Child Abuse: बच्चों के यौन उत्पीड़न से भयावह होते हालात
Child Abuse: क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) की एक हालिया रिपोर्ट बच्चों के यौन उत्पीड़न की भयावह तस्वीर बयां करती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद तैयार इस रिपोर्ट को दो तरह से देखा जा रहा है।
पहला वर्ग है, जो इस बात को लेकर चिंतित है कि बच्चों के साथ दुष्कर्म व उन पर यौन हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ते-बढ़ते, वर्ष 2016 से 2022 के बीच के छह सालों में दोगुनी हो गई हैं। 2016 में जहॉं इस तरह के 19,765 शिकायतें मिली थीं, वहीं यह संख्या बढ़ते-बढ़ते 2022 में 38,911 हो गई है।

वहीं दूसरा पक्ष यह मानता है कि घटनाएं नहीं, बल्कि ऐसे मामलों के बाद सामने आने पीड़ितों की संख्या बढ़ी है। लोगों में जागरुकता बढ़ी है, इसलिए वे चुप्पी तोड़ रहे हैं और हेल्पलाइनों, ऑनलाइन पोर्टलों व विशेष सहायता केंद्रों आदि के जरिए बच्चों के यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन जो प्रत्यक्ष सच है, वह यही है कि बच्चों के साथ बलात्कार और दुष्कर्म के प्रयासों की बढ़ रही शिकायतों को बढ़ती जागरुकता का प्रतीक मानकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता।
अगर शिकायतें बढ़ी हैं तो स्वाभाविक है कि घटनाएं भी बढ़ी ही होंगी। और अगर अनरिपोर्टेड मामलों को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या इससे कई गुना ज्यादा बड़ी हो सकती है। ऐसी घटनाओं का बढ़ते जाना एक ऐसी कठोर वास्तविकता है, जो इस मामले में हमारी विवशता को प्रदर्शित करती है। इससे बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने वाले हमारे मौजूदा कानूनों और समस्या से संबंधित जागरुकता अभियानों की निष्प्रभावशीलता का भी पता चलता है।
अगर राज्यवार देखें तो अध्ययन अवधि के दौरान बच्चों से अपराधों के मामले में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा आदि शीर्ष पॉंच राज्यों में शामिल हैं। लेकिन, 20,762 मामलों के साथ महाराष्ट्र जैसे राज्य का सबसे ऊपर होना हैरान करता है। क्योंकि महाराष्ट्र को ऐसे राज्यों में गिना जाता है, जो महिलाओं और बच्चों के प्रति यौन अपराधों को लेकर अधिक संवेदनशील, सुरक्षित व जागरूक हैं।
यह सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है। अमेरिका जैसे विकसित और यौन स्वच्छंदता के लिए पहचाने जाने वाले देश में हर 9 मिनट में बाल यौन शोषण का एक मामला सामने आता है। यह एक ऐसी महामारी है, जिससे पूरी दुनिया त्रस्त है। यूनिसेफ का अनुमान है कि हर 6 में से 1 लड़की और 33 में से 1 लड़का 18 साल की उम्र से पहले यौन हिंसा का अनुभव करता है।
एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में 18 वर्ष से अधिक आयु वाली महिलाओं के साथ बलात्कार के कुल 28,644 मामले दर्ज हुए थे, वहीं नाबालिगों के साथ बलात्कार की कुल 36,069 घटनाएं हुईं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यौन अपराधियों को बच्चे कहीं अधिक आसान शिकार लगते हैं।
ये वो अपराधी हैं, जिन्हें इतनी भी संवेदनशीलता नहीं होती कि अपनी यौन कुंठाओं की शांति के लिए वे कैसे एक पूरे जीवन को, उसके भविष्य को तहस-नहस कर डालते हैं। उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई जरूरी है। ताकि ऐसा दुष्कर्म करने की सोचने वाले के मन में कानून का भय उत्पन्न किया जा सके।
वर्ष 2012 से देश में पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज) कानून मौजूद है। इस एक्ट को बाल यौन-शोषण की घटनाओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। बच्चों को यौन-शोषण, यौन उत्पीड़न एवं पोर्नोग्राफी से बचाने के लिए बनाये गए इस कानून में बहुत सारे ऐसे कठोर प्रावधान हैं, जो आश्वस्त कर सकते हैं।
