Coaching Guidelines: कितनी सफल होगी कोचिंग के कारोबार पर लगी लगाम?
Coaching Guidelines: देश के प्राइवेट कोचिंग सेंटर्स के लिए केंद्र सरकार की हालिया गाइडलाइंस ने इस बेलगाम-बेखौफ इंडस्ट्री के होश उड़ा दिए हैं।
सेंटर के पंजीकरण की अनिवार्यता, सुरक्षा मानकों का पालन, छात्रों को मनोवैज्ञानिक और मेंटल सपोर्ट उपलब्ध कराना, अनाप-शनाप फीस वसूली पर रोक, बीच में कोचिंग छोड़ने वाले स्टुडेंट्स की फीस वापसी जैसे अनेक निर्देशों के बीच सबसे सख्त है, 16 वर्ष से कम उम्र वाले छात्रों को प्रवेश देने पर पाबंदी।

कोचिंग सेंटर के रजिस्ट्रेशन और रेगुलेशन 2024 के अंतर्गत तैयार की गई ये गाइडलाइंस बहुत आदर्श जान पड़ती हैं, लेकिन इन्हें अमल में ला पाने में बहुत सारी व्यावहारिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है। अभी तक इस विशाल उद्योग के लिए कोई नियम-कायदे नहीं थे। इसका फायदा उठाकर कोई भी, कभी भी, कहीं भी अपनी ज्ञान की दुकान खोलकर कारोबार शुरू कर सकता है।
इसके चलते देश भर में, कामयाबी के सपने बेचने की दुकानों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। आज कोचिंग सेंटरों की संख्या का सही-सही अंदाजा लगाना मुश्किल है। लेकिन, महानगरीय कॉलोनियों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक, जिस तरह से ये हर जगह कुकुरमुत्ते की तरह उगे नजर आते हैं, उसे देखते हुए लगता है कि इनकी तादाद लाखों में होगी।
इनफिनियम ग्लोबल रिसर्च रिपोर्ट, 2023 में बताया गया है कि भारत में कोचिंग उद्योग का मौजूदा सालाना कारोबार करीब अट्ठावन हजार करोड़ रुपये का है, जो लगातार फल-फूल रहा है। अगले पॉंच सालों में इसके बढ़कर लगभग एक लाख चौंतीस हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन नेशनल एजुकेशन की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 85 लाख छात्र विभिन्न प्रकार की कोचिंग ले रहे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस का 2020 का सर्वेक्षण बताता है कि हमारे यहॉं कक्षा 11 और 12 के लगभग 25% छात्र अलग-अलग विषयों के लिए कोचिंग कक्षाओं में अध्ययनरत हैं।
नए दिशा-निर्देशों में सोलह वर्ष से कम आयु वाले बच्चों पर विशेष ध्यान रखा गया है। ऐसे कितने बच्चे कोचिंग ले रहे हैं, इसके सटीक आंकड़ें जुटा पाना कठिन है, लेकिन इतना तय है कि यह संख्या कोचिंग के कारोबार को बहुत ज्यादा प्रभावित करने वाली होगी। और इस धंधे में लगा एजुकेशन माफिया, आसानी से इन गाइलाइंस को लागू होने देगा, इसकी संभावनाएं कम ही हैं। साथ ही 16 से कम उम्र वाले बच्चों के ऐसे अभिभावकों की संख्या भी काफी बड़ी हो सकती है, जो अपने बच्चों की पढ़ाई कोचिंग सेंटरों के हवाले कर निश्चिंत हो जाते हैं। वे भी शायद इन दिशा-निर्देशों का समर्थन न करें।
जैसा कि अपेक्षित ही था, गाइडलाइंस को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इस सख्ती का समर्थन करने वालों का तर्क है कि 16 वर्ष से कम उम्र के छात्रों में प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े दबाव और प्रतिस्पर्द्धा को झेलने के लिए पर्याप्त मानसिक और भावनात्मक परिपक्वता नहीं होती। उन्हें चिंता और अवसाद से बचाने के लिए ऐसी सख्ती जरूरी है। इससे कोचिंग इंडस्ट्री की जवाबदेही तय की जा सकेगी और उनके द्वारा किए जाने वाले भ्रामक दावों और शोषण पर लगाम लगाना संभव होगा। साथ ही इससे छात्रों को नियमित स्कूली शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा, जो मुख्य विषयों में उनकी नींव मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि इसके विपक्ष में दिए जाने वाले तर्क भी कुछ कम नहीं हैं। जैसे कि सभी छात्रों का बौद्धिक स्तर एक सरीखा नहीं होता। कई को विषय की समझ के लिए सिर्फ स्कूली शिक्षा पर्याप्त नहीं होती, तो उन्हें कोचिंग लेनी पड़ती है। इससे वे अधिक सीखने के अवसर से वंचित हो जाएंगे। दूसरा तर्क यह है कि इस तरह के प्रतिबंधों से, शिक्षकों और कर्मचारियों के रूप में सेवाएं दे रहे हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित होगी।
आजीविका और जीवन, अगर दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो अधिकतर लोग जीवन को ही चुनेंगे। सरकार के इस कदम का मूल भी छात्र आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाएं हैं। सामाजिक चिंतकों का मत है कि छात्रों की आत्महत्याओं के लिए उनके माता- पिता भी कम जिम्मेदार नहीं होते। वे बच्चों से उनकी क्षमता से ज्यादा उम्मीद लगा लेते हैं। इन अपेक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं का बोझ अक्सर बच्चे नहीं उठा पाते। रही-सही कसर कोचिंग संस्थानों की अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शिक्षण प्रणाली पूरा कर देती है, जिसके तहत बच्चों पर किसी भी हालत में सिर्फ अच्छे नंबर लाने का दबाव बनाया जाता है, जिसे कच्ची उम्र के बच्चे झेल नहीं पाते। दबाव में आकर वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
इनके अलावा भी बहुत सारे प्रश्न हो सकते हैं, जिन पर विचार किया जाना जरूरी है। जैसे कि एक अहम मसला यह है कि शिक्षा, केंद्र और राज्य, दोनों की अनुसूची के अंतर्गत आने वाला विषय है। ऐसे में इन दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करने वाले कानून बनाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता होगी, जो कि आसान नहीं है।
बिहार, गोवा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और मणिपुर जैसे कई राज्यों में निजी कोचिंग और ट्यूशन कक्षाओं के रेगुलाइजेशन के लिए एक कानूनी ढांचा है। राजस्थान सरकार द्वारा भी पिछले साल इस संबंध में राजस्थान कोचिंग संस्थान (नियंत्रण और विनियमन) बिल, 2023 पेश किया गया था। भविष्य में आगे और भी राज्य इस श्रंखला में शामिल हो सकते हैं।
सच तो यह है कि यह फैसला अभी एकदम नया है और इसके दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन समय के साथ ही किया जा सकेगा। लेकिन, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि एक बच्चे के सुचारू विकास के लिए कोचिंग सेंटरों की शरण लेना एक अच्छा विकल्प नहीं है। इन्हें बढ़ावा देने से बेहतर है कि स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और किफायती दरों पर अच्छी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक समाधान तलाशे जाएं।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि इन गाइडलाइंस का उद्देश्य तो नेक ही है और इसका उद्देश्य छात्रों की भलाई और कोचिंग उद्योग के विनियमन के बारे में महत्वपूर्ण चिंताओं को दूर करना है। हालाँकि, इसकी प्रभावशीलता और संभावित या अनपेक्षित परिणामों की सावधानीपूर्वक निगरानी और मूल्यांकन करने की भी आवश्यकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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