Justin Trudeau: कुर्सी बचाने के लिए अपने ही बनाये गड्ढे में गिर गये जस्टिन ट्रूडो
Justin Trudeau: जस्टिन ट्रूडो 2015 से कनाडा के प्रधानमंत्री हैं और वह आगे भी रहना चाहते हैं। उनके पिता पियरे ट्रूडो 15 साल तक प्रधानमंत्री रहे थे। पर कनाडा की जनता नहीं चाहती कि जस्टिन अब और प्रधानमंत्री पद पर रहे। इसी साल 18 से 23 अगस्त के बीच में अबैकस डाटा ने एक नेशनल सर्वे किया था जिसमें 2,189 युवाओं ने भाग लिया था। सर्वे में भाग लेने वाले 56 प्रतिशत युवकों का सीधा कहना था कि अब जस्टिन को अपने पद से उतर जाना चाहिए।
जस्टिन को भी मालूम है कि मुद्रा स्फीति बढ़ने, मकान बहुत महंगे होने और कंजरवेटिव पार्टी का ग्राफ तेजी से बढने के कारण उन पर पद छोड़ने का दबाव है और एक हफ्ता पहले जब पत्रकारों ने उनसे पूछा भी कि क्या वे पद छोड़ रहे हैं? तब ट्रूडो ने ना में जवाब दिया था और कहा था कि उनके पास बहुत से महत्वपूर्ण काम करने को है। भारत पर सनसनीखेज इल्जाम लगाकर अपनी कुर्सी बचाने की जुगत ही संभवतः उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण काम था जो उन्होंने किया है।

तो क्या कुर्सी बच गई ट्रूडो की?
कनाडा में अभी आम चुनाव होने में दो साल का समय है। इन हालात में ट्रूडो के लिए इतने दिन बने रहना संभव नहीं था, क्योंकि ट्रूडो लगातार विफल हो रहे हैं। एक उर्जावान नेता की बजाय वे उलझे हुए नेता लग रहे हैं। उन्होंने हाल ही में अपनी पत्नी को तलाक देने की घोषणा भी की है, जिसका कनाडा के कंजरवेटिव नेताओं ने खूब मजाक भी उड़ाया था।
भारत पर आरोप लगाकर कनाडाई जनता का समर्थन प्राप्त करने के जोखिम भरे कदम को उठाने से पहले वह राजनीतिक कलाबाजी को आजमा चुके हैं। इसी साल 26 जुलाई को उन्होंने अपनी कैबिनेट में एक बड़ा बदलाव कर सात लोगों को शामिल किया था। पर यह बदलाव भी काम नहीं आया और कनाडा की जनता का गुस्सा उनके प्रति कम नहीं हुआ, जिसका सबूत केबिनेट में बदलाव के बाद आया नेशनल सर्वे रहा।
भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा के नायक क्यों बने ट्रूडो?
ट्रूडो परिवार एवं खालिस्तानी आतंकवादियों का संबंध लगभग 40 साल पुराना है। 23 जून 1985 को एयर इंडिया का विमान AI 182 मांट्रियाल से लंदन होते हुए बंबई आ रहा था। उसमें 329 लोग सवार थे। बीच आसमान में इस जहाज में विस्फोट हुआ और सभी लोग मारे गए। इतिहास में इसे कनिष्क एयर इंडिया बॉबिंग के नाम से इसे दर्ज किया गया। इस बम कांड में खालिस्तानी आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा के लीडर तलविंदर सिंह परमार का नाम आया। यह आतंकवादी भारत में 1981 में दो पुलिसवालों की हत्या कर कनाडा फरार हो गया था।
1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने तब जस्टिन ट्रूडो के पिता और कनाडा के प्रधानमंत्री पियरे से अनुरोध किया था कि वह भारत में वांछित परमार को भारत को सौंप दे, लेकिन तब सीनियर ट्रूडो ने यह कहकर उस आतंकवादी को भारत को सौंपने से इंकार कर दिया कि उनका देश भारत के साथ प्रत्यार्पण की संधि से नहीं बंधा है इसलिए वह परमार को नहीं भेजेगा। हालांकि परमार बाद में भारत आया और 1992 में पंजाब पुलिस से मुटभेड़ में मारा भी गया लेकिन तब से लेकर ट्रूडो परिवार और खालिस्तानी नेताओं के बीच मधुर संबध चले आ रहे हैं।
कनाडा की 3.82 करोड़ जनसंख्या में सिख आबादी के हिसाब से 2.1 प्रतिशत हैं पर कुछ जगह इनकी संख्या छह प्रतिशत से भी अधिक है। जैसे ब्रिटिश कोलंबिया जहां ट्रूडो का सबसे अधिक समय बीता है, वहां सिखों की आबादी छह प्रतिशत है। वेंकूवर, टोरंटो और कैलगेरी में बड़े बड़े गुरूद्वारे हैं। ये गुरूद्वारे कनाडा की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इन गुरूद्वारों में कनाडा की लिबरल और कंजरवेटिव दोनों पार्टियों की पैठ है। कई सिख नेता इन्हीं गुरूद्वारों के प्रभाव से कनाडा की राजनीति में अपनी पकड़ बना के रखते हैं।
