मैं हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने से नहीं रुकूँगा' (फ्रीडम स्ट्रगल इन केरल)। 19वीं सदी में ब्रिटिश सरकार में अधिकारी रहे लेखक विलियम लोगान की 'मालाबार मैनुअल', 1964 में प्रकाशित केट ब्रिटलबैंक की 'लाइफ ऑफ टीपू सुल्तान' आदि पुस्तकों तथा उसके एक दरबारी एवं जीवनी लेखक मीर हुसैन किरमानी के विवरणों से ज्ञात होता है कि टीपू वास्तव में एक अनुदार, असहिष्णु, क्रूर एवं अत्याचारी शासक था। ग़ैर-मुस्लिम प्रजा पर जुल्म ढाने, लाखों लोगों का जबरन धर्मांतरण करवाने तथा हजारों मंदिरों को तोड़ने के मामले में उसे दक्षिण का औरंगज़ेब कहा जाता था। आरोप तो यहाँ तक लगते हैं कि उसने अफ़ग़ान शासक जमान शाह समेत कई विदेशी शासकों को भारत पर आक्रमण हेतु आमंत्रण भी भेजा था।

फिर भी अगर बार बार स्वतंत्र भारत में औरंगजेब या टीपू सुल्तान को एक समुदाय अपने आदर्श की तरह प्रस्तुत करेगा तो इसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है, जैसा कोल्हापुर और अहमदनगर में हुआ। समरस समाज के लिए दोनों ओर से अपनी अपनी कट्टरता का त्याग करना होगा। इतिहास के ऐसे चरित्रों पर गर्व करने से सिर्फ समाज में टकराव ही पैदा होगा जिनका दामन बहुसंख्य प्रजा को लेकर दागदार रहा है।

औरंगज़ेब और टीपू सुल्तान जैसे कट्टर शासकों को नायक के रूप में स्थापित करने या ज़ोर-जबरदस्ती से बहुसंख्यकों के गले उतारने की कोशिशों की बजाय मुस्लिम समाज द्वारा रहीम, रसखान, दारा शिकोह, बहादुर शाह ज़फ़र, अशफ़ाक उल्ला खां, खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान, वीर अब्दुल हमीद एवं ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे साझे नायकों व चेहरों को सामने रखा जाये तो समाज में भाईचारा बढ़ेगा और टकराव की संभावना भी कम होगी। इससे सहिष्णुता की साझी संस्कृति विकसित होगी।

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    कट्टर शासकों या आक्रांताओं में नायकत्व देखने व ढूंढ़ने की प्रवृत्ति अंततः समाज को बाँटती है। यह जहां विभाजनकारी विषबेल को सींचती है, वहीं अतीत के घावों को कुरेदकर उन्हें गहरा एवं स्थाई भी बनाती है। अच्छा हो कि दोनों ओर के लोग ऐसे चरित्रों को इतिहास में दफन करके भूलने की कोशिश करें जिनके कारण बार बार वर्तमान में टकराव होता है। इसका प्रयास एक ओर से नहीं बल्कि दोनों समुदायों की ओर से होना चाहिए। जो नायक मान रहे हैं वो नायक मानना बंद कर देंगे तो खलनायक माननेवाले लोग भी अपने अतीत की पीड़ा को कुरेदना छोड़ देंगे।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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