इसका दायरा इतना व्यापक है कि बच्चों और अवयस्कों के साथ अश्लीलता करना, उनके प्राइवेट पार्ट्स को छूना या अपने प्राइवेट पार्ट को टच करवाना, उन्हें अश्लील फिल्म अथवा अन्य पोर्नोग्राफिक कंटेंट दिखाना आदि का आरोप सिद्ध होने पर, ऐसा प्रयास करने वाला पॉक्सो एक्ट के तहत सजा का पात्र माना जाएगा। बच्चों से बलात्कार का अपराधी सिद्ध होने पर दोषी को दस साल की कैद से लेकर आजीवन कारावास और फॉंसी की सजा तक दी जा सकती है।
यह कानून और इसके प्रावधान, देखने में तो बहुत प्रभावित करते हैं। लेकिन, इस कानून के तहत सजा पाने वालों की संख्या, कुल रजिस्टर्ड अपराधों की तुलना में बहुत कम है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की 2021 की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2017, 2018 व 2019 में क्रमश: 32608, 39827 व 47335 केस पॉक्सो के तहत रजिस्टर्ड हुए। इनमें 28063, 35568 व 42681 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई। और दोष सिद्ध हुआ सिर्फ (क्रमश:) 3020, 3884 व 5667 मामलों में।
'जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड', देश में ऐसी स्थिति न बनी रहे, इसके लिए पॉंच साल पहले फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी) की संकल्पना की गई। सरकार ने देश भर में 1800 एफटीसी की स्थापना का फैसला किया। इसके अंतर्गत 31 अक्टूबर 2023 तक 758 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित की जा चुकी हैं। इनमें 412 विशेष रूप से सिर्फ पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत आने वाले मामले देखने के लिए हैं।
यह विडंबना ही है कि त्वरित न्याय के लिए बनाई गई इन फास्ट ट्रैक अदालतों की अपनी खुद की रफ्तार इतनी सुस्त है कि यहॉं हर कोर्ट में सालाना औसतन सिर्फ 28 केस ही क्लियर हो पाते हैं। जबकि लक्ष्य 165 केसों का है। इसी देरी की वजह से इनमें लंबित पॉक्सो मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है।
इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार 31 जनवरी 2023 तक सुनवाई की बाट जोह रहे ऐसे मामलों की संख्या 2.43 लाख हो चुकी थी। स्वयं भारत सरकार के न्याय विभाग की ऑफिशियल वेबसाइट पर भी नवंबर 2023 तक के पेंडिंग केसों की संख्या 2,08000 बताई गई है। हालांकि वेबसाइट पर दो लाख केसों के निपटान की बात भी कही गई है। लेकिन मौजूदा गति को देखते हुए, बैकलॉग के निपटारे में ही कम से कम नौ वर्षों का समय लग सकता है।
अफसोस की बात है कि राजनीतिक दलों ने इस अति संवदेनशील विषय पर भी अपनी राजनीतिक रोटियॉं सेंकना शुरू कर दिया है। एक वरिष्ठ राजनेता ने इस रिपोर्ट को लेकर अपने ट्वीट में सरकार पर कटाक्ष किया है कि अन्याय राज में बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। जबकि यह सिलसिला तो दशकों से अनवरत जारी है।
वर्ष 2019 में छह बाल अधिकार संगठनों ने मिलकर एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें दावा किया गया था कि 1994 से 2016 के दौरान बच्चों के साथ यौन हिंसा की घटनाओं में पॉंच गुना वृद्धि हुई। 1994 में ऐसी कुल 3,986 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनकी संख्या बढ़कर 2016 में 19,765 हो गई।
जाहिर है कि सरकार किसी भी दल की रही हो, बचपन कभी सुरक्षित नहीं रहा है। इसलिए आवश्यक है कि इसे राजनीति की बजाए, एक साझा चिंता व चिंतन का विषय बनाया जाए और इसे रोकने के अधिक कारगर तरीकों पर विचार किया जाए। तभी शायद यौन विकृतियों से ग्रस्त अपराधियों की इस कुत्सित प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जा सकेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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