2019 में कनाडा में चुनाव प्रचार के दौरान ही जस्टिन के समर्थन के बदले सिखों के स्वेच्छाचार का मुद्दा उठा था। तब कुछ पार्टियों ने यह नारा दिया था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ लगाम लगानी चाहिए। पर ट्रूडो की पार्टी ने सिखों से कुछ और वायदा किया। उस समय वर्ल्ड सिख ऑर्गेनाइजेशन के कानूनी सलाहकार बलप्रीत सिंह ने कहा था- यह कनाडा के लिए एक बहुत बड़ा बदलाव का क्षण है। अंततः नस्लों का विषय एक चुनावी मुद्दा बन गया है। एक देश के रूप में इस मसले को राजनीतिक तौर पर लेंगे। अब इस मामले पर आगे और भी कई चीजें आएंगी।' और हुआ भी ऐसा ही। सिखों को अपनी पहचान के साथ रहने, अलगाववादियों को खुले में प्रदर्शन करने और भारत विरोधी प्रस्तावों एवं पेपर्स प्रस्तुत करने में कहीं कोई रोक नहीं लगी।
जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी नेता हरजीत सिंह सज्जन को अपना रक्षा मंत्री बना डाला। फिलहाल सज्जन मिनिस्टर फॉर इमरजेंसी प्रिपेयर्डनेस और पैसिफिक इकॉनोमिक डेवलपमेंट है। सज्जन को लेकर भारत सरकार कई बार कनाडा सरकार को सचेत कर चुकी है। लेकिन ट्रूडो गर्व से यह कहते हैं कि भारत सरकार में जितने सिख मंत्री नहीं है उससे अधिक सिखों को उन्होंने मंत्री बनाया है।
सरकार बचाने की चिंता
ट्रूडो के लिए समस्या सिर्फ अपनी लोकप्रियता बचाने की नहीं है,बल्कि सरकार बचाने की भी है। इस समय उनकी पार्टी को सदन में बहुमत नहीं है। उनको समर्थन दे रही है न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी जिसके अध्यक्ष हैं जगमीत सिंह। जगमीत सिंह पेशे से वकील रहे हैं, लेकिन कनाडा में वह खुलेआम खालिस्तान का समर्थन करते हैं। जगमीत ने भारत में किसान आंदोलन का खुला समर्थन किया था और प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर आलोचना। जगमीत की पार्टी के पास इस समय 24 सीटें हैं जो जस्टिन ट्रूडो का समर्थन कर रहे हैं। इसी जगमीत ने पंजाब में सक्रिय खालिस्तानी अमृतपाल को पंजाब पुलिस से बचाने के लिए कनाडा सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए ट्रूडो से कहा था। जाहिर है जस्टिन ट्रूडो अपनी सरकार बचाने के चक्कर में भारी गलती कर बैठे हैं।
अपने ही बनाए गड्ढे में गिरे?
टूडो ने जी 20 के सम्मेलन से लौटते हुी सीनेट में भारत के खिलाफ बयान देकर खुद के लिए ही गड्ढा खोद लिया है। ना तो कनाडा के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी जस्टिन ट्रूडो की बातों को गंभीरता से ले रहे हैं और न उनको कनाडा के अंदर ही कोई सहयोग मिल रहा है। बल्कि उनके इस दावे पर कि कनाडा की खुफिया एजेंसियों के पास इस तरह की सूचना है जिससे खालिस्तान समर्थक सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत सरकार का हाथ हो सकता है, कनाडा में ही कोई विश्वास नहीं कर पा रहा है।
कंजरवेटिव नेता और विपक्ष के नेता पियरे पोलिवरे ने जस्टिन ट्रूडो को इस मामले में झूठा करार दिया है। ट्रूडो ने दावा किया था कि उन्होंने विपक्ष के नेता को अलग से एकांत मीटिंग में खुफिया एजेंसियों की जांच के बारे में बता दिया था। जबकि पियरे ने दावा किया कि ट्रूडो ने उनसे एकांत में भी वही बात कही जो उन्होंने सीनेट में सबसे सामने कहा था। कनाडा के मीडिया में इस बात की खबरें और समीक्षा खूब आ रही हैं कि जस्टिन ट्रूडो ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में एक बेहद बचकाना हरकत की है।
ट्रूडो सरकार के भारत विरोधी रवैये से ना तो ब्रिटेन सहमत है, ना अमेरिका और ना ही आस्ट्रेलिया। इन तीनों बड़े देशों ने स्पष्ट कह दिया है कि उनके भारत के साथ द्विपक्षीय संबंध और समझौते पहले ही तरह जारी रहेंगे। उलटे कनाडा के लिए भारत सरकार की नाराजगी महंगी पड़ती दिखाई दे रही है।
कनाडा में भारत से शिक्षा के लिए जाने वाले छात्रों की संख्या बहुत अधिक है। जब से भारत ने अपने छात्रों के लिए कनाडा में सतर्कता की एडवाइजरी जारी की है, तभी से कनाडाई विश्वविद्यालय इस चिंता में हैं कि भारत के इस रवैये का असर पूरी दुनिया पर होगा और लोग अपने बच्चों को कनाडा पढ़ने नहीं भेजेंगे। स्वाभाविक है अगर भारत कनाडा के बीच द्विपक्षीय संबंध और खराब होते हैं तो घरेलू मोर्चे पर ट्रूडो और घिरेंगे जो उनके राजनीतिक हित में तो बिल्कुल नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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