Interim Budget 2024: अंतरिम बजट से राहत की उम्मीद में भारत का मिडिल क्लास
Interim Budget 2024: इन दिनों देश के नौकरी पेशा और मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों की निगाहें 1 फरवरी 2024 को प्रस्तुत किए जाने वाले अंतरिम बजट की ओर लगी है।
यह आम चुनाव के पहले का आखिरी बजट है। चुनावी साल होने के कारण बजट में लोक लुभावन वायदों का पिटारा खोलने और जनता को अधिकाधिक सुविधाएं देकर अपने पक्ष में किए जाने की भी उम्मीद की जा रही है।

इस बार केंद्र सरकार बजट में आयकर छूट सीमा 7.5 लाख से लेकर 8 लाख रुपए तक बढ़ा सकती है, वहीं देश में रोजगार के मौके बढ़ाने, महिलाओं की जेब में हर महीने नकद राशि डालने तथा किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने संबंधी कुछ ठोस घोषणाओं की भी अंतरिम बजट में उम्मीद की जा रही है।
लोग बजट से बचत और उद्योग व्यापार को गति देने वाले प्रोत्साहनों की अपेक्षा कर रहे हैं। छोटे आयकर दाता, नौकरी पेशा वर्ग के साथ-साथ मध्यम वर्ग के लोग भी चाहते हैं कि उन्हें आयकर से राहत मिले। वर्तमान समय में नई स्कीम के तहत अधिकतम 7 लाख रुपए तक तथा पुरानी स्कीम में अधिकतम 5 लाख रुपए तक की आयकर छूट प्राप्त है।
सरकार ने बीमा, चिकित्सा और आवास के क्षेत्र में जो योजनाएं शुरू की हैं, वे मध्यम वर्ग को लाभान्वित कर रही हैं। जीएसटी में हुए बड़े सुधार से उद्योग कारोबार को गति मिली है। फिर भी यह वर्ग कर संबंधी राहत से अपनी बचत और निवेश को बढ़ाने की बात कह रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि देश को नई पहचान और ताकत देने वाला भारतीय मध्य वर्ग कदम-कदम पर सामाजिक, आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। बड़ी संख्या में निम्न मध्यम वर्गीय लोग यह कहते मिल जाते हैं कि रहन-सहन के खर्चे, ट्रांसपोर्ट की लागत, बच्चों की फीस आदि जरूरी खर्चो के बाद कुछ नहीं बच पाता।
आकस्मिक खर्चों की स्थिति में उनकी आर्थिक मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। न केवल महंगे और बढ़ते खर्चों से यह वर्ग परेशान है और उसकी जेब लगातार खाली हो रही है, बल्कि हाउसिंग लोन, व्हीकल लोन आदि पर बढ़ी ब्याज दर ने उनकी चिंताएं और बढ़ा दी हैं। इस वर्ग की मुश्किलें समाज के गरीब और अमीर वर्ग से अलग है। गरीब तबका विभिन्न सरकारी योजनाओं से लाभान्वित होकर मुश्किलों से पार पा जाता है, जबकि अमीर वर्ग अपनी आर्थिक ताकत से सब झेल लेता है।
इस बीच अंतरिम बजट से पहले 10 वर्षों की प्रगति, मौजूदा चुनौतियों और आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था की दिशा का खाका पेश करते हुए वित्त मंत्रालय ने आर्थिक समीक्षा रपट प्रस्तुत की है। "द इंडियन इकोनामी: ए रिव्यू" में सरकार ने कहा है कि पिछले 9 वर्षों से सुधार के चलते अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन दुनिया में बढ़ती खेमेबंदी, ऊर्जा सुरक्षा, एआई का साया और कुशल कार्यबल की चुनौतियां बनी हुई है। मंत्रालय ने कहा है कि तीन वर्षों में भारत के 5 लाख करोड़ डॉलर की जीडीपी के साथ दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उम्मीद है।
समीक्षा रपट के मुताबिक सरकार ने 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने का एक बड़ा लक्ष्य रखा है। रपट कहती है कि घरेलू मांग की ताकत ने पिछले तीन वर्षों में अर्थव्यवस्था को 7 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर प्रदान की है। वित्त वर्ष 2024-25 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7 प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना है। आने वाले दिनों में दुनिया के कई हिस्सों में टकराव बढ़ने का खतरा ही अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का एकमात्र कारण के रूप में रपट में चिन्हित किया गया है।
देश के आर्थिक मानक फिलहाल मिले-जुले हैं। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के देशव्यापी उत्सव के बावजूद शेयर बाजार गिर रहा है और रोजगार संवर्धन तथा गरीबी उन्मूलन संबंधी सरकारी आंकड़ों पर आमने-सामने की चर्चा हो रही है।
चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से सितंबर के बीच दो तिमाहियों में जीडीपी में दर्ज कुल 7.7 प्रतिशत तेजी के साथ भारत को सबसे तेज बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त हुआ है। प्राथमिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2023-24 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार अप्रैल-जून के बीच सकल घरेलू उत्पाद 7.5% और जुलाई-सितंबर के बीच 7.6 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। अक्टूबर 23 से मार्च 2024 की छमाही के दौरान जीडीपी में 7.3 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान किया गया है।
यह अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दिसंबर 2023 में समाप्ति माह के लिए जताए गए 6.5% और मार्च 2024 में समाप्ति माह के लिए छह प्रतिशत के अनुमान से कहीं अधिक है। अंतिम उपभोग सूचकांक 2022-23 में जहां महज 0.01% था वही 2023-24 में बढ़कर 0.40% पहुंचने की बात कही जा रही है।
सकल स्थिर पूंजी वृद्धि दर लगातार तीसरे साल दहाई में आंकी गई है। हालांकि वृद्धि दर जो 2022-23 में 11.4 प्रतिशत थी, घटकर 23-24 में 10.01% रह जाने का आकलन है, मगर इसका दहाई में बरकरार रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
इस बीच विनिर्माण क्षेत्र द्वारा 2023-24 की तेज वृद्धि दर में सबसे ज्यादा 6.5 प्रतिशत का योगदान महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2022-23 में यह दर महज 1.3 प्रतिशत थी। हालांकि रोजगार प्रदान करने वाले प्रमुख सेक्टरों कृषि एवं व्यापार, होटल, परिवहन, संचार एवं प्रसारण संबंधी सेवाओं में आर्थिक गतिशीलता धीमी हुई है। इन क्षेत्रों में आर्थिक गतिशीलता 2022-23 में क्रमशः चार प्रतिशत एवं 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई थी, वहीं 23-24 में घटकर क्रमशः 1.8 प्रतिशत एवं 6.3 प्रतिशत रह गई है।
इसी वजह से अर्थशास्त्री वित्त वर्ष 24-25 में जीडीपी की वृद्धि दर 6% पर अटक जाने का लगातार अंदेशा जता रहे हैं। राजस्व वसूली में कमी के कारण राजकोषीय घाटे के बजट अनुमान से कहीं अधिक रहने की आशंका भी जताई जा रही है।
आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक 2023-24 में नॉमिनल यानी सांकेतिक जीडीपी 8.9% पर अटक सकती है जो बजट में अनुमानित 10.5 प्रतिशत से 1.6 प्रतिशत कम होगी। इस मद में 296.6 लाख करोड़ रूपए राजस्व की उगाही का अंदाज है जो बजट में अनुमानित 301 लाख करोड़ रुपए से कम है।
अगर ऐसा होता है तो इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा और यह अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पर ग्रहण लगाएगा। परंतु इसकी असली तस्वीर अंतरिम बजट में निर्धारित अनुमान प्रस्तुत किए जाने पर ही स्पष्ट हो पाएगा। अनाज, खाने के तेल एवं सब्जी फल आदि के दामों की भी भूमिका इसमें महत्वपूर्ण होगी।
हालांकि वित्त मंत्रालय का दावा है कि अर्थव्यवस्था में विकास दर बढ़ाने के पीछे केंद्र सरकार द्वारा पिछले 9 साल में किए गए व्यापक आर्थिक सुधार हैं। इसके बावजूद धीमी गति से रोजगार बढ़ाने के आंकड़े चुनावी वर्ष में राजग सरकार की चिंता बढ़ा सकते हैं। इस बीच भारतीय स्टेट बैंक के सर्वेक्षण के मुताबिक आर्थिक तरक्की देश में केवल धन्नासेठों तक ही सीमित नहीं रही है बल्कि उससे गरीबी भी घटी है।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि सबसे निचले स्तर पर मौजूद आबादी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आर्थिक तरक्की कर रही है। सबसे निचले तबके के घरों एवं फर्मो में आमदनी एवं खपत में भी तेजी आई है। व्यक्तिगत आय विषमता 2015 में 0.472 के आकलन वर्ष के मुकाबले 2023 में 0.402 तक घटी है।
2015 में सालाना 3.5 लाख रुपए आमदनी वालों में 36.3 प्रतिशत आयकर रिटर्न फाइल करने वालों की आमदनी बढ़ने से उनका जीवन स्तर ऊपर उठा है। सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों में 2013-14 से 2021-22 के बीच सालाना 10 करोड़ रुपए कारोबार वाले 19.5 प्रतिशत सूक्ष्म उद्योगों का कारोबार इतना बढ़ गया है कि अब बड़े उद्योगों की श्रेणी में आ गए हैं।
नीति आयोग ने बड़े पैमाने पर गरीबी उन्मूलन का दावा किया है। प्रधानमंत्री ने भी अपनी हालिया बुलंदशहर की रैली में इन आंकड़ों के हवाले से गरीबी घटने का दावा दोहराया लेकिन देश के अधिकांश अर्थशास्त्री यह लगातार पूछ रहे हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियों से अगर गरीबों की आर्थिक दशा सुधर गई है तो 83 करोड़ गरीबों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications