Coalition Politics: क्या फिर लौट आयी रामो वामो की राजनीति?
Coalition Politics: नब्बे के दशक में भारत में जब चुनाव आयोग पारदर्शिता और निष्पक्षता का कीर्तिमान स्थापित कर रहा था तब भारत में एक नए तरह की राजनीति ने जन्म ले लिया था। यह राजनीति गठबंधन की थी, और गठबंधन के सामने कांग्रेस को हराने का लक्ष्य था। 1989 में कई क्षेत्रीय दलों का गठबंधन हुआ और उसका नाम राष्ट्रीय मोर्चा हुआ। वामपंथी दलों के गठबंधन का नाम वाममोर्चा था। इस तरह रामो-वामो ने मिलकर 1989 में कांग्रेस को सरकार बनाने से वंचित कर दिया था।
पहले साठ के दशक में और फिर नब्बे के दशक में देश की राजनीति में गठबंधन की राजनीति का उदय हुआ। साठ के दशक में कई राज्यों में गठबंधन की सरकार बनी थी। उस गठबंधन में जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टियां शामिल थी। तब कांग्रेस की तानाशाही से मुकाबला था। उस दौरान राजनीति में कुछ मुद्दों पर सहमति और कुछ मुद्दों पर दोस्ताना संघर्ष का फार्मूला निकाला गया। सरकार चलाने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम का मॉडल तय किया गया। यहां से राजनीति में वैचारिक समझौते का दौर शुरू होता है, जो आज तक जारी है।

गठबंधन की राजनीति से सबसे ज्यादा नुकसान 'वैचारिकता की राजनीति' को हुआ। रातों रात राजनीतिक दलों और राजनेताओं की वैचारिक-राजनीतिक निष्ठा में बदलाव आया। दलबदल का दौर शुरू हुआ। राजनीति में विचार की कीमत मिट्टी के बराबर भी नहीं रह गयी। सारी राजनीतिक प्रतिबद्धता मंत्री बनने औऱ मनचाहा विभाग पाने तक सिमट गई। सरकार में शामिल होने के लिए कुछ कॉमन मुद्दों को खोज लिया जाता रहा। हालांकि इस दौर में देश की राजनीतिक परिघटना में 'सेकुलरवाद', 'राष्ट्रवाद' और 'सामाजिक न्याय' की राजनीति का भी उभार हुआ। अब राजनीति में आप इन तीन तत्वों में से किसी के पैरोकार हैं, तो बाकी किसी चीज की जरूरत नहीं थी।
2014 आते-आते 'राष्ट्रवाद' की राजनीति ने 'सेकुलरवाद' और 'सामाजिक न्याय' की राजनीति की सीमारेखा तय कर दी। 2014 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की प्रचंड जीत ने न सिर्फ राष्ट्रवाद को राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया बल्कि गठबंधन की राजनीति को भी महत्वहीन कर दिया। अब जबकि राष्ट्रवाद के पूर्ण बहुमत वाली राजनीति के एक दशक पूरे होने जा रहे हैं तब एक बार फिर चर्चा तेज है कि 2024 के आमचुनाव में क्या होगा?
अमेरिका यात्रा के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक सवाल का जवाब देते हुए कहा है कि "केवल गठबंधन बनाकर भाजपा-एनडीए को नहीं हराया जा सकता है। इसके लिए एक विचार और विजन की जरूरत है।" जिस समय राहुल गांधी अमेरिका में भाजपा को हराने के लिए विचार और विजन की आवश्यकता बता रहे थे, उसी समय बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी दलों की एकता के लिए गठबंधन की बैठक करने की कोशिश कर रहे थे। एक बार टल चुकी विपक्षी दलों की ये बैठक अब 23 जून को होने जा रही है। कई दल इसमें शामिल होंगे और कई दलों ने बैठक में शामिल होने से इंकार भी कर दिया है।
बंगाल की तृणमूल कांग्रेस, राजद, जेडीयू, एनसीपी, डीएमके, आम आदमी पार्टी और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना जैसी कई पार्टियां बैठक में शामिल हो रही हैं। लेकिन बीजू जनता, बीआरएस, टीडीपी, बसपा जैसे दल विपक्ष में रहने के बावजूद गठबंधन में शामिल नहीं हो रहे है। ऐसे में सवाल उठता है कि कुछ विपक्षी दल विपक्षी दलों के गठबंधन में शामिल क्यों नहीं हो रहे हैं?
इसके दो कारण हैं। पहला कारण राजनीतिक है और दूसरा कारण वैचारिक है। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने कांग्रेस समेत अन्य दलों को राजनीतिक शिकस्त के साथ-साथ वैचारिक रूप से भी धराशायी कर दिया था। यह सच है कि भाजपा वैचारिक रूप से हिंदुत्व की पैरोकार है, और शिवसेना को छोड़ दें तो दूसरा कोई भी दल हिन्दुत्व की राजनीति नहीं करता। इसलिए 2014 और 2019 की बंपर जीत से भाजपा ने सेकुलर दलों के सामने वैचारिक धरातल पर कड़ी चुनौती पेश की।
अमेरिका दौरे के दौरान राहुल गांधी ने कहा है कि "मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी अगले चुनाव में बहुत अच्छा करेगी।" इसका कारण वह कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता और कल्याणकारी राजनीति बताते हैं। कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस के भविष्य की राजनीति का संकेत भी मिल रहा है। 2024 के आम चुनाव में मुसलमान, दलित और अति पिछड़े कांग्रेस की तरफ जा सकते हैं। इसीलिए बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, भारत राष्ट्र समिति और तेलगूदेशम जैसी पार्टियां कांग्रेस से गठबंधन करने को इच्छुक नहीं है।
मतलब कुछ छोटे दलों को अब ये डर सताने लगा है कि कांग्रेस के उभार से जितना नुकसान बीजेपी को होगा उससे अधिक नुकसान उन्हें हो सकता है। जबकि कुछ दल यह समझ रहे हैं कि यूपीए या एनडीए में किसी एक के साथ जाकर ही उनका अस्तित्व बचेगा। ऐसे में कांग्रेस गठबंधन की राजनीति को व्यावहारिक जरूरत की बजाय वैचारिक आधार दे रही है ताकि छोटे दलों से गठजोड़ स्थाई हो सके।
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 421 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 52 सीटों पर जीत हासिल की थी। बीजेपी ने 2019 लोकसभा चुनाव में 437 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 303 पर जीत हासिल की थी। बीजेपी को लोकसभा चुनाव में 38 फीसद वोट मिले थे, जबकि एनडीए गठबंधन को 353 सीटों पर करीब 45 फीसद वोट मिला था। जबकि कांग्रेस को लगभग 20 प्रतिशत और यूपीए को 26 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। 2019 के आम चुनाव में एनडीए और यूपीए के अलावा 29 प्रतिशत वोट क्षेत्रीय दलों के खाते में गया था।
इस तरह दो-दो आम चुनाव में मात खाने के बाद कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों को यह आभास हो गया है कि चुनावी हार-जीत के लिए व्यावहारिक गठबंधन बनाने की बजाए वैचारिक गठबंधन बनाना होगा तभी भाजपा-एनडीए से लड़ा जा सकता है। कांग्रेस की नजर में 55 प्रतिशत गैर एनडीए वोट है। ऐसी परिस्थितियों में अधिकांश क्षेत्रीय दल किसी एक गठबंधन के साथ होने की तैयारी में लगे हैं।
कांग्रेस जहां वैचारिक आधार पर गठबंधन तैयार कर रही है वहीं बीजेपी व्यावहारिक धरातल पर एनडीए का बिखरा कुनबा जोड़ने में जुट गयी है। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना बन रही है कि 2024 का आम चुनाव देश में बहुत सारे दलों के बीच होने के बजाय दो गठबंधनों के बीच होगा। नब्बे के दशक में जो रामो वामो की राजनीति शुरु हुई थी उसे नरेद्र मोदी के उभार ने खत्म कर दिया था। लेकिन अब एक बार फिर वैचारिक बनाम व्यावहारिक मोर्चा बनना शुरु हो चुका है। इसमें एक तरफ एनडीए है दूसरी तरफ यूपीए। जो इन दोनों से दूर होंगे उनके लिए अगला आम चुनाव कठिन ही रहने वाला है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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