Hindu Vote Bank: बेमतलब है हिन्दू वोटबैंक की मुस्लिम वोटबैंक से तुलना
Hindu Vote Bank: भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी पढ़े लिखे सेकुलर लोग अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि हिन्दू जिस तरह से भाजपा और मोदी के पीछे धर्म के नाम पर वोटबैंक बन रहे हैं, वह उन्हें एक दिन बर्बाद कर देगा। इसके पीछे उनका तर्क होता है कि पाकिस्तान में यह प्रयोग हुआ और रिलीजन को गवर्नेन्स से मिक्स कर दिया गया जिसका नतीजा पाकिस्तानी अवाम की बदहाली के रूप में सामने आया है। आज नहीं तो कल भारत के लोगों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। क्या ये तुलना सही है? क्या सचमुच भारत को भी एक दिन वैसी ही कीमत चुकानी पड़ेगी जैसी पाकिस्तान को चुकानी पड़ रही है?
लोकतंत्र का स्वभाव
हर व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा करना लोकतंत्र का बुनियादी स्वभाव होता है। इसमें कई तरह के मतभेद हो सकते हैं कि किसी लोकतांत्रिक प्रणाली में किस तरह के नियम कानून बनाये जाते हैं जिससे व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। या फिर वो मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों के कितना अनुकूल हैं। लेकिन लोकतंत्र के मूल में नागरिक होते हैं। लोकतंत्र उन्हीं के अधिकारों और कर्तव्यों में समता स्थापित करनेवाली व्यवस्था है ताकि एक नागरिक दूसरे नागरिक का शोषण न कर सके।

बहुदलीय लोकतंत्र में हालांकि इसका विकृत रुप भारत पाकिस्तान में प्रचलित हुआ और सिद्धांत रूप में हम जिन बातों का विरोध करते हैं व्यवहारगत रूप से उसी का प्रचार कर रहे होते हैं। जैसे लोकतंत्र में जाति धर्म के नाम पर नागरिकों के बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए लेकिन एक तरह के भेदभाव को खत्म करने के लिए हमारे नेताओं ने दूसरे तरह के भेदभाव को जन्म दे दिया। भारत और पाकिस्तान दोनों ही जगहों पर ये काम खूब जमकर किया गया है। भारत में अगर मॉइनारिटी और दलित अधिकारों के नाम पर वर्ग विभाजन को मजबूत किया गया तो पाकिस्तान में सुन्नी बहुसंख्यकवाद हावी हुआ और उसने दबाव डालकर अहमदिया, हिन्दू और क्रिश्चियन मॉइनारिटी को कोने में धकेलने का काम किया।
1947 के बाद से ही भारत में जहां नागरिकों के बीच भेदभाव को खत्म करने के प्रयास शुरु हुए वहीं पाकिस्तान में नागरिकों के बीच भेदभाव बढाने के प्रयास रंग लाये। शुरुआत सेकुलर और सोशलिस्ट तरीके से हुई जो वर्गीय और जातीय विभाजन पर जोर दे रही थी लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में जिस हिन्दू बहुसंख्यकवाद का उदय हुआ वह सबको हिन्दू बताकर उन्हें एकता के सूत्र में बांध रहा था। इसके उलट पाकिस्तान में अहमदिया, शिया को गैर मुस्लिम बताकर मुसलमानों से ही अलग थलग किया गया तो हिन्दू, क्रिश्चियन, सिख और अहमदिया को गैर मुस्लिम कहकर पाकिस्तान के शीर्ष पदों पर पहुंचने से ही कानूनन रोक दिया गया।
इसलिए भारत का हिन्दू बहुसंख्यकवाद जहां नागरिक एकता को मजबूत करता है वहीं पाकिस्तान का सुन्नी बहुसंख्यकवाद मुसलमानों में ही भेद पैदा करता है। इसलिए भारत के बहुसंख्यकवाद को पाकिस्तान के बहुसंख्यकवाद से तुलना करना ही बेमतलब और गैर जरूरी है। अब तो आरएसएस भी यह कहने लगा है कि हिन्दू की वृहद पहचान में ईसाई और मुस्लिम भी शामिल हैं क्योंकि यह इस धरती से जुड़ी पहचान है। जबकि पाकिस्तान में सुन्नी बहुसंख्यकवाद अहमदिया को मुसलमान मानने तक तो तैयार नहीं है।
संगठनवाद का प्रभाव
लोकतंत्र एक ऐसी विकेन्द्रित व्यवस्था है जो संगठित रूप से काम करती है। यह एक विरोधाभास है लेकिन सच है। लोकतंत्र दलों के जरिए संचालित होते हैं और दल एक प्रकार के संगठित गिरोह में परिवर्तित हो जाते हैं। जहां कहीं भी संगठनवाद प्रभावी होगा वहां सबसे पहला खतरा लोकतंत्र के सामने ही आता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा एक संगठन से निकली पार्टी है जिसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। इसलिए अगर भाजपा धार्मिक गोलबंदी करती है जहां मतदाता विवेक की बजाय भीड़ की मानसिकता से वोट करता है तो लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा होता है।
लेकिन ऐसा है नहीं। आरएसएस हिन्दुओं के बीच संगठन का काम करता है लेकिन वह समूचे हिन्दू समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता। ऐसे लाखों करोड़ों हिन्दूवादी हैं जो आरएसएस से नहीं जुड़े हैं लेकिन राजनीति में धर्म के अपमान को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। क्या उनको भी आरएसएस का वर्कर कहा जा सकता है? नहीं। वो हिन्दुत्व की राजनीति को पसंद तो करते हैं, राजनीतिक रूप से भाजपा के समर्थक भी हैं लेकिन आरएसएस से उनका कोई जुड़ाव नहीं है। इसलिए इस बात की पूरी संभावना हमेशा है कि वो मुस्लिमों की तरह किसी फतवे से प्रभावित होकर वोट नहीं करेंगे।
धर्म के नाम हिन्दुओं को उस तरह कट्टर बनाया ही नहीं जा सकता जैसा कि मुस्लिमों को बनाया जाता है। मुस्लिमों में मुल्ला मौलवी उन्हें जो समझाते हैं वो मान जाते हैं और उसी हिसाब से व्यवहार करते हैं। जबकि हिन्दुओं को राजनीतिक और सामाजिक रूप से कोई गवर्न करने की गारंटी नहीं ले सकता। असंगठित जीवन जीने वाले स्वभाव के बाद भी हिन्दू में साथ आने की सामूहिक चेतना तो जाग रही है लेकिन वह मुसलमानों की तरह किसी भीड़तंत्र में परिवर्तित नहीं हो रही है। यही मुस्लिम वोटबैंक और हिन्दू वोटबैंक का बुनियादी अंतर है।
शासन के सेकुलर तंत्र से छेड़छाड़ नहीं
भाजपा हो या अब दस साल से नरेन्द्र मोदी का शासन। उन पर हिन्दू कट्टरता का आरोप तो विपक्ष बहुत लगाता है लेकिन एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है जब प्रशासनिक निर्णय में उन्होंने धार्मिक भेदभाव किया हो। इसके उलट जो मॉइनॉरिटी स्कीम हैं वो पहले की भांति जस की तस जारी हैं। उनका बजट भी घटाने की बजाय बढाया ही गया है। हां, सामान्य प्रशासन में जो अल्पसंख्यक तुष्टिकरण होता था, उसे जरूर खत्म करने का प्रयास किया गया है।
धर्म और दीन का बुनियादी अंतर
असल में धर्म की दीन से तुलना ही एक गंभीर वैचारिक समस्या है। इस्लाम एक दीन या सिस्टम है जो इस्लामिक कायदे वाले शासन की वकालत करता है। इस शासन में मुस्लिम और गैर मुस्लिम का भेद किया जाता है। मुस्लिमों के लिए एक इस्लामिक शासन में जो लाभ रहते हैं उससे गैर मुस्लिमों को अलग रखा जाता है। इसलिए इस्लामिक स्टेट में नागरिकों के बीच भेदभाव उसका बुनियादी चरित्र है। इस्लामिक शासन का मूल शरीयत के कानून हैं जो लोकतंत्र को स्वीकार नहीं करता। पाकिस्तान इसी का शिकार हुआ। जैसे जैसे वो इस्लामिक कायदों को अपने यहां लागू करते गये लोकतंत्र का मूल चरित्र ही खत्म होता चला गया।
इसके उलट धर्मराज्य राजा के लिए एक लोककल्याणकारी शासन की अवधारणा है जो प्रजा प्रजा में कोई भेद नहीं करता। धर्मराज्य की व्यवस्था में प्रजा या नागरिक को अधिक से अधिक स्वतंत्रता होती है और राजा को कर्तव्यों के अधीन रखा जाता है। हिन्दू जिस धर्मराज्य की बात करते हैं उसमें प्रजा या नागरिक के जीवन में राज्य का न्यूनतम हस्तक्षेप होता है। जबकि इस्लामिक शासन में प्रजा को इस्लामिक सिद्धांतों का कठोरता से पालन करवाया जाता है और नागरिक जीवन की कोई स्वतंत्रता प्रदान नहीं की जाती।
इसलिए अगर हिन्दू वोटबैंक बनता है तो उससे लोकतंत्र सुरक्षित और लोककल्याण सुनिश्चित होता है। किसी भी रूप में इसकी तुलना ईसाई, इस्लामिक या कम्युनिस्ट शासन से नहीं की जा सकती जो नागरिकों की सारी स्वतंत्रता अपने पास गिरवी रख लेते हैं। जो लोग हिन्दू वोटबैंक की तुलना इस्लामिक वोटबैंक से करके भविष्य में पाकिस्तान की तरह भारत के बर्बाद होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं वो या तो इस्लामिक शासन और धर्मराज्य के बारे में कुछ जानते नहीं या फिर अपने किसी एजंडे के तहत जानबूझकर झूठ बोल रